Monday, 15 January 2018

पद्मावती के जौहर से सुलगता देश

हफ्ते भर पहले खबर आई कि CM वसुंधरा राजे सिंधिया ने राजस्थान में पद्मावत को रिलीज करने पर प्रतिबंध लगा दिया । फिर इसका अनुसरण करते हुए गुजरात CM विजय रुपाणी ने गुजरात मे और शिवराज सिंह चौहान ने MP में इसे प्रतिबंधित कर दिया ।
मेरे मन में फिल्म को लेकर "क्यों ?" की शक्ल में बहुत से सवाल उठ रहे है कि
* आखिर "क्यों" इस फिल्म को प्रतिबंधित किया जा रहा है ?
* आखिर "क्यों" किसी को उसकी बात कहने से रोका जा रहा है जबकि अभिव्यक्ति की आजादी मूल अधिकार है
* आखिर "क्यों" देशभर के राजपूत एक काल्पनिक पात्र के लिये वास्तविकता से लड़ने को उतावले हो रहे है
* आखिर "क्यों" करणी सेना पद्मावती की रिलीज को रोकने पर अड़ा है ।

उपरोक्त तमाम "क्यों ?" के जवाब बारी - बारी से आपके सामने रख रहा हूँ, पहले "क्यों" जवाब है कि यह फ़िल्म राजपूतों की भावनाएं आहत कर रही है इसलिए इसे बैन किया जाना चाहिए । जबकि तमाम इतिहासकारों के मुताबिक पद्मिनी ( पद्मावती ) नाम की रानी जरूर हुई थी पर बाकी सभी बातें काल्पनिक है, जिनकी ऐतिहासिकता शत प्रतिशत संदिग्ध है । मलिक मोहम्मद जायसी रचित पद्मावत नामक महाकाव्य में लिखे ऐतिहासिक तथ्य हर तरह अप्रासंगिक है । इस संदर्भ में सर्वाधिक उद्धृत तथा प्रमाणभूत मत महामहोपाध्याय रायबहादुर गौरीशंकर हीराचंद ओझा का मत माना गया है। ओझा जी ने पद्मावत की कथा के संदर्भ में स्पष्ट लिखा है कि "इतिहास के अभाव में लोगों ने पद्मावत को ऐतिहासिक पुस्तक मान लिया, परंतु वास्तव में वह आजकल के ऐतिहासिक उपन्यासों की सी कविताबद्ध कथा है, जिसका कलेवर इन ऐतिहासिक बातों पर रचा गया है कि रतनसेन (रत्नसिंह) चित्तौड़ का राजा, पद्मिनी या पद्मावती उसकी राणी और अलाउद्दीन दिल्ली का सुल्तान था, जिसने रतनसेन (रत्नसिंह) से लड़कर चित्तौड़ का किला छीना था। बहुधा अन्य सब बातें कथा को रोचक बनाने के लिए कल्पित खड़ी की गई है; क्योंकि रत्नसिंह एक बरस भी राज्य करने नहीं पाया, ऐसी दशा में योगी बन कर उस की सिंहलद्वीप (लंका) तक जाना और वहाँ की राजकुमारी को ब्याह लाना कैसे संभव हो सकता है। उसके समय सिंहलद्वीप का राजा गंधर्वसेन नहीं किन्तु राजा कीर्तिनिश्शंक देव पराक्रमबाहु (चौथा) या भुवनेक बाहु (तीसरा) होना चाहिए। सिंहलद्वीप में गंधर्वसेन नाम का कोई राजा ही नहीं हुआ। उस समय तक कुंभलनेर (कुंभलगढ़) आबाद भी नहीं हुआ था, तो देवपाल वहाँ का राजा कैसे माना जाय ? अलाउद्दीन 8 वर्ष तक चित्तौड़ के लिए लड़ने के बाद निराश होकर दिल्ली को नहीं लौटा किंतु अनुमान 6 महीने लड़ कर उसने चित्तौड़ ले लिया था, वह एक ही बार चित्तौड़ पर चढ़ा था, इसलिए दूसरी बार आने की कथा कल्पित ही है।"


जबकि इतिहास पर एक नजर डालें तो उसमें हजारों राजपूत राजाओं ने अपना राजपाट बचाने के लिये अपनी बहन - बेटियां मुगल / मुस्लिम शासकों से ब्याही है । अगर अकेले राजस्थान की बात करें तो 15वीं सदी से लेकर 20वीं तक का इतिहास खंगाला जाये तो हजारों नाम मिलेंगे, जिनमें राजस्थान के प्रमुख रजवाड़े जोधपुर, आमेर ( जयपुर ) , अजमेर , चितौड़, बीकानेर आदि से दर्जनों बहन / बेटियों को ब्याहा गया है । और इन शादियों में अकेली राजकुमारी ही नहीं भेजी जाती, बल्कि उनके साथ तमाम तरह की महिला नौकर भी भेजी जाती, जो कि एक तरह से राजकुमारी के साथ राजा को भेंट स्वरूप भेजी जाती थी । इसके अलावा इतिहास खंगाले तो पता चलता है कि अकबर का जोधपुर की राजकुमारी जोधा से विवाह हुआ था, ततपश्चात उसी जोधपुर राजघराने ने अपनी बेटियां फिर से मुगलों से ब्याही थी जिनमें जहांगीर की पहली बीबी उसकी माँ जोधा की भतीजी थी तो जहांगीर की दूसरी बीबी जोधा के भतीजे की बेटी थी ।

चलिए, एक बरगी मान भी लिया जाए कि पद्मावती असल मे हुई थी, और उसके लिये 2 साल युद्ध चला हो तो अब जब इतने अनगिनत उदाहरण इतिहास में भरे पड़े है तो फिर राजपूत समाज द्वारा विरोध क्यों किया जा रहा है ?

अब आते है अभिव्यक्ति की आज़ादी पर, जिसपर पिछले कुछ सालों में जोर जबरदस्ती से प्रहार किए गए है । उदाहरण के तौर पर डॉ. दाभोलकर, गोविंद पंसारे, प्रो. कुलबर्गी, गौरी लंकेश के नाम प्रमुख है जिनकी हत्या तक कर दी गयी । इन सब पर कोई एक्शन न होना यह दर्शाता है कि ये तमाम हत्याएं सरकार की शह पर हुई है ।

इस फ़िल्म का मुखर विरोध करने वाली करणी सेना का मुखिया, सुखबीर सिंह गोगामेड़ी, खुद एक स्टिंग में यह कहता पाया गया है कि पैसे ले-देकर हम इसे खत्म कर सकते है, विरोध तो सिर्फ दिखावा है ।
आपको बता दूं कि ये वही सुखदेव सिंह गोगामेड़ी है जिसपर कई आपराधिक केस चल रहे है और चुरू और हनुमानगढ़ जिले का छंटा हुआ बदमाश है, जो चुनाव भी लड़ चुका है और कुछ साल पहले ही अचानक से करणी सेना का प्रदेश अध्यक्ष बन गया था । अब सवाल ये उठता है कि क्या राजपूत समाज के पास नेतृत्व की इतनी कमी है जो एक अपराधी पूरे समाज की दशा और दिशा तय कर रहा है ।

ये सब बातें तो हुई पद्मावती ( अब पद्मावत ) को लेकर, पर इन सबके इतर एक मनोवैज्ञानिक पहलू और भी है जिसकी पड़ताल हमें करनी चाहिये, वो है कि आखिर क्यों लोग देशभक्ति/संस्कृति के नाम पर परोसे जा रहे झूठ पर आसानी से यकीन कर लेते है और बिना सच जाने ही मार-काट, हिंसक प्रदर्शन पर उतारू हो जाते है ?

इसके पीछे सबसे बड़ा कारण है अशिक्षा, तर्कविहीन समाज का । ये दंगा फसाद फैलाने वाले आम लोग नही है, ये किसी संगठन/विचारधारा विशेष के लोग है जो देशभक्ति/संस्कृति के नाम पर बवण्डर खड़ा करते है । चूँकि भारत का पिछले 300 सालों का इतिहास धार्मिक और सामाजिक वैमनष्य का रहा है, ज्यादातर लोग धार्मिक तौर पर असहिष्णु है इसलिये धर्म के नाम पर आसानी से भड़क जाते है ।
अगर कुछ विशेष उदाहरण छोड़ दिए जाएं तो आम आदमी मार - काट और हिंसक प्रदर्शन करने को इतनी आसानी से उतारू नही होता है । हां, अपनी प्रतिक्रियाएं जरूर दर्ज करवाता है ।
द्वितीय विश्वयुद्ध के समय हिटलर ने गोएबल्स नामक व्यक्ति को अपना प्रचारमंत्री ( जैसे PM नरेंद्र मोदी के लिए अमेरिकन APCO ) नियुक्त किया था जिसकी सीधी सी थ्योरी थी कि एक झूठ को अगर 100 बार बोला जाए तो लोग उसे सच मानने लग जाते है क्योंकि आम आदमी जीवन के संघर्षों में इस कदर उलझा रहता है कि उसके पास सच जानने जितना समय नहीं बचता है और वो अंततः उस भेड़चाल का हिस्सा बन जाता है ।
अगर इस भेड़चाल को रोकना है तो गलत और भ्रामक सूचनाएं फैलाने वाले तत्त्वों को रोकना होगा और समाज को शिक्षित कर उसे अधिक से अधिक तर्कशील बनाना होगा ।

Wednesday, 6 December 2017

6 December

आज 6 दिसंबर है, बहुत से लोग है जो आज शौर्य दिवस मनाते है और बहुत से लोग शोक दिवस, दोनों की अपनी अपनी वजहें है, पर मुद्दा कॉमन है बाबरी मस्जिद, इसलिये दोनों गुट एक दूसरे के विरोध में है, खूब लिखते है, ये जानते हुए भी कि जो बीत चुका वो बीत चुका, और जो नहीं होगा वो नहीं होगा । उसे भूलकर आगे बढ़ने में ही सबकी भलाई है, पर लोगों के सर पर एक सनक सवार है, धर्म की सनक । ये ऐसी सनक है जो बर्बादी के सिवाय कुछ नहीं देती, बाबरी - गोधरा तो बस नमूने भर है, आये रोज इसके हत्थे चढ़ते लोगों की तो गिनती ही नहीं है ।

उस तरह के तमाम लोगों की तरह मैं भी दोनों दिवस मनाता हूँ, मेरे लिये भी आज का दिन शौर्य या शोक दिवस है, पर मेरी वजह अलग है, मैं शोक दिवस मनाता हूँ, क्योंकि आज के दिन भारतीय संविधान के शिल्पकार, बराबरी और जाति उन्मूलन के अगुआ, महान विद्वान बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर जी आज ही के दिन हमें छोड़कर इस दुनिया से चले गए थे, इसलिये मेरे लिये शोक दिवस है ।
मैं शौर्य दिवस मनाता हूँ क्योंकि आज ही के दिन अपने शौर्य से दुश्मनों को पराजित करने वाले और जीवित परमवीर चक्र प्राप्त करने वाले भारत के एकमात्र सपूत कर्नल होशियार सिंह ने भी आज ही के दिन इस दुनिया को विदा कहा था ।

इसलिये दोनों सपूतों को विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करता हूँ और बाबरी वालों के लिये सद्बुद्धि की कामना करता हूँ
जय भीम !
जय हिंद !

Sunday, 26 November 2017

AAP का 5वां जन्मदिन #5YearsOfAAPRevolution

आज से 5 साल पहले आज 26 November के दिन आम आदमी पार्टी का जन्म हुआ था, चूँकि जन्म के दिन देश का संविधान लागू हुआ था, इसलिये उसी संविधान की हमने घुट्टी ( घोषणा पत्र ) दी, और उसी की पहली लाइन " हम भारत के लोग ... " से बच्चे का नामकरण किया, " #AamAadmiParty "
बच्चे पालन पोषण और मजबूती के लिये " स्वराज " की डोज़ दी गयी, देशभर के लोगों ने बच्चे का ख्याल रखा और अपने पैरों पर खड़ा होना सिखाया, लुढ़कते लुढ़कते सालभर में ये बच्चा चलना सीखा, फिर दौड़ना शुरू किया, छोटे छोटे अड़ंगे लगाए गए पर सबके आशीर्वाद और प्यार से सभी लोगों के चेहरे पर मुस्कान बिखेरते हुये दौड़ रहा था कि 49 दिन बाद बीजेपी और कांग्रेस ने मिलकर इसे गिरा दिया, हिम्मत करके फिर खड़ा हुआ और देशभर में घूमकर पंजाब होते हुये आगे बढ़कर 4 लोकसभा सीटों के साथ लोकसभा में पहुँचा । लोकसभा के बाद फिर संभला, इस बार अड़ंगा लगाने वालों की पहचान करना सीख गया था इसलिये अड़ंगा लगाने वालों को धूल चटाते हुये और इस बार दिल्ली के लोगों के प्यार और विश्वास ने 70 में 67 सीट देकर रामलीला मैदान होते हुये दिल्ली विधानसभा में पहुँचा । दिल्ली में सबको खुश रखा तो पंजाब के लोगों ने भी उसी प्यार के साथ बुलाया और वहाँ के अकाली दल के शोषण को खत्म कर 20 सीटों के साथ पंजाबियों ने बड़े सम्मान के साथ विधानसभा में मुख्य विपक्ष बनाकर बैठाया और गोआ में भी प्यार सम्मान मिला, जिसकी बदौलत हम जल्द ही राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा प्राप्त करने वाले है ।

इस तरह आज 5 साल बाद इस छोटे से बच्चे ने उन बूढ़ों को बदलने पर मजबूर कर दिया तो स्वभाव से अकड़ू थे और हर किसी को मुँह नहीं लगाते थे । इस बच्चे की जिद की वजह से ही नेताओं की इज्जत कही जाने वाले पगड़ी लाल बत्ती को नीचे उतारना पड़ा । इन 5 सालों में इस बच्चे ने हर उस आदमी को बदल दिया जो ये कहता था कि इस देश का कुछ नहीं हो सकता, आज सब उस बच्चे की ओर प्यार से देखकर यही कहते है, " अगर नियत अच्छी हो तो इस देश का भी बहुत कुछ हो सकता है ।"

हमें इस बच्चे को प्यार से पालना है, अगर गलती करे तो पहले इसे समझाना है, फिर भी न समझे तो सख्ती से पेश आना पड़ेगा । इसे हर हाल में सहेज कर रखना है, यही हमारा भविष्य है । लेकिन अगर कोई इस बच्चे की तरफ गन्दी नजर डालेगा तो उस आँख को ही खत्म कर देंगे

Thursday, 28 September 2017

भगतसिंह की शिक्षा, व्यवस्था में फैले जुल्म और अन्याय के खिलाफ बागी तैयार करती है

कुछ साथी लगातार सवाल कर रहे है कि सरकार भगतसिंह को और भगतसिंह के लिखे हुये को पाठ्यक्रम में शामिल क्यों नहीं करती ? इसके पीछे वो तर्क देते है कि भगतसिंह की स्वीकार्यता गाँधी, पटेल, सुभाषचंद्र बोस, नेहरू, इंदिरा, जयप्रकाश नारायण के बराबर या ज्यादा ही रही है तो लोगों को पता लगने देना चाहिये कि भगतसिंह कौन थे और उनके विचार क्या थे ?


साथियों, आपके इस सुझाव से 100% सहमत हूँ । अकेला मैं ही नहीं देश की अधिकांश आबादी सहमत होगी । आज भगतसिंह का नाम तो बड़ा बन गया है पर उनके विचार बड़े नहीं बन पाए । इसका परिणाम ये हुआ कि भगतसिंह के विरोधी विचारों वाले लोग भी भगतसिंह के नाम पर ठेकेदारी करने लग गए ।
‌भगतसिंह का एक लेख था, " मैं नास्तिक क्यों ? " जिसमें उन्होंने बताया कि वो नास्तिक क्यों बने, कैसे बने, ईश्वरीय सत्ता को क्यो नकारा, ईश्वर के नाम पर कैसे लोगों को बहकाया जाता है, कैसे धर्म के नाम पर मानसिक विकार उत्पन्न किये जाते है, अध्यात्म, धर्म से होते हुये कैसे एक धंधा बन गया है आदि आदि । उपरोक्त सवालों के जवाब उन्होंने आज से करीब 90 साल पहले दे दिए थे पर आज भी धर्म की समस्या ज्यों की त्यों मुँह बाये खड़ी है या यूँ कहूँ कि उससे ज्यादा विकृत अवस्था में है । और आज जो भगतसिंह के नाम पर संगठन बने है वो उनकी इस शिक्षा को पढ़े बिना हर वो काम कर रहे है जो भगतसिंह ने करने को मना किया था, इसमें सबसे बड़ा नाम भगतसिंह क्रांति सेना का है जो धर्म की राजनीति का बढ़ चढ़कर समर्थन करती है ।

वहीं दूसरी ओर मान लो यदि आज स्कूली पाठ्यक्रम में "मैं नास्तिक क्यों ?" पढ़ाया जाए तो सबसे बड़ा सवाल खड़ा होगा अल सुबह होने वाली ईश्वरीय/सरस्वती वंदना पर । इस ब्राह्मणवादी शिक्षा व्यवस्था को मजबूत करने वाली सबसे महत्वपूर्ण कड़ी को ही जब छात्र नकार देगा तो धार्मिक दुकानें हिलना लाजिमी है ।

भगतसिंह ने छात्रों और युवाओं को सम्बोधित करते हुए 2 पत्र लिखे, जिसमें पहला था 1928 में कीर्ति में छपा " विद्यार्थी और राजनीति ", जिसमें वो कहते है "जिन नौजवानों को कल देश की बागडोर हाथ में लेनी है, उन्हें आज अक्ल के अन्धे बनाने की कोशिश की जा रही है। इससे जो परिणाम निकलेगा वह हमें खुद ही समझ लेना चाहिए। यह हम मानते हैं कि विद्यार्थियों का मुख्य काम पढ़ाई करना है, उन्हें अपना पूरा ध्यान उस ओर लगा देना चाहिए लेकिन क्या देश की परिस्थितियों का ज्ञान और उनके सुधार सोचने की योग्यता पैदा करना उस शिक्षा में शामिल नहीं?यदि नहीं तो हम उस शिक्षा को भी निकम्मी समझते हैं, जो सिर्फ क्लर्की करने के लिए ही हासिल की जाये। ऐसी शिक्षा की जरूरत ही क्या है? कुछ ज्यादा चालाक आदमी यह कहते हैं- “काका तुम पोलिटिक्स के अनुसार पढ़ो और सोचो जरूर, लेकिन कोई व्यावहारिक हिस्सा न लो। तुम अधिक योग्य होकर देश के लिए फायदेमन्द साबित होगे।”
बात बड़ी सुन्दर लगती है, लेकिन हम इसे भी रद्द करते हैं,क्योंकि यह भी सिर्फ ऊपरी बात है। "


और दूसरा लेख ( सन्देश ) था 1929 में पंजाब छात्रसंघ में पढ़कर सुनाया गया, जिसकी अध्यक्षता सुभाष चन्द्र बोस ने की थी, वो लिखते है कि
" इस समय हम नौजवानों से यह नहीं कह सकते कि वे बम और पिस्तौल उठाएँ। आज विद्यार्थियों के सामने इससे भी अधिक महत्वपूर्ण काम है। आनेवाले लाहौर अधिवेशन में कांग्रे़स देश की आज़ादी की लड़ाई के लिए जबरदस्त लड़ाई की घोषणा करने वाली है। राष्ट्रीय इतिहास के इन कठिन क्षणों में नौजवानों के कन्धों पर बहुत बड़ी जिम्मेदारी आ पड़ेगी। यह सच है कि स्वतन्त्रता के इस युद्ध में अग्रिम मोर्चों पर विद्यार्थियों ने मौत से टक्कर ली है। क्या परीक्षा की इस घड़ी में वे उसी प्रकार की दृढ़ता और आत्मविश्वास का परिचय देने से हिचकिचाएँगे? नौजवानों को क्रांति का यह सन्देश देश के कोने-कोने में पहुँचाना है, फैक्टरी कारखानों के क्षेत्रों में, गंदी बस्तियों और गाँवों की जर्जर झोपड़ियों में रहने वाले करोड़ों लोगों में इस क्रांति की अलख जगानी है, जिससे आजादी आएगी और तब एक मनुष्य द्वारा दूसरे मनुष्य का शोषण असम्भव हो जाएगा। पंजाब वैसे ही राजनीतिक तौर पर पिछड़ा हुआ माना जाता है। इसकी भी जिम्मेदारी युवा वर्ग पर ही है। आज वे देश के प्रति अपनी असीम श्रद्धा और शहीद यतीन्द्रनाथ दास के महान बलिदान से प्रेरणा लेकर यह सिद्ध कर दें कि स्वतन्त्रता के इस संघर्ष में वे दृढ़ता से टक्कर ले सकते हैं। "


अब वापस लौटते है भगतसिंह को पाठ्यक्रम में शामिल करने के मुद्दे पर, इसके लिये हमें सबसे पहले भगतसिंह के विद्यार्थियों के नाम लिखे उपरोक्त तीनों पत्र पढ़ने बहुत जरूरी है । इन पत्रों को पढ़ने के बाद एक चीज साफ साफ समझ आती है, वो है जुल्म न सहने और हक़ की लड़ाई का संदेश । अब आप सोचिये कि भगतसिंह को यदि पाठ्यक्रम में शामिल किया तो
- ब्राह्मणवादी व्यवस्था के खिलाफ खड़े होंगे
- छात्र अपने अधिकार जान जाएंगे
- राजनीतिक रूप से परिपक्व हो जायेंगे
- हुक्मरानों से सवाल करेंगे
और यदि ये सब हुआ तो जाहिर सी बात शोषक वर्ग की जड़ें हिल जायेगी और जल्द ही उनकी सत्ता के खिलाफ जनक्रांति हो जायेगी जिसमें सत्ता जनता के हाथों में होगी और शोषक या तो मार दिए जाएंगे या काल कोठरी में भेज दिए जाएंगे, उनकी पूँजी लोकहित में राष्ट्रीय संपदा घोषित कर दी जायेगी ।
तो अब आप ही बताइये कि कौन अपने जमे जमाये साम्राज्यों के खिलाफ किसी को खड़ा होने देना चाहेगा ?  इसलिये हमें ये उम्मीद करनी छोड़ देनी चाहिये कि सत्तासीन भगतसिंह की बातें आमजन तक पहुँचने देंगे, क्योंकि भगतसिंह की शिक्षा, व्यवस्था में फैले जुल्म और अन्याय के खिलाफ बागी तैयार करती है ।

Saturday, 9 September 2017

फौज

बादशाह बोला शाह से

"तैयार करो एक ऐसी फौज,
जो ...
हम कहे तो चले,
हम कहे तो रुके,
हम कहें तो बोले,
हम कहे तो खामोश,
हम कहें तो मारे,
हम कहें तो बख्शे"

शाह ने फरमाया

"हुजूर,
गुस्ताखी के लिये मुआफी,
पर ..
एक दिक्कत है,
फौज में होंगे लोग,
और
लोग वैसा ही करे जैसा हम कहे
ये जरूरी नहीं,
क्योंकि...
वाे सोच सकते है,
इसलिये फौज में जानवर रखो, इंसान नहीं "

शाह ने आगे फरमाया

"जानवर भरने से अच्छा,
इन्ही लोगों में भर दो - भूख/गरीबी/डर और अंधविश्वास
और मिला दो थौङा सा जाति, धर्म का बारूद,
फिर शोषण का दु:ख और मौत का भय होगा,
फिर दिलों में बदले की आग और इन्सानियत की राख होगी"

( यह कविता आज पाश के जन्मदिन पर लिखी थी । इसमें पहले 2 पैरा मेरे लिखे है और अंतिम पैरा साथी सुमित ने लिखा है )

Wednesday, 9 August 2017

RSS के गाँधी गान की पड़ताल

आज भारत छोड़ो आंदोलन के 75 साल बाद भी आरएसएस के स्वयंसेवक नरेंद्र मोदी और अन्य संघ नेताओं को गाँधी जी की मजबूरी में तारीफ करनी पड़ रही है तो ये कहीं न कहीं उनका प्रताप ही है । गाँधी जी का राष्ट्रवाद आज के संघी राष्ट्रवाद की तरह दिखावटी या सतही राष्ट्रवाद नहीं था । तब देश के हर क्षेत्र, धर्म, जाति, वर्ग के लोगों ने गाँधीजी के साथ आज़ादी की लड़ाई में "करो या मरो" का प्रण लिया था, संघ के नेताओं की तरह मैदान छोड़कर भागे नहीं थे । 

ये इतिहास का वो काला सच है जिसको आज छिपाने का प्रयास किया जाता है । आरएसएस के दूसरे प्रमुख एम एस गोलवलकर ने 24 मार्च, 1936 को आरएसएस प्रचारक कृष्णराव वाडेकर को एक चिठ्ठी लिखी, जिसमें लिखा  "क्षणिक उत्साह और भावनात्मक उद्वेलन से पैदा हुये कार्यक्रमों से संघ को दूर रहना चाहिये । इस तरह से अंग्रेजी शासन को उखाड़ फेंकने की कोशिश 'सतही राष्ट्रवाद' है । अभी आप धूले जलगांव इलाके में संघ की शाखा स्थापित करने पर ध्यान दीजिये ।"
इनके प्रणेता सावरकर ने तो बाकायदा अंग्रेजों से वादा किया था कि वो कालापानी से छूटने के बाद अंग्रेजों के खिलाफ किसी भी राजनीतिक क्रियाकलापों में शामिल नहीं होंगे । आगे चलकर बंगाल में सावरकर की हिन्दू महासभा ने मुस्लिम लीग के साथ मिलकर न सिर्फ सरकार बनाई बल्कि उपमुख्यमंत्री समेत कई पद लेकर सत्ता सुख भी भोगा । तब मुख्यमंत्री पद पर मुस्लिम लीग की तरफ से फजल-उल-हक और उपमुख्यमंत्री पद पर हिंदू महासभा की तरफ से श्यामा प्रसाद मुखर्जी आसीन हुए ।
तब श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने 6 जुलाई, 1942 को गवर्नर को आधिकारिक तौर पर लिखा था- "सवाल ये है कि बंगाल में भारत छोड़ो आंदोलन का सामना कैसे किया जाये? प्रशासन को इस तरह से चलाया जाये कि कांग्रेस की भरसक कोशिश के बाद भी ये आंदोलन बंगाल में अपनी जड़ें न जमा पाये, असफल हो जाये ... भारतीयों को ब्रिटिशर्स पर यकीन करना होगा ।"
भले ही लाख गालियाँ दे ले पर गाँधीजी ने जो किया उसी की वजह से तब आज़ादी मिली थी । और जो आज देशभक्ति की बड़ी बड़ी बातें कर रहे है न तब वो और उनके नेता अंग्रेजों की चमचागिरी या उनसे माफी मांग रहे थे । देश के 2 टुकड़े कराने में भी इसी संघ का पूरा-पूरा योगदान था, 2 नेशन थ्योरी सिर्फ मुस्लिम लीग की नहीं थी, आरएसएस और हिन्दू महासभा का भी वही स्टैंड था जो जिन्ना का था ।
सबसे पहले सावरकर ने 1923 में प्रकाशित अपनी किताब हिंदुत्व में हिंदू राष्ट्र का सिद्धांत रखा । जो बाद में 30 दिसंबर 1937 को हिन्दू महासभा के अधिवेशन में अपने अध्यक्षीय भाषण में कहा " यहाँ 2 देश होने चाहिये,  हिंदुओ का हिंदुस्तान और मुस्लिमो का अलग"
इसी को आधार बनाकर मुस्लिम लीग के जिन्ना ने लाहौर अधिवेशन ( मार्च 1940, फजल-उल-हक की अध्यक्षता में ) में अलग पाकिस्तान की माँग की ।
जो आगे चलकर देश के टुकड़े कराने का कारण बनी और कई लाखों लोग मारे गए और बेघर हो गये । और आज वही पाकिस्तान की वजह से देश के बजट का एक बड़ा हिस्सा रक्षा क्षेत्र में बर्बाद हो रहा है और कश्मीर में न जाने कितने जवान शहीद हो चुके है ।
बाद में इसी हिंदू महासभा के नाथूराम गोडसे ने 30 जनवरी को गोली मारकर गाँधी जी की हत्या कर दी, उपरांत आरएसएस को आतंकी संगठन बताकर उन्हीं सरदार वल्लभभाई पटेल ने प्रतिबंध लगा दिया जिन्हें ये आज अपना बनाने पर तुले है । क्या ये पटेल को गवारा होता ? आप सोचिये

Thursday, 8 June 2017

देर आये, दुरुस्त आये

तमाम दिनों की तरह उस दिन भी किसानों को लेकर खबरें नहीं थी, और जो थी उनमें वो खलनायक थे, नायकत्व का भाव कहीं था ही नहीं । फिर 2 किसानों के मरने की अचानक ब्रेकिंग न्यूज़ दिखी ।
कुछ देर बार ज़िला कलेक्टर जी बोल रहे थे मरने वाले किसान नहीं, असामाजिक तत्व थे ।

फिर MP के गृहमंत्री का बयान आया कि वो पुलिस की गोली से नहीं मरे बल्कि कुछ असामाजिक तत्वों की गोलियों से मरे ।
इसके बाद एक घोषणा हुई कि मृतकों को पैसा और नौकरी दी जायेगी ।
लेकिन जिस खबर का इंतजार कर रहा था वो कहीं भी नहीं दिखी, इंतजार था उनकी माँगे माने जाने का पर वो इंतजार ही रहा । खैर ये कोई पहली बार नहीं हो रहा था, इसलिये आदतन ज्यादा दुःख नहीं हुआ । पर दुःख तब हुआ जब कुछ सरकार समर्थित लोगों, उनके सोशल मीडिया पर ये झूठी खबरें फैलाई गई कि जो आंदोलनरत है वो किसान नहीं, असामाजिक तत्व है, कांग्रेसी है । इसके पीछे तर्क दिया गया कि किसान जीन्स कबसे पहनने लगे । एकाएक कुछ दिन पहले जंतर मंतर पर बैठे तमिल किसानों के साथ हुई वो मुलाकात और उनके अहिंसक तरीके आँखों मे घूमने लगे । तब भी उन किसानों को मजाक बनाया गया था कि वो किसान नहीं बल्कि NGO वाले है, बिसलेरी का पानी पीते है, रेस्टॉरेंट से मंगाया खाना खाते है । और कम्युनिस्ट है । तब भी इनका उद्देश्य किसानों को किसान न बताकर असामाजिक तत्व बताना था और अब भी यही है । पर क्या मैं जान सकता हूँ कि वहाँ जंतर-मंतर पर मोदी जी "प्याऊ" लगाकर बैठे थे क्या ? या कौनसा आरएसएस ने "लंगर" लगाया था ? ऐसे ही अब MP के कौनसा नियम है कि किसान केवल फटी हुई धोती-कुर्ता ही पहनेगा ?
सरकार, किसान वही तो मांग रहे जिसका वादा आपने लोकसभा चुनाव में किया था । इसमें क्या जींस, क्या बिसलेरी बोतल, क्या होटल का खाना और क्या कांग्रेस, aap, वामपंथी ! बहाने मत बनाओ, वादा पूरा कीजिये

अब बात करते है कि किसानों को आंदोलन की जरूरत ही क्यों पड़ी आखिरकार ? यह जानने के लिये आपके सामने कुछ तथ्य रख रहा हूँ :-

- 1996 से लेकर अब तक केंद्र की सरकारों ने उद्योगपतियों और व्यापारियों का 6 लाख करोड़ का कर्ज माफ किया है जबकि किसानों का कुल कर्ज 78 हज़ार करोड़ है ।

- "1970 और 2015 के बीच गेहूं का खरीद मूल्य सिर्फ 19 गुना बढ़ा है, जबकि इसी अवधि में सरकारी कर्मचारी की आमदनी 120 से 150 गुना, कॉलेज टीचर्स की 150 से 170 गुना, और स्कूल टीचर्स की 280 से 320 गुना बढ़ गयी है. फिर कर्मचारियों को कुल 108 भत्ते मिलते हैं जबकि किसान को एक भी भत्ता नहीं मिलता है । मैच किसान के खिलाफ फिक्स है" - देवेंदर शर्मा

- किसान को अगर एक कुशल मजदूर मानकर उसकी दैनिक मजदूरी 622/- रुपये प्रतिदिन के हिसाब से सालभर की मजदूरी ही ₹ 2,27,030  रुपए बनती हैं, एक परिवार में 3 वयस्क किसान भी माने तो सालाना श्रम की कीमत ₹6,81,090 बैठती है । जबकि कमाई राष्ट्रीय आय के हिसाब से देखें तो मजदूर से भी 1/3 बैठती है ।

- 2012-13 के नेशनल सैंपल सर्वे ऑफिस के अनुसार, पंजाब के किसानों की औसत मासिक आमदनी 18,059 रुपये थी, इसके बाद हरियाणा के किसानों की मासिक आमदनी 14, 434 रुपये थी, इनमें सबसे कम बिहार के किसानों की मासिक आमदनी थी 3,588 रुपये । इस सर्वे के अनुसार, भारत के किसानों की औसत मासिक आमदनी होती है, मात्र 6,426 रुपये और दैनिक होती है 211 रुपये

- दूसरा आंकड़ा आर्थिक सर्वे 2016 का है, जिसका ज़िक्र देवेंद्र शर्मा ने अपने लेख में किया है. यह आंकड़ा नेशनल सैंपल सर्वे की तरह पूरे देश का नहीं है, सिर्फ 17 राज्यों का है, जिसके अनुसार किसानों की मासिक आमदनी मात्र 1700 रुपये हैं । प्रति वर्ष 20,000 रुपये. दोनों में तुलना ठीक नहीं रहेगी, मगर अंदाज़ा मिलता है जो बहुत ख़तरनाक है. नेशनल सैंपल सर्वे के अनुसार, 2012-13 में किसान की मासिक आमदनी 6, 426 रुपये थी. 2016 के आर्थिक सर्वे के अनुसार, 1700 रुपये हो गई ।

- 2012 से 2017 के बीच किसानों की मासिक आमदनी में 4,726 रुपये की कमी आई है । तब किस आधार पर दावा किया जा रहा है कि पांच साल बाद आमदनी दुगनी हो जाएगी ।

- 2016 के हिसाब से 1700, अगर 2022 में 34,00 रुपये हो भी गई, तो क्या ये बहुत होगा ?

- देश के राष्ट्रीय आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यम ने कुछ समय पहले एक और ताज़ा आंकड़ा दिया जिसके अनुसार किसान की मासिक आय 1600 रुपये है ।
( उपरोक्त तथ्यों पर रविश कुमार की एक रिपोर्ट )
- फसलों की MSP तय करने मे और नीति आयोग में एक भी किसान नहीं । अधिकारी तय करते है । मौजाम्बिक के किसानो से 5 साल तक दाले MSP पर खरीदने का समझौता हुआ पर भारत मे MSP पर खरीद नहीं ।

- उद्योगपति फायदा उठाते है और किसान नुकसान जैसे चना, दाल की श्रेणी मे नहीं इसलिए स्टोक लिमिट भी नहीं । अडाणी ने चना दाल मे कमाया फिर अडानी के लिये मौजाम्बिक से मोदीजी और म्यामार से सुषमा जी अरहर दाल ले आई ।

- किसान आयोग सँवैधानिक दर्जा प्राप्त नहीं है साथ ही बीजेपी ने सुप्रीम कोर्ट मे हल्पनामा भी दिया है कि स्वामीनाथन रिपोर्ट लागू नहीं कर सकते ।

- सोयल हेल्थ कार्ड व बीमा व नीम कोटिंग यूरिया देकर 3 साल में 3 कदम उठाये पर इनसे किसानों के बजाय फायदे के नुकसान अधिक हुआ । जैसे बीमा कंपनियां ₹21500 हजार करोड़ रूपये लेकर उसका मात्र् 3.3% बाँटकर किसानों का हित करने का दावा कर रहे है ।

- FCI जल्दी ही खत्म अडाणी सैलो बनाकर स्टोक करेगा सरकारी अनुमति पँजाब मे काम शुरू

- बेयर, मोन्टेस्टो जैसे कंपनियों ने अच्छे बीज देने के नाम पर देशी बीज खत्म कर GM बीज लाये, जिसमें मिले अनाज में अंकुरण की क्षमता नहीं होने से बीजों के लिये पूर्णतया बाजार पर निर्भरता


- गेहूँ के भाव वैज्ञानिक देवेन्द्र शर्मा के अनुसार 1625 की जगह 7650 हो ।

- बाजार भाव देखने के लिये यहाँ click करें  http://news.raftaar.in/business/mandi-rates

- एक अलग पचड़ा और भी है जिसका अभी लोगों को ज्यादा पता नहीं है, नाम है World Trade Organization.
WTO की नीति गांव से शहर मजदूर भेजो जिससे बाजार को सस्ते मजदूर मिले और लागत में कमी आये जिससे पूंजीपतियों का मुनाफा और बढ़े । साथ ही खेती बँद होने से भारत अनाज आयात करे ।

- ऊपर दिए गए आँकड़ों से पता चलता है कि सबसे ज्यादा आत्महत्या करने वाले राज्यों में सत्ता बीजेपी या NDA के पास है और सभी मे स्वामीनाथन आयोग की रिकमन्डेसन्स लागू करने का वादा करके सत्ता में आई है ।

- महँगाई दर तक पिछले तीन सालों में हर छह महिने में 3% बढ़ती रही मगर किसान की उपज पर एक भी पैसा नहीं बढ़ाया गया ! कुल मिलाकर आर्थिक मोर्चे पर किसान बेहद कमजोर हो गए ।

आंदोलन की नींव कहाँ से पड़ी ?

वर्तमान केंद्रसरकार ने लोकसभा चुनाव के वक्त हिन्दी वाले घोषणापत्र के पेज नंबर 26 पर किसानों से वादा किया था कि सरकार में आने के बाद ऐसे कदम उठाए जाएंगे कि जिससे कृषि क्षेत्र में लाभ बढ़े । यह सुनिश्चित किया जाएगा कि लागत का 50 फीसदी लाभ हो ।

किसान आंदोलन शुरू कैसे  हुआ ?

आंदोलन की शुरुआत हुई महाराष्ट्र के अहमदनगर से, जहां महाराष्ट्र सरकार ने किसानों से कर्ज माफी का वादा किया, लेकिन वादा पूरा नहीं किया । लेकिन इन सब में आग में घी डाला UP सरकार की कर्ज माफी की घोषणा ने । छोटे-बड़े किसान संगठन, नेता इकट्ठा होकर 1 जून से किसान क्रांति मोर्चा के नाम से आंदोलन शुरू कर दिया गया जिसके अनुसार वो शहरों को सप्लाई होने वाली रोजमर्रा की चीजें बंद कर देंगे और इस बार खरीफ की फसल में केवल अपनी जरूरतभर की चीजें ही पैदा करेंगे । इस आंदोलन की खास बात यह रही कि इसका कोई चेहरा नहीं है, यह एक सामूहिक चेतना से बना आंदोलन है जो लगातार फैलता जा रहा है ।
आंदोलन में किसानों की प्रमुख मांगें है :-

1) कर्ज माफ किया जाए।
2) प्रोडक्शन कॉस्ट से 50% ज्यादा मिनिमम सपोर्ट प्राइस (MSP) मिले।
3) स्वामीनाथन कमेटी की सिफारिशें लागू हों।
4) बिना ब्याज के लोन मिले
6) माइक्रो इरीगेशन इक्विपमेंट्स के लिए फुल सब्सिडी मिले।
7)  60 साल और उससे ज्यादा उम्र के किसानों के लिए पेंशन स्कीम हो।
8) सरकारी डेयरी में दूध का रेट बढ़ाकर 50 रुपए/लीटर किया जाए ।

स्वामीनाथन आयोग क्या है ?

18 नवंबर, 2004 को प्रोफेसर एमएस स्वामीनाथन की अध्यक्षता में नेशनल कमीशन फॉर फॉर्मर्स का गठन किया गया, जिसने भूमि सुधार, किसानों की परेशानियां, सिंचाई, प्रोडक्टिविटी, क्रेडिट और इंश्योरेंस, फूड सिक्युरिटी, किसानों की अात्महत्या, प्रतिस्पर्धा, रोजगार, बायोरिसोर्स जैसे मुद्दों पर सुझाव दिए थे । स्वामीनाथन आयोग के प्रमुख सुझाव निम्न थे :-
- किसी फसल के प्रोडक्शन पर जितना खर्च आ रहा है, सरकार उससे डेढ़ गुना ज्यादा दाम दिलाए।
- सरप्लस और बेकार जमीनों को बांटा जाए।
- एग्रीकल्चर लैंड और जंगलों को नॉन-एग्रीकल्चर यूज के लिए कॉरपोरेट सेक्टर्स को देने पर रोक लगे।
- जंगलों में आदिवासियों और चरवाहों को जाने की इजाजत हो, साथ ही कॉमन रिसोर्स पर जाने की इजाजत भी मिले।
- नेशनल लैंड यूज एडवाइजरी सर्विस का गठन किया जाए, ताकि लैंड यूज का फैसला पर्यावरण-मौसम और मार्केटिंग फैक्टर्स को ध्यान में रखकर हो।
- एग्रीकल्चर लैंड की बिक्री को रेगुलेट करने के लिए मैकनिज्म बनाया जाए, जिसमें जमीन, प्रपोजल और खरीदार की कैटेगरी को ध्यान में रखा जाए।

अंत मे मुझे किसानों के मुद्दों पर मुखर राय रखने वाले हनुमान राम चौधरी की एक बात याद आती है, जिसमें उन्होंने कहा  "मँहगाई के विरोध किसान का भोलापन है, उत्पादक कहे कि मँहगाई न हो तो वो ईश्वर ही है ।"

जो लोग आज इस किसान आंदोलन का विरोध कर रहे है वो चाहते है कि इस देश के किसान खेतों में आँसू बहाते प्याज और बासी सूखी रोटी खाए और चुपचाप आने वाली मौत का खेत में इंतजार करे जबकि बच्चों को बॉर्डर पर मरने के लिये भेज दे । बाकी ये लोग मजे करे ।
इसलिये आवाज उठाओ अगर अपना अस्तित्व बचाना है तो

डॉ कलाम को श्रद्धांजलि

डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम (Avul Pakir Jainulabdeen Abdul Kalam ) का जन्म 15 October 1931 को तमिलनाडु के Rameswaram में हुआ । इन्होंने 1960 ...