कुछ साथी लगातार सवाल कर रहे है कि सरकार भगतसिंह को और भगतसिंह के लिखे हुये को पाठ्यक्रम में शामिल क्यों नहीं करती ? इसके पीछे वो तर्क देते है कि भगतसिंह की स्वीकार्यता गाँधी, पटेल, सुभाषचंद्र बोस, नेहरू, इंदिरा, जयप्रकाश नारायण के बराबर या ज्यादा ही रही है तो लोगों को पता लगने देना चाहिये कि भगतसिंह कौन थे और उनके विचार क्या थे ?
साथियों, आपके इस सुझाव से 100% सहमत हूँ । अकेला मैं ही नहीं देश की अधिकांश आबादी सहमत होगी । आज भगतसिंह का नाम तो बड़ा बन गया है पर उनके विचार बड़े नहीं बन पाए । इसका परिणाम ये हुआ कि भगतसिंह के विरोधी विचारों वाले लोग भी भगतसिंह के नाम पर ठेकेदारी करने लग गए ।
भगतसिंह का एक लेख था, " मैं नास्तिक क्यों ? " जिसमें उन्होंने बताया कि वो नास्तिक क्यों बने, कैसे बने, ईश्वरीय सत्ता को क्यो नकारा, ईश्वर के नाम पर कैसे लोगों को बहकाया जाता है, कैसे धर्म के नाम पर मानसिक विकार उत्पन्न किये जाते है, अध्यात्म, धर्म से होते हुये कैसे एक धंधा बन गया है आदि आदि । उपरोक्त सवालों के जवाब उन्होंने आज से करीब 90 साल पहले दे दिए थे पर आज भी धर्म की समस्या ज्यों की त्यों मुँह बाये खड़ी है या यूँ कहूँ कि उससे ज्यादा विकृत अवस्था में है । और आज जो भगतसिंह के नाम पर संगठन बने है वो उनकी इस शिक्षा को पढ़े बिना हर वो काम कर रहे है जो भगतसिंह ने करने को मना किया था, इसमें सबसे बड़ा नाम भगतसिंह क्रांति सेना का है जो धर्म की राजनीति का बढ़ चढ़कर समर्थन करती है ।
वहीं दूसरी ओर मान लो यदि आज स्कूली पाठ्यक्रम में "मैं नास्तिक क्यों ?" पढ़ाया जाए तो सबसे बड़ा सवाल खड़ा होगा अल सुबह होने वाली ईश्वरीय/सरस्वती वंदना पर । इस ब्राह्मणवादी शिक्षा व्यवस्था को मजबूत करने वाली सबसे महत्वपूर्ण कड़ी को ही जब छात्र नकार देगा तो धार्मिक दुकानें हिलना लाजिमी है ।
भगतसिंह ने छात्रों और युवाओं को सम्बोधित करते हुए 2 पत्र लिखे, जिसमें पहला था 1928 में कीर्ति में छपा " विद्यार्थी और राजनीति ", जिसमें वो कहते है "जिन नौजवानों को कल देश की बागडोर हाथ में लेनी है, उन्हें आज अक्ल के अन्धे बनाने की कोशिश की जा रही है। इससे जो परिणाम निकलेगा वह हमें खुद ही समझ लेना चाहिए। यह हम मानते हैं कि विद्यार्थियों का मुख्य काम पढ़ाई करना है, उन्हें अपना पूरा ध्यान उस ओर लगा देना चाहिए लेकिन क्या देश की परिस्थितियों का ज्ञान और उनके सुधार सोचने की योग्यता पैदा करना उस शिक्षा में शामिल नहीं?यदि नहीं तो हम उस शिक्षा को भी निकम्मी समझते हैं, जो सिर्फ क्लर्की करने के लिए ही हासिल की जाये। ऐसी शिक्षा की जरूरत ही क्या है? कुछ ज्यादा चालाक आदमी यह कहते हैं- “काका तुम पोलिटिक्स के अनुसार पढ़ो और सोचो जरूर, लेकिन कोई व्यावहारिक हिस्सा न लो। तुम अधिक योग्य होकर देश के लिए फायदेमन्द साबित होगे।” बात बड़ी सुन्दर लगती है, लेकिन हम इसे भी रद्द करते हैं,क्योंकि यह भी सिर्फ ऊपरी बात है। "
और दूसरा लेख ( सन्देश ) था 1929 में पंजाब छात्रसंघ में पढ़कर सुनाया गया, जिसकी अध्यक्षता सुभाष चन्द्र बोस ने की थी, वो लिखते है कि
" इस समय हम नौजवानों से यह नहीं कह सकते कि वे बम और पिस्तौल उठाएँ। आज विद्यार्थियों के सामने इससे भी अधिक महत्वपूर्ण काम है। आनेवाले लाहौर अधिवेशन में कांग्रे़स देश की आज़ादी की लड़ाई के लिए जबरदस्त लड़ाई की घोषणा करने वाली है। राष्ट्रीय इतिहास के इन कठिन क्षणों में नौजवानों के कन्धों पर बहुत बड़ी जिम्मेदारी आ पड़ेगी। यह सच है कि स्वतन्त्रता के इस युद्ध में अग्रिम मोर्चों पर विद्यार्थियों ने मौत से टक्कर ली है। क्या परीक्षा की इस घड़ी में वे उसी प्रकार की दृढ़ता और आत्मविश्वास का परिचय देने से हिचकिचाएँगे? नौजवानों को क्रांति का यह सन्देश देश के कोने-कोने में पहुँचाना है, फैक्टरी कारखानों के क्षेत्रों में, गंदी बस्तियों और गाँवों की जर्जर झोपड़ियों में रहने वाले करोड़ों लोगों में इस क्रांति की अलख जगानी है, जिससे आजादी आएगी और तब एक मनुष्य द्वारा दूसरे मनुष्य का शोषण असम्भव हो जाएगा। पंजाब वैसे ही राजनीतिक तौर पर पिछड़ा हुआ माना जाता है। इसकी भी जिम्मेदारी युवा वर्ग पर ही है। आज वे देश के प्रति अपनी असीम श्रद्धा और शहीद यतीन्द्रनाथ दास के महान बलिदान से प्रेरणा लेकर यह सिद्ध कर दें कि स्वतन्त्रता के इस संघर्ष में वे दृढ़ता से टक्कर ले सकते हैं। "
अब वापस लौटते है भगतसिंह को पाठ्यक्रम में शामिल करने के मुद्दे पर, इसके लिये हमें सबसे पहले भगतसिंह के विद्यार्थियों के नाम लिखे उपरोक्त तीनों पत्र पढ़ने बहुत जरूरी है । इन पत्रों को पढ़ने के बाद एक चीज साफ साफ समझ आती है, वो है जुल्म न सहने और हक़ की लड़ाई का संदेश । अब आप सोचिये कि भगतसिंह को यदि पाठ्यक्रम में शामिल किया तो
- ब्राह्मणवादी व्यवस्था के खिलाफ खड़े होंगे
- छात्र अपने अधिकार जान जाएंगे
- राजनीतिक रूप से परिपक्व हो जायेंगे
- हुक्मरानों से सवाल करेंगे
और यदि ये सब हुआ तो जाहिर सी बात शोषक वर्ग की जड़ें हिल जायेगी और जल्द ही उनकी सत्ता के खिलाफ जनक्रांति हो जायेगी जिसमें सत्ता जनता के हाथों में होगी और शोषक या तो मार दिए जाएंगे या काल कोठरी में भेज दिए जाएंगे, उनकी पूँजी लोकहित में राष्ट्रीय संपदा घोषित कर दी जायेगी ।
तो अब आप ही बताइये कि कौन अपने जमे जमाये साम्राज्यों के खिलाफ किसी को खड़ा होने देना चाहेगा ? इसलिये हमें ये उम्मीद करनी छोड़ देनी चाहिये कि सत्तासीन भगतसिंह की बातें आमजन तक पहुँचने देंगे, क्योंकि भगतसिंह की शिक्षा, व्यवस्था में फैले जुल्म और अन्याय के खिलाफ बागी तैयार करती है ।
"तैयार करो एक ऐसी फौज,
जो ...
हम कहे तो चले,
हम कहे तो रुके,
हम कहें तो बोले,
हम कहे तो खामोश,
हम कहें तो मारे,
हम कहें तो बख्शे"
शाह ने फरमाया
"हुजूर,
गुस्ताखी के लिये मुआफी,
पर ..
एक दिक्कत है,
फौज में होंगे लोग,
और
लोग वैसा ही करे जैसा हम कहे
ये जरूरी नहीं,
क्योंकि...
वाे सोच सकते है,
इसलिये फौज में जानवर रखो, इंसान नहीं "
शाह ने आगे फरमाया
"जानवर भरने से अच्छा,
इन्ही लोगों में भर दो - भूख/गरीबी/डर और अंधविश्वास
और मिला दो थौङा सा जाति, धर्म का बारूद,
फिर शोषण का दु:ख और मौत का भय होगा,
फिर दिलों में बदले की आग और इन्सानियत की राख होगी"
( यह कविता आज पाश के जन्मदिन पर लिखी थी । इसमें पहले 2 पैरा मेरे लिखे है और अंतिम पैरा साथी सुमित ने लिखा है )
आज भारत छोड़ो आंदोलन के 75 साल बाद भी आरएसएस के स्वयंसेवक नरेंद्र मोदी और अन्य संघ नेताओं को गाँधी जी की मजबूरी में तारीफ करनी पड़ रही है तो ये कहीं न कहीं उनका प्रताप ही है । गाँधी जी का राष्ट्रवाद आज के संघी राष्ट्रवाद की तरह दिखावटी या सतही राष्ट्रवाद नहीं था । तब देश के हर क्षेत्र, धर्म, जाति, वर्ग के लोगों ने गाँधीजी के साथ आज़ादी की लड़ाई में "करो या मरो" का प्रण लिया था, संघ के नेताओं की तरह मैदान छोड़कर भागे नहीं थे ।
ये इतिहास का वो काला सच है जिसको आज छिपाने का प्रयास किया जाता है । आरएसएस के दूसरे प्रमुख एम एस गोलवलकर ने 24 मार्च, 1936 को आरएसएस प्रचारक कृष्णराव वाडेकर को एक चिठ्ठी लिखी, जिसमें लिखा "क्षणिक उत्साह और भावनात्मक उद्वेलन से पैदा हुये कार्यक्रमों से संघ को दूर रहना चाहिये । इस तरह से अंग्रेजी शासन को उखाड़ फेंकने की कोशिश 'सतही राष्ट्रवाद' है । अभी आप धूले जलगांव इलाके में संघ की शाखा स्थापित करने पर ध्यान दीजिये ।"
इनके प्रणेता सावरकर ने तो बाकायदा अंग्रेजों से वादा किया था कि वो कालापानी से छूटने के बाद अंग्रेजों के खिलाफ किसी भी राजनीतिक क्रियाकलापों में शामिल नहीं होंगे । आगे चलकर बंगाल में सावरकर की हिन्दू महासभा ने मुस्लिम लीग के साथ मिलकर न सिर्फ सरकार बनाई बल्कि उपमुख्यमंत्री समेत कई पद लेकर सत्ता सुख भी भोगा । तब मुख्यमंत्री पद पर मुस्लिम लीग की तरफ से फजल-उल-हक और उपमुख्यमंत्री पद पर हिंदू महासभा की तरफ से श्यामा प्रसाद मुखर्जी आसीन हुए ।
तब श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने 6 जुलाई, 1942 को गवर्नर को आधिकारिक तौर पर लिखा था- "सवाल ये है कि बंगाल में भारत छोड़ो आंदोलन का सामना कैसे किया जाये? प्रशासन को इस तरह से चलाया जाये कि कांग्रेस की भरसक कोशिश के बाद भी ये आंदोलन बंगाल में अपनी जड़ें न जमा पाये, असफल हो जाये ... भारतीयों को ब्रिटिशर्स पर यकीन करना होगा ।"
भले ही लाख गालियाँ दे ले पर गाँधीजी ने जो किया उसी की वजह से तब आज़ादी मिली थी । और जो आज देशभक्ति की बड़ी बड़ी बातें कर रहे है न तब वो और उनके नेता अंग्रेजों की चमचागिरी या उनसे माफी मांग रहे थे । देश के 2 टुकड़े कराने में भी इसी संघ का पूरा-पूरा योगदान था, 2 नेशन थ्योरी सिर्फ मुस्लिम लीग की नहीं थी, आरएसएस और हिन्दू महासभा का भी वही स्टैंड था जो जिन्ना का था ।
सबसे पहले सावरकर ने 1923 में प्रकाशित अपनी किताब हिंदुत्व में हिंदू राष्ट्र का सिद्धांत रखा । जो बाद में 30 दिसंबर 1937 को हिन्दू महासभा के अधिवेशन में अपने अध्यक्षीय भाषण में कहा " यहाँ 2 देश होने चाहिये, हिंदुओ का हिंदुस्तान और मुस्लिमो का अलग"
इसी को आधार बनाकर मुस्लिम लीग के जिन्ना ने लाहौर अधिवेशन ( मार्च 1940, फजल-उल-हक की अध्यक्षता में ) में अलग पाकिस्तान की माँग की । जो आगे चलकर देश के टुकड़े कराने का कारण बनी और कई लाखों लोग मारे गए और बेघर हो गये । और आज वही पाकिस्तान की वजह से देश के बजट का एक बड़ा हिस्सा रक्षा क्षेत्र में बर्बाद हो रहा है और कश्मीर में न जाने कितने जवान शहीद हो चुके है ।
बाद में इसी हिंदू महासभा के नाथूराम गोडसे ने 30 जनवरी को गोली मारकर गाँधी जी की हत्या कर दी, उपरांत आरएसएस को आतंकी संगठन बताकर उन्हीं सरदार वल्लभभाई पटेल ने प्रतिबंध लगा दिया जिन्हें ये आज अपना बनाने पर तुले है । क्या ये पटेल को गवारा होता ? आप सोचिये
तमाम दिनों की तरह उस दिन भी किसानों को लेकर खबरें नहीं थी, और जो थी उनमें वो खलनायक थे, नायकत्व का भाव कहीं था ही नहीं । फिर 2 किसानों के मरने की अचानक ब्रेकिंग न्यूज़ दिखी ।
कुछ देर बार ज़िला कलेक्टर जी बोल रहे थे मरने वाले किसान नहीं, असामाजिक तत्व थे ।
फिर MP के गृहमंत्री का बयान आया कि वो पुलिस की गोली से नहीं मरे बल्कि कुछ असामाजिक तत्वों की गोलियों से मरे ।
इसके बाद एक घोषणा हुई कि मृतकों को पैसा और नौकरी दी जायेगी ।
लेकिन जिस खबर का इंतजार कर रहा था वो कहीं भी नहीं दिखी, इंतजार था उनकी माँगे माने जाने का पर वो इंतजार ही रहा । खैर ये कोई पहली बार नहीं हो रहा था, इसलिये आदतन ज्यादा दुःख नहीं हुआ । पर दुःख तब हुआ जब कुछ सरकार समर्थित लोगों, उनके सोशल मीडिया पर ये झूठी खबरें फैलाई गई कि जो आंदोलनरत है वो किसान नहीं, असामाजिक तत्व है, कांग्रेसी है । इसके पीछे तर्क दिया गया कि किसान जीन्स कबसे पहनने लगे । एकाएक कुछ दिन पहले जंतर मंतर पर बैठे तमिल किसानों के साथ हुई वो मुलाकात और उनके अहिंसक तरीके आँखों मे घूमने लगे । तब भी उन किसानों को मजाक बनाया गया था कि वो किसान नहीं बल्कि NGO वाले है, बिसलेरी का पानी पीते है, रेस्टॉरेंट से मंगाया खाना खाते है । और कम्युनिस्ट है । तब भी इनका उद्देश्य किसानों को किसान न बताकर असामाजिक तत्व बताना था और अब भी यही है । पर क्या मैं जान सकता हूँ कि वहाँ जंतर-मंतर पर मोदी जी "प्याऊ" लगाकर बैठे थे क्या ? या कौनसा आरएसएस ने "लंगर" लगाया था ? ऐसे ही अब MP के कौनसा नियम है कि किसान केवल फटी हुई धोती-कुर्ता ही पहनेगा ?
सरकार, किसान वही तो मांग रहे जिसका वादा आपने लोकसभा चुनाव में किया था । इसमें क्या जींस, क्या बिसलेरी बोतल, क्या होटल का खाना और क्या कांग्रेस, aap, वामपंथी ! बहाने मत बनाओ, वादा पूरा कीजिये
अब बात करते है कि किसानों को आंदोलन की जरूरत ही क्यों पड़ी आखिरकार ? यह जानने के लिये आपके सामने कुछ तथ्य रख रहा हूँ :-
- 1996 से लेकर अब तक केंद्र की सरकारों ने उद्योगपतियों और व्यापारियों का 6 लाख करोड़ का कर्ज माफ किया है जबकि किसानों का कुल कर्ज 78 हज़ार करोड़ है ।
- "1970 और 2015 के बीच गेहूं का खरीद मूल्य सिर्फ 19 गुना बढ़ा है, जबकि इसी अवधि में सरकारी कर्मचारी की आमदनी 120 से 150 गुना, कॉलेज टीचर्स की 150 से 170 गुना, और स्कूल टीचर्स की 280 से 320 गुना बढ़ गयी है. फिर कर्मचारियों को कुल 108 भत्ते मिलते हैं जबकि किसान को एक भी भत्ता नहीं मिलता है । मैच किसान के खिलाफ फिक्स है" - देवेंदर शर्मा
- किसान को अगर एक कुशल मजदूर मानकर उसकी दैनिक मजदूरी 622/- रुपये प्रतिदिन के हिसाब से सालभर की मजदूरी ही ₹ 2,27,030 रुपए बनती हैं, एक परिवार में 3 वयस्क किसान भी माने तो सालाना श्रम की कीमत ₹6,81,090 बैठती है । जबकि कमाई राष्ट्रीय आय के हिसाब से देखें तो मजदूर से भी 1/3 बैठती है ।
- 2012-13 के नेशनल सैंपल सर्वे ऑफिस के अनुसार, पंजाब के किसानों की औसत मासिक आमदनी 18,059 रुपये थी, इसके बाद हरियाणा के किसानों की मासिक आमदनी 14, 434 रुपये थी, इनमें सबसे कम बिहार के किसानों की मासिक आमदनी थी 3,588 रुपये । इस सर्वे के अनुसार, भारत के किसानों की औसत मासिक आमदनी होती है, मात्र 6,426 रुपये और दैनिक होती है 211 रुपये
- दूसरा आंकड़ा आर्थिक सर्वे 2016 का है, जिसका ज़िक्र देवेंद्र शर्मा ने अपने लेख में किया है. यह आंकड़ा नेशनल सैंपल सर्वे की तरह पूरे देश का नहीं है, सिर्फ 17 राज्यों का है, जिसके अनुसार किसानों की मासिक आमदनी मात्र 1700 रुपये हैं । प्रति वर्ष 20,000 रुपये. दोनों में तुलना ठीक नहीं रहेगी, मगर अंदाज़ा मिलता है जो बहुत ख़तरनाक है. नेशनल सैंपल सर्वे के अनुसार, 2012-13 में किसान की मासिक आमदनी 6, 426 रुपये थी. 2016 के आर्थिक सर्वे के अनुसार, 1700 रुपये हो गई ।
- 2012 से 2017 के बीच किसानों की मासिक आमदनी में 4,726 रुपये की कमी आई है । तब किस आधार पर दावा किया जा रहा है कि पांच साल बाद आमदनी दुगनी हो जाएगी ।
- 2016 के हिसाब से 1700, अगर 2022 में 34,00 रुपये हो भी गई, तो क्या ये बहुत होगा ?
- देश के राष्ट्रीय आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यम ने कुछ समय पहले एक और ताज़ा आंकड़ा दिया जिसके अनुसार किसान की मासिक आय 1600 रुपये है ।
( उपरोक्त तथ्यों पर रविश कुमार की एक रिपोर्ट )
- फसलों की MSP तय करने मे और नीति आयोग में एक भी किसान नहीं । अधिकारी तय करते है । मौजाम्बिक के किसानो से 5 साल तक दाले MSP पर खरीदने का समझौता हुआ पर भारत मे MSP पर खरीद नहीं ।
- उद्योगपति फायदा उठाते है और किसान नुकसान जैसे चना, दाल की श्रेणी मे नहीं इसलिए स्टोक लिमिट भी नहीं । अडाणी ने चना दाल मे कमाया फिर अडानी के लिये मौजाम्बिक से मोदीजी और म्यामार से सुषमा जी अरहर दाल ले आई ।
- किसान आयोग सँवैधानिक दर्जा प्राप्त नहीं है साथ ही बीजेपी ने सुप्रीम कोर्ट मे हल्पनामा भी दिया है कि स्वामीनाथन रिपोर्ट लागू नहीं कर सकते ।
- सोयल हेल्थ कार्ड व बीमा व नीम कोटिंग यूरिया देकर 3 साल में 3 कदम उठाये पर इनसे किसानों के बजाय फायदे के नुकसान अधिक हुआ । जैसे बीमा कंपनियां ₹21500 हजार करोड़ रूपये लेकर उसका मात्र् 3.3% बाँटकर किसानों का हित करने का दावा कर रहे है ।
- FCI जल्दी ही खत्म अडाणी सैलो बनाकर स्टोक करेगा सरकारी अनुमति पँजाब मे काम शुरू
- बेयर, मोन्टेस्टो जैसे कंपनियों ने अच्छे बीज देने के नाम पर देशी बीज खत्म कर GM बीज लाये, जिसमें मिले अनाज में अंकुरण की क्षमता नहीं होने से बीजों के लिये पूर्णतया बाजार पर निर्भरता
- गेहूँ के भाव वैज्ञानिक देवेन्द्र शर्मा के अनुसार 1625 की जगह 7650 हो ।
- बाजार भाव देखने के लिये यहाँ click करें http://news.raftaar.in/business/mandi-rates
- एक अलग पचड़ा और भी है जिसका अभी लोगों को ज्यादा पता नहीं है, नाम है World Trade Organization.
WTO की नीति गांव से शहर मजदूर भेजो जिससे बाजार को सस्ते मजदूर मिले और लागत में कमी आये जिससे पूंजीपतियों का मुनाफा और बढ़े । साथ ही खेती बँद होने से भारत अनाज आयात करे ।
- ऊपर दिए गए आँकड़ों से पता चलता है कि सबसे ज्यादा आत्महत्या करने वाले राज्यों में सत्ता बीजेपी या NDA के पास है और सभी मे स्वामीनाथन आयोग की रिकमन्डेसन्स लागू करने का वादा करके सत्ता में आई है ।
- महँगाई दर तक पिछले तीन सालों में हर छह महिने में 3% बढ़ती रही मगर किसान की उपज पर एक भी पैसा नहीं बढ़ाया गया ! कुल मिलाकर आर्थिक मोर्चे पर किसान बेहद कमजोर हो गए ।
आंदोलन की नींव कहाँ से पड़ी ?
वर्तमान केंद्रसरकार ने लोकसभा चुनाव के वक्त हिन्दी वाले घोषणापत्र के पेज नंबर 26 पर किसानों से वादा किया था कि सरकार में आने के बाद ऐसे कदम उठाए जाएंगे कि जिससे कृषि क्षेत्र में लाभ बढ़े । यह सुनिश्चित किया जाएगा कि लागत का 50 फीसदी लाभ हो ।
किसान आंदोलन शुरू कैसे हुआ ?
आंदोलन की शुरुआत हुई महाराष्ट्र के अहमदनगर से, जहां महाराष्ट्र सरकार ने किसानों से कर्ज माफी का वादा किया, लेकिन वादा पूरा नहीं किया । लेकिन इन सब में आग में घी डाला UP सरकार की कर्ज माफी की घोषणा ने । छोटे-बड़े किसान संगठन, नेता इकट्ठा होकर 1 जून से किसान क्रांति मोर्चा के नाम से आंदोलन शुरू कर दिया गया जिसके अनुसार वो शहरों को सप्लाई होने वाली रोजमर्रा की चीजें बंद कर देंगे और इस बार खरीफ की फसल में केवल अपनी जरूरतभर की चीजें ही पैदा करेंगे । इस आंदोलन की खास बात यह रही कि इसका कोई चेहरा नहीं है, यह एक सामूहिक चेतना से बना आंदोलन है जो लगातार फैलता जा रहा है ।
आंदोलन में किसानों की प्रमुख मांगें है :-
1) कर्ज माफ किया जाए।
2) प्रोडक्शन कॉस्ट से 50% ज्यादा मिनिमम सपोर्ट प्राइस (MSP) मिले।
3) स्वामीनाथन कमेटी की सिफारिशें लागू हों।
4) बिना ब्याज के लोन मिले
6) माइक्रो इरीगेशन इक्विपमेंट्स के लिए फुल सब्सिडी मिले।
7) 60 साल और उससे ज्यादा उम्र के किसानों के लिए पेंशन स्कीम हो।
8) सरकारी डेयरी में दूध का रेट बढ़ाकर 50 रुपए/लीटर किया जाए ।
स्वामीनाथन आयोग क्या है ?
18 नवंबर, 2004 को प्रोफेसर एमएस स्वामीनाथन की अध्यक्षता में नेशनल कमीशन फॉर फॉर्मर्स का गठन किया गया, जिसने भूमि सुधार, किसानों की परेशानियां, सिंचाई, प्रोडक्टिविटी, क्रेडिट और इंश्योरेंस, फूड सिक्युरिटी, किसानों की अात्महत्या, प्रतिस्पर्धा, रोजगार, बायोरिसोर्स जैसे मुद्दों पर सुझाव दिए थे । स्वामीनाथन आयोग के प्रमुख सुझाव निम्न थे :-
- किसी फसल के प्रोडक्शन पर जितना खर्च आ रहा है, सरकार उससे डेढ़ गुना ज्यादा दाम दिलाए।
- सरप्लस और बेकार जमीनों को बांटा जाए।
- एग्रीकल्चर लैंड और जंगलों को नॉन-एग्रीकल्चर यूज के लिए कॉरपोरेट सेक्टर्स को देने पर रोक लगे।
- जंगलों में आदिवासियों और चरवाहों को जाने की इजाजत हो, साथ ही कॉमन रिसोर्स पर जाने की इजाजत भी मिले।
- नेशनल लैंड यूज एडवाइजरी सर्विस का गठन किया जाए, ताकि लैंड यूज का फैसला पर्यावरण-मौसम और मार्केटिंग फैक्टर्स को ध्यान में रखकर हो।
- एग्रीकल्चर लैंड की बिक्री को रेगुलेट करने के लिए मैकनिज्म बनाया जाए, जिसमें जमीन, प्रपोजल और खरीदार की कैटेगरी को ध्यान में रखा जाए।
अंत मे मुझे किसानों के मुद्दों पर मुखर राय रखने वाले हनुमान राम चौधरी की एक बात याद आती है, जिसमें उन्होंने कहा "मँहगाई के विरोध किसान का भोलापन है, उत्पादक कहे कि मँहगाई न हो तो वो ईश्वर ही है ।"
जो लोग आज इस किसान आंदोलन का विरोध कर रहे है वो चाहते है कि इस देश के किसान खेतों में आँसू बहाते प्याज और बासी सूखी रोटी खाए और चुपचाप आने वाली मौत का खेत में इंतजार करे जबकि बच्चों को बॉर्डर पर मरने के लिये भेज दे । बाकी ये लोग मजे करे ।
इसलिये आवाज उठाओ अगर अपना अस्तित्व बचाना है तो
साहेब,
आप तो बहुत कमजोर निकले, सिर्फ एक चैनल के सवालों से घबरा गये ? एक चैनल भी पूरा कहाँ था, एक Ravish Kumar ही तो था । जनाब आपकी छाती नहीं, पेट 56 इंच का है इसलिये गिनती के कुछ सवालों से ही सांस फूलने लग गयी । मैं तो कहता हूँ आप भी रवीश के चैलेंज के जवाब में खुलेआम लालकारिये इंटरव्यू देने को, आखिर आपने काम किया है, तो डर कैसा ?
सामने आने की हिम्मत नहीं हो रही ?
होगी भी नहीं, जिस दिन एक इंटरव्यू रवीश को दे दिया न उस दिन जैसे आपकी कागजी जीडीपी नीचे आयी है न, वैसे ही आपका कार्यकाल नीचे न आ पड़े तो कहना !
वर्तमान परिदृश्य में आप अकेले नेता है जो बात करते है लोकतंत्र की और काम करते है तानाशाही का, मुझे आज तक ये नहीं समझ आया कि आप भाषणों में इंदिरा गाँधी की इमरजेंसी के खिलाफ जिक्र करने के लिये इतनी बेशर्मी आखिर लाते कहाँ से है ? मुझे पता है आप और आपके चमचों पर मेरे इस पत्र का कोई असर नहीं पड़ने वाला फिर भी लिख रहा हूँ, क्योंकि लोकतंत्र में सरकार से सवाल करना लोगों हक़ है, ये चीज आपको जल्द से जल्द समझ लेनी चाहिये ।
तो इस बार सरकारी तोते का पिंजरा आखिरकार खुल ही गया, NDTV को सज़ा मिली है सवाल करने की, अपनी ड्यूटी करने की, लोगों को सच बताने की । मीडिया का काम विपक्ष का होता है न कि सरकारी प्रवक्ता का पर इन दिनों इस देश में उल्टी गंगा बह रही है, बोले तो नमामि गंगे के एकदम उलट हमामी नँगे, काम करने वालों को परेशान तो चमचागिरी करने वालों को ईनाम दिया जा रहा है । भारतीय मीडिया लोकतंत्र के खम्भे से शराब का खम्भा बनने की और तेजी से अग्रसर है । NDTV ही एकमात्र ऐसा चैनल है जो न तो बाकियों की तरह सुबह सुबह भविष्य बताने वालों को बैठाता है, न ही नोट में झूठी चिप डालता है, न रोज फालतू में trp के लिये दाऊद या पाकिस्तान को तहस नहस करता है, न ही फालतू के बॉलीवुड के ऊप्स मोमेंट्स को खबर बनाता है । इसे ही पत्रकारिता कहते है, बाकि चैनल जो करते है उसे चमचागिरी कहते है ।
NDTV को पिछले कुछ समय मे किस तरह परेशान किया गया, उसकी बानगी देखिये जरा :
सबसे पहले कथित संवेदनशील कन्टेंट मामले में एक दिन के लिए बैन
दूसरा ED द्वारा FEMA के नियमों का उल्लंघन करने को लेकर 2030 करोड़ रुपए का नोटिस जारी करना
तीसरा ICICI बैंक का कथित तौर पर 48 करोड़ के कर्जे का मामला, अव्वल तो बैंक ने इस मामले में सरकार से कोई जाँच की माँग ही नहीं की थी फिर भी मोदीजी का तोता खुद ही इस मामले में अपनी चोंच अड़ा रहा है
साहेब, हमारा विरोध NDTV पर पड़े छापे को लेकर नहीं है, औऱ Raid कीजिये पर हर बार निशाना NDTV ही क्यों ?
जनाब, पूरा देश आपके पिट्ठू चैनल्स की हक़ीक़त जानता है, क्या इन सवालों का जवाब भी मिलेगा कभी, जो नीचे साझा कर रहा हूँ :
क्या आपने कभी जानने की कोशिश की कि अर्नब गोस्वामी जो नया चैनल लाये है उसमें कितना पैसा, किसका लगा है और कितना धन काला या गोरा है ?
बीजेपी के समर्थन से MP बने और रक्षा सौदों के बिचौलिये राजीव चन्द्रशेखर का रिपब्लिक में पैसा लगाने का क्या उद्देश्य है ?
क्या आपने रजत शर्मा को पद्मभूषण इसलिये नहीं दिया कि वो आपके संगठन से आते है और खुल के आपकी आलोचना करने वालों के खिलाफ जमकर अभियान चलाते है ।
1 करोड़ की रिश्वत लेने के स्टिंग में आने के बाद तिहाड़ जेल की हवा खा आये सुधीर चौधरी आपके झूठे कसीदे पढ़ता है, और सरेआम झूठी खबरों से आये दिन मूल मुद्दों से ध्यान भटकाने के लिये देश को गुमराह करता है, ये कारवाई से सिर्फ इसलिये बचा है क्योंकि आपके विरोधियों के खिलाफ झूठी खबरें प्लांट करवाता है ।
क्या ज़ी मीडिया के मालिक सुभाष चंद्रा को आपकी पार्टी की सहायता से राज्यसभा नहीं भेजा गया ? वो भी विपक्ष के वोट खारिज करवा कर ? इस कृपा की वजह बताइये
इसी तरह आपकी 24 ×7 हाजिरी बजाने वाले चैनल्स को आपने कई अरबों की ऐड नहीं दी ? क्या ये उनका अहसान चुकाने के अनैतिक तरीका नहीं है ?
राजा महेंद्र प्रताप नाम तो नहीं सुना होगा !
कैसे सुनेंगे जब इतिहास में किसी ने इन्हें जगह ही नहीं दी तो । चलिये फ्रंटियर या सीमांत गांधी का नाम तो सुना ही होगा, वहीं अफगानी जिसने भारत को आज़ाद करवाने में सहयोग दिया, लेकिन राजा महेंद्र प्रताप का नाम कितने लोग जानते हैं, एक भी नहीं, इनके बारे जितना लिखूँ कम पड़ेगा जैसे इस इंटरनेशनल क्रांतिकारी का सही मायनों में मूल्यांकन किया जाए तो गांधी और बोस के बराबर का है, महेंद्र प्रताप वो व्यक्ति है जिसने देश के भावी पीएम को चुनावों में धूल चटा दी, ये वो क्रांतिकारी है जिसने 28 साल पहले वो काम कर दिया, जो नेताजी बोस ने 1943 में आकर किया। ये वो व्यक्ति है, जिसे गांधी की तरह ही नोबेल पुरस्कार के लिए नॉमिनेट किया गया और उन दोनों ही साल नोबेल पुरस्कार का ऐलान नहीं हुआ और पुरस्कार राशि स्पेशल फंड में बांट दी गई ।
चलो शुरू से शुरू करते है, महेन्द्र प्रताप का जन्म 1 दिसम्बर 1886 को हुआ । मुरसान के राजा घनष्यामसिंह के तीसरे पुत्र थे महेन्द्र प्रताप, जिन्हें बाद में हाथरस के राजा हरिनारायण सिंह ने पुत्र न होने की वजह से इन्हें गोद ले लिया और हाथरस राज्य के वृन्दावन स्थित विशाल महल में ही महेन्द्र प्रताप का षैशव काल बीता। बड़ी सुख सुविधाएँ मिली । फिर उनकी पढ़ाई मोहम्मडन एंग्लो ओरियंटल कॉलेज, अलीगढ़ में हुई, जो आज अलीगढ़ मुस्लिम यूनीवर्सिटी के तौर पर जाना जाता है। इन्होंने ने B.A. में अड्मिशन तो लिया पर पारिवारिक कारणों से अंतिम वर्ष की परीक्षा नहीं दे सके ।
इसके बाद 1902 में जिंद रियासत के राजा की राजकुमारी बलबीर कौर से संगरूर में बड़ी धूमधाम से विवाह हुआ। राजशाही ठाठ बाठ ऐसे कि जब कभी महेन्द्र प्रताप ससुराल जाते तो उन्हें 11 तोपों की सलामी दी जाती और उस समय के सभी बड़े अंग्रेज अफसर तक स्टेशन पर स्वागत करने आते ।
लेकिन महेंद्र प्रताप शुरू से ही आम शाही नवयुवकों की तरह नहीं थे। उनके पास मौका था कि वो भी राजाओं के बने संघ में शामिल होकर अंग्रेजों की दी जाने वाली सभी सुख सुविधाओं का आनंद उठाते और खुश रहते। लेकिन वो उनमें से नहीं थे, वो जन्म से ही बागी थे । 1905 के स्वदेशी आंदोलन से वो इतना प्रभावित हुए कि सबसे पहली बगावत 1906 में अपने ससुर और जिंद के महाराजा के खिलाफ ही कर दी, उनकी इच्छा के विरुद्ध महेन्द्र प्रताप ने कलकत्ता ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशन में भाग लिया । उसके बाद 1909 में वृन्दावन में प्रेम महाविद्यालय की स्थापना की जो तकनीकी शिक्षा के लिए भारत में प्रथम केन्द्र था। इसके उद्धाटन समारोह में मदनमोहन मालवीय भी उपस्थित रहे । महेंद्र प्रताप ने अपने अधीन के पाँच गाँव, वृन्दावन का राजमहल और चल संपत्ति दान में देकर कॉलेज संचालन के लिये एक ट्रस्ट भी बनाया । इसी साल पुत्री रत्न भक्ति की प्राप्ति हुई ।
1911 में वृन्दावन में ही एक विशाल फल उद्यान, जो 80 एकड़ में था, को आर्य प्रतिनिधि सभा उत्तर प्रदेश को दान में दे दिया। जिसमें आर्य समाज गुरुकुल और राष्ट्रीय विश्वविद्यालय है ।
फिर साल 1913 में इन्हें पुत्र रत्न प्रेम प्रताप की प्राप्ति हुई ।
महेंद्र प्रताप देहरादून से 'निर्बल सेवक' नामक समाचार-पत्र भी निकालते थे, जिसमें जर्मनी के पक्ष में लिखे लेख के कारण उन पर 500 रुपये का दण्ड किया गया जिसे उन्होंने भर तो दिया लेकिन देश की आजादी की उनकी इच्छा और बढ़ गयी ।
प्रथम विश्वयुद्ध का लाभ उठाकर भारत को आजादी दिलवाने के उद्देश्य से वे जर्मनी गए, जहाँ जर्मन शासक काइजर से मुलाकात की और भारत की आज़ादी में सहायता का वचन लेकर आॅस्ट्रिया, हंगरी, बुल्गारिया और तुर्की होते हुए 6 सितंबर, 1915 को अफगानिस्तान पहुंच गये। राजधानी काबुल में उन्होंने वहां के बादशाह अमीर हबीबुल्ला खान से भेंट की । अफगानिस्तान में ‘आजाद हिन्द सरकार’ की स्थापना के लिये सहमत हो गया । अंततः 29 अक्तूबर 1915 को अस्थाई "आजाद हिन्द सरकार" अस्तित्व मे आ गई । वहीं से अपने 28 वें जन्मदिन पर 1 दिसम्बर 1915 को काबुल से भारत के लिए अस्थाई सरकार की घोषणा की जिसके स्वयं राष्ट्रपति तथा मौलाना बरकतुल्ला खाँ प्रधानमंत्री बने ।
तत्कालीन भारत सरकार के पधादिकारी : -
1 राजा महेंद्र प्रताप राष्ट्रपति
2 मौलाना बक्र तुला खां प्रधानमंत्री
3 मौलाना उबेदुल्ला खां ग्रहमंत्री एवं प्रचार मंत्री
4 मौलाना वशीर अहमद युद्ध मंत्री
5 चम्पक रसन पिलेई विदेश मंत्री
6 अली जकरिया संचार मंत्री
7 अब्दुल बारी
8 अलाह नवाज
9 खुदा बख्स
10 मोहम्द अली
11 रहमत अली
12 जफर हसन
13 शमसेर सिंह
14 सरदार हरनाम सिंह
15 गुज्जर सिंह
16 अब्दुल अजीज
सबसे पहले इस सरकार को संधी पत्र पर अफगान बादशाह ने हस्ताक्षर करके मान्यता प्रदान की
अफगान सरकार की तरफ से वहाँ के बादशाह हाबिबुला खां ने तो भारत की और से राजा महेंद्र प्रताप ने हस्ताक्षर किए । जर्मनी, अफगानिस्तान और तुर्की सहित इंग्लैण्ड से शत्रुता रखने वाले कुछ और देशों ने इसे मान्यता दे दी। अब यह सरकार अधिकाधिक रूप से अन्य देशों से भारत की स्वतंत्रता के लिये सहायता प्राप्त कर सकती थी । इसी सरकार के अंतर्गत "आजाद हिन्द फौज" का गठन भी किया गया जिसमेँ जर्मनी और तुर्की सरकार द्वारा बन्दी बनाये भारतीय सैनिक, सीमावर्ती पठानोँ और कबीलाईयोँ को लेकर छह हजार सैनिक भर्ती किये गये । आजाद हिन्द फौज ने अंग्रेजी अधिकार वाले भारतीय क्षेत्रोँ को आजाद कराने के लिये अंग्रेज सेना पर हमला बोल दिया पर विश्व युद्ध में जर्मन-तुर्की गठजोड़ हारने लगा, इससे अंग्रेजों का हौसला बढ़ गया और उन्होंने पूरी ताकत से आजाद हिन्द फौज पर आक्रमण कर दिया, अंततः विफलता का सामना करना पडा । फिर लेनिन ने उनके क्रांतिकारों विचारों से प्रभावित होकर उन्हें रूस मिलने बुलाया और महेंद्र प्रताप को अपनी एक किताब उपहार में दी, जिसे वो पहले ही पढ़ चुके थे, टॉलस्टॉयवाद । वहाँ से 1925 में जापान पहुंच गये । जापान में उस समय प्रसिद्ध क्रांतिकारी रासबिहारी बोस और आनंद मोहन सहाय भारत की आजादी के लिये प्रयत्न कर रहे थे। ओसाका में राजा महेन्द्र प्रताप की दोनों क्रांतिकारियों से भेंट हुई तथा भविष्य की योजनाओं पर विचार हुआ। उधर अंग्रेजों के दबाव में जापान सरकार ने महेंद्र प्रताप को जापान छोड़ देने को कहा। जापान से वे मौलाना बरकतुल्ला के साथ अमरीका पहुंच गये।
सऊदी अरब के बारे में 2 बातें बताता हूँ आपको जो आपको सयुंक्त राष्ट्र संघ ( UNO ) के चाल चरित्र के बारे में बताती है :-
पहली - 2017 में UN वुमन राइट कमीशन का सदस्य बना
दूसरी - 2015 में सयुंक्त राष्ट्र मानवाधिकार पैनल का अध्यक्ष बना
अब उनके यहाँ की हक़ीक़त देखिये
पहली - खुद सऊदी अरब में पूरा शरीर ढकने, कार चलाने, पुरुष से अनुमति के बाद ट्रेवलिंग, पब्लिकली तैरने और एक्सरसाइज करने आदि की पाबंदियों के बीच अब देखेगा कि दुनिया की किसी महिला के साथ ज्यादती तो नहीं हो रही
दूसरी - जहाँ आज भी कैदियों को सरेआम फाँसी, शारीरिक उत्पीड़न, दूसरे देशों से आये कामगारों के साथ गुलामों की तरह व्यवहार और महिलाओं पर बेहिसाब पाबन्दियों के बाद भी ये ध्यान रखेगा कि किसी के मानवाधिकार का हनन तो नही हो रहा !
अब आप ये सोच रहे होंगे कि आखिर ये सब हो कैसे गया ? वो भी UN में ! आखिर इसे वोट किसने किया ? वोट करने वाले है यूरोपियन यूनियन और अमेरिका के शागिर्द । जिनका सऊदी बहुत बड़ा बाजार है ।
अब भी आपको लगता है कि UN सबकुछ सही कर देगा तो आप गलतफहमी में हो, UN वही करता है जो अमेरिका चाहता है । हाँ आजकल चीन भी इसमें टांग अड़ाने लगा है पर दोनों देश अपने फायदे के लिये UN को इस्तेमाल करते है, दुनिया की भलाई के लिये नहीं ।