Thursday, 27 April 2017

UNO की असलीयत

सऊदी अरब के बारे में 2 बातें बताता हूँ आपको जो आपको सयुंक्त राष्ट्र संघ ( UNO ) के चाल चरित्र के बारे में बताती है :-

पहली - 2017 में UN वुमन राइट कमीशन का सदस्य बना

दूसरी - 2015 में सयुंक्त राष्ट्र मानवाधिकार पैनल का अध्यक्ष बना

अब उनके यहाँ की हक़ीक़त देखिये

पहली - खुद सऊदी अरब में पूरा शरीर ढकने, कार चलाने, पुरुष से अनुमति के बाद ट्रेवलिंग, पब्लिकली तैरने और एक्सरसाइज करने आदि की पाबंदियों के बीच अब देखेगा कि दुनिया की किसी महिला के साथ ज्यादती तो नहीं हो रही

दूसरी - जहाँ आज भी कैदियों को सरेआम फाँसी, शारीरिक उत्पीड़न, दूसरे देशों से आये कामगारों के साथ गुलामों की तरह व्यवहार और महिलाओं पर बेहिसाब पाबन्दियों के बाद भी ये ध्यान रखेगा कि किसी के मानवाधिकार का हनन तो नही हो रहा !

अब आप ये सोच रहे होंगे कि आखिर ये सब हो कैसे गया ? वो भी UN में ! आखिर इसे वोट किसने किया ?  वोट करने वाले है यूरोपियन यूनियन और अमेरिका के शागिर्द । जिनका सऊदी बहुत बड़ा बाजार है ।

अब भी आपको लगता है कि UN सबकुछ सही कर देगा तो आप गलतफहमी में हो, UN वही करता है जो अमेरिका चाहता है । हाँ आजकल चीन भी इसमें टांग अड़ाने लगा है पर दोनों देश अपने फायदे के लिये UN को इस्तेमाल करते है, दुनिया की भलाई के लिये नहीं ।

Thursday, 20 April 2017

तमिल किसानों के साथ एक दिन

अभी कुछ दिन पहले 14 अप्रैल को जब जंतर मंतर पर तमिल किसानों से मिलने गये थे तब उन्होंने कुछ देर बात करने के बाद पूछा कहाँ से हो बेटा ?  मैं बोला राजस्थान से । तो अपने साथी किसान से बोले बड़ी दूर से मेहमान आये है, कुछ खाने - पीने को लाओ, हमारे बहुत मना करने के बाद भी एक केला पकड़ा दिया । मेरे पास उस समय बोलने को कुछ नहीं था, बस सोच रहा था कि हिंदुस्तान के सुदूर दक्षिण के किसान जो अकाल और भूख की वजह से दिल्ली में धरना दे रहे है लेकिन फिर हमसे खाने की पूछना नहीं भूले । मुझे तब लगा कि हम किसान भाषा, पहनावे से जरूर अलग है पर किसानीयत से एक है । कोई फर्क नहीं, बिल्कुल एक है । कमी है तो बस एकता की, एक हो जाये तो किस मोदी - मनमोहन - वाजपयी - गांधी की औकात जो हमसे हमारे हक़ छीन ले । पर वो लगातार हमारी जमीनें उधोगपतियों को दे रहे है, बैंकों में हमारे ही सेविंग्स से वो अपना बिज़नेस चला रहे है, और वही बैंक कुछ हजार रुपये समय पर न चुकाने की वजह से थाने में क्रिमिनल के साथ फोटो लगा देती है । और यही उधोगपति जब लोन के पैसे नहीं चुका पाते है तो हमारे सेविंग के बाकि बचे पैसे फिर से लोन दे देते है लेकिन यही बात जब एक किसान कहता है तो किसी के कान पर जूं तक नहीं रेंगती । 
दिल्ली में चल रहे इस धरने को National South Indian Rivers Interlinking Farmer's Association के स्टेट प्रेजिडेंट पी. इयाक्कन्नु जी लीड कर रहे है ( जो नीचे फोटो में मेरे साथ है )।

ये बताते है कि दिल्ली की साउथ इंडियन कम्युनिटी अभी इनके खाने पीने का खर्चा उठा रही है । उनका शुक्रिया अदा करते हुऐ कहते है कि हमारे पास तो इतना पैसा भी नहीं था कि हफ्तेभर से ज्यादा यहाँ टिक पाते लेकिन इन लोगों की सहायता से पूरे तमिलनाडु के किसानों की लड़ाई लड़ना संभव हुआ है । आगे बताते है कि हम यहाँ हर जिले से करीब 2 या 3 किसान मौजूद है, शुरुआती जत्था करीब 90 किसानों का था जो बढ़ते घटते रहते है ।

आगे एक दूसरा किसान जो कि थोड़ी बहुत हिंदी जानता था, उससे पूछा कि अभी तक आपसे कोई मिलने आया है कि नहीं ? तो वो बोले "हमारे स्टेट मिनिस्टर राधाकृष्णन कुछ दिन पहले मिलने आये थे और धमकी देकर गए है कि अगर जंतर मंतर से ये धरना नहीं उठाया तो पीट पीटकर खाली करवा देंगे । एक रुपया नहीं देंगे तुम्हें ।" धरना शुरू होने के कुछ 4 हफ्ते बाद PM ऑफिस से जवाब आता है कि PM साहेब ने आप लोगों को मिलने का समय दे दिया है, कल मीटिंग है और जब मिलने जाते है तो PM साहेब ऑस्ट्रेलियाई PM को डेल्ही मेट्रो के दर्शन करवाने निकल जाते, क्योंकि उनको लगता है कि किसानों से ज्यादा जरूरी मेट्रो दिखाना है ।


कुछ लोगों को या फिर सीधे शब्दों में कहें तो भाजपा समर्थकों को लगता है कि ये किसान दिल्ली में सिर्फ नरेंद्र मोदी को बदनाम करने के लिये सबकुछ कर रहे है, तो उन लोगों की जानकारी के लिये बता दूं कि तमिलनाडु के किसानों की माँगे क्या है :

1. 2 साल से पड़ रहे सूखे की वजह से हुई बर्बादी की भरपाई के लिए दूसरे राज्यो की तर्ज पर 40000 करोड़ का विशेष पैकेज जारी हो।

2. अटल सरकार की योजना के मुताबिक नदियों को जोड़ने का कार्य प्रारंभ हो ताकि ऐसा सूखा दोबारा ना आये।

3. कावेरी से मिलने वाले पानी पर तत्काल फैसला हो

4. फसल की MSP  बढ़ाई जाये

अब भी जो लोग कह रहे है कि इन्हें दिल्ली में नहीं, वरन चेन्नई में राज्य सरकार के खिलाफ धरना देना चाहिये तो ये उनकी नासमझी होगी ।

क्या कुछ नहीं किया इन लोगों ने अपने हक़ के लिये, अपने मरहूम साथियों की खोपड़ी गले मे डालकर मार्च किया, चूहे मुँह में दबाकर प्रदर्शन किया, जमीन को थाली मानकर कंकड़ मिट्टी सहित खाना खाया, अपने कपड़े तक उतार दिये फिर भी इस लोकतंत्र के किसी भी स्तम्भ पर कोई असर पड़ा हो तो बताइये ?
न नेता ध्यान दे रहे, न अफसर दे रहे, न स्वतः संज्ञान लेने वाली कोर्ट को कुछ दिख रहा है और न ही देशभक्ति के नाम पर बेवकूफ बनाती मीडिया ध्यान दे रही । इन सबके इस निकम्मेपन का एक ही ईलाज है, पाँचवाँ स्तंभ, यानी हम और आप मतलब जनता । इनको रास्ते पर लाना है तो हमें जागरूक और जिम्मेदार बनना होगा । नहीं बने तो फिर हालत इससे भी बदतर होने वाली है, नोट कर लीजिये आज ही


Thursday, 6 April 2017

अलवर हत्याकांड के बाद किसानों के नाम पत्र

नमस्कार किसान भाईयों,

मैं जितेन्द्र पूनिया, गाँव किशनपुरा, तहसील फतेहपुर शेखावाटी, जिला सीकर, राजस्थान से हूँ । 15 लोगों के साझा परिवार में रहता हूँ और परिवार का पैतृक व्यवसाय खेती बाड़ी के साथ साथ 2 गाय, 2 भैंस ओर 4 बकरी से पशुपालन भी करते है । मेरे से पहले वाली 2 पीढ़ी में सब घरवाले सरकारी नौकरी करते है और अब वाली में भी । पिताजी शिक्षा विभाग में जिला अधिकारी है, कुल मिलाकर पैसे भी ठीक ठाक है पर आज तक हमने खेत खाली नहीं छोड़ा, हर बार खेती करते है, जिसमें नौकरी से छुट्टियां ले लेकर सब घरवाले हाथ बंटाने आते है, फिर चाहे वो कितना भी बड़ा अधिकारी हो या पैसेवाला । हालाँकि खेती में होना जाना कुछ नहीं है, खाने के लिये गेहूँ तक हर साल खरीदने पड़ते है पर किसान है तो खेती करना हमारा कर्म भी है और जिम्मेदारी भी ।

आज ये पत्र आपको इसलिये लिख रहा हूँ क्योंकि जब कोई नहीं बोल रहा है तो मेरा बोलना  बेहद ही जरूरी हो जाता है । आप अब किसान से हिंदू या मुस्लिम हो गये है । बड़े बुजुर्गों की कही बातें मुझे आज फिलोसॉफी की किताब की तरह लगने लगी है । वो कहते थे कि बेटा, हम किसान है । ये धर्म, जात- पात  सब ब्राह्मण और मुल्लों का बनाया हुआ है । ये हमारे लिये नहीं है । हमारे लिये हमारे खेत और पशु है । ये है तो हम है, ये नहीं है तो कुछ नहीं । धर्म या तो इस दुनिया मे होता नहीं और अगर है तो वो एक ही है, इंसानियत । अगर इंसान को इंसान समझते हो, तो तुम इंसान हो नहीं तो तुम में और इन पशुओं में कोई फ़र्क़ नहीं है । कर्म के बजाय अगर धर्म को खुद का मालिक समझोगे तो जैसे मालिक पशुओं को किधर भी हांक देता है वैसे ही धर्म भी आपको किधर भी हांक देगा । अगर किसी काल्पनिक ईश्वरीय शक्ति की वजह से हम गलत काम करने से डरते है तब तक तो उस शक्ति को मानना ठीक है पर अगर हम इंसान को इंसान समझना भूल जायें तो उस काल्पनिक ईश्वरीय शक्ति का खत्म हो जाना बेहतर है । हमें यदि किसी शक्ति को पूजना है तो प्रकृति ( सूर्य, जल, हवा, जमीन और आकाश ) को पूजें, जो हमें पालती है ।

आज ये बुजुर्गों की कही बातें क्यों बता रहा हूँ उसका कारण भी लगे हाथ आपसे साझा कर ही लेता हूँ । अलवर के बहरोड़ में एक किसान जो दूध के धंधे के लिये मेले से कुछ गायें खरीद कर ले जा रहा था जिसकी धर्म के नाम पर सरेआम हत्या कर दी गयी । और कहीं से कोई भी आवाज नहीं आयी । जो कुछ आई भी वो हत्यारों के पक्ष में थी । लेकिन जब कोई किसान ही इसपर नहीं बोला तो फिर बोलने की जरूरत नहीं रह जाती क्योंकि कोई भी लड़ाई अपने दम पर ही लड़ी जाती है ।

मैं एक किसान होने के नाते तो इस घटना का विरोध करता ही हूँ पर साथ ही देश का एक जिम्मेदार नागरिक होने के नाते शर्म भी महसूस करता हूँ कि हमारे मंत्री मुख्तार अब्बास नकवी संसद में सरेआम झूठ बोलते है कि ऐसी कोई घटना घटी ही नहीं । अब बताओ आप क्या करोगे ? कुछ नहीं, बस तमाशा देखिये । रही बात उस किसान या डेयरी चलाने वाले की, तो उसको तो एक दिन मरना ही था, मुस्लिम जो था । ये तो अच्छा हुआ कि जिस गाय की आजतक सेवा की, कम से कम उसके नाम पर तो मरा, वरना कल को फालतू में बैंक के कर्जे से मरता तो कोई पूछता भी नहीं, खैर उसके घरवालों को दुःख सहने की हिम्मत मिले ।

साथी पहलू खाँ के मरने से ज्यादा बड़ा सवाल ये है कि हम आज किधर जा रहे है ?  हम हमारी जड़ों से कितने दूर हो गये है ?  क्या अब भी हम हमारी जड़ों तक लौट सकते है ?  हाँ आज भी हम हमारी जड़ों तक लौट सकते है । अगर कुछ मूलभूत चीजें समझ लें तो । वो चीजें समझने के लिये कहीं भी जाने की जरूरत नहीं है, बस एक बार बड़े बुजुर्गों की बातों की तरफ ध्यान देने की जरूरत है और इस ब्राह्मणवाद ओर मुल्लावाद से बाहर आकर इनका पुरजोर विरोध करने की जरूरत है । गाय एक ऐसा पशु है जो हम किसानों को धर्म से जोड़ता है, इसलिये इसी पर बात करते है ।

आमतौर पर अगर हमारे घर मे कोई पशु उपयोगी नहीं रहता तो उसे दूसरे किसान या कसाई को बेच दिया जाता है, हालाँकि जिसको इतने दिन पाला, उसे बेचना आसान नहीं होता फिर भी यदि बेचेंगे नहीं तो वो हमें आर्थिक रूप से और अधिक कमजोर कर देता है इसलिये बेचना ही आखिरी उपाय है । सिर्फ वही पशु बेचा जाता है जिसका आउटपुट जीरो होता है जैसे बकरा, भैंसा, सांड क्योंकि इस वैज्ञानिक युग मे हल जोतने में ट्रेक्टर के आने से भैंसा और सांड किसी भी काम के नहीं रहे है इसलिये बकरों के साथ इन्हें भी बेच दिया जाने लगा है । इसी तरह अनुपयोगी जानवरों में दूध न देने वाली बकरी, गाय और भैंस भी आती है । बकरी ओर भैंस तो कसाई को बेच देते है पर आजकल गायों को काटने पर देश मे पाबंदी है इसलिये कसाई इन्हें खरीदते नहीं है और किसान बिना दूध देने वाली गायों को पालने में असमर्थ होने की वजह से खुले में छोड़ देता है जो कि आवारा पशुओं के रूप में शहरो में प्लास्टिक चबाती घूमती है या फिर झुण्ड में एक ही रात में कई महीनों की मेहनत से उगाई फसल को कुछ मिनटों में उजाड़ देती है । आज इन गायों की इस हालत के लिये सरकार और गायों के तथाकथित ठेकेदार जिम्मेदार है जो न तो इनको कटने देते है ना ही खुद पालते है । अगर किसी को गाय में ज्यादा ही आस्था है तो अपने घर पर रखे । आपकी इस आस्था का हल्ला किसान क्यों ढोये ? आज ज्यादातर गायों के हक़ की आवाज उठाने वालों को देखें तो इनमें वो ब्राह्मण बनिये ही सबसे अधिक मिलेंगे जिनकी कई पीढ़ियों तक ने गाय नहीं पाली हो ।

अंत मे सभी से एक ही बात कहूँगा कि गाय की वजह से किसी की भावनाएं आहत हो रही है तो गायों को न मारे और न ही खायें पर साथ ही एक निवेदन उन आहत भावनाओं वालों से भी है कि इन गायों की सार संभाल करें और हमारे खेत और सड़कों से दूर रखें । या तो घर के पास एक एक्स्ट्रा प्लॉट खरीद लें या फिर सब मिलकर गौशाला में रखें । फिर किसी की भावना आहत नहीं होगी ।
अगर इतना नहीं कर सकते तो फिर ये गौभक्ति दिखावा है और गरीब पशुपालकों और किसानों पर अत्याचार और शोषण का बहाना है, जो हम कतई नहीं सहेंगे ।

धन्यवाद

Wednesday, 11 January 2017

फौज सवालों से परे क्यों ?

जो लोग सरकार या आर्मी ऑफिसियल की #जवानों_को_अच्छे_खाने वाली बात पर आँख बंदकर विश्वास कर रहे है वो वही लोग है जिनको घरवाले बोलते थे कि वो जन्मे नहीं है, उनको तो #परी_रानी_माँ_की_गोद में छोड़ के गयी, पर विश्वास कर लेते थे । खैर ये व्यंग्य था पर अगर आपको यकीन न हो तो अपने आस पास कोई जवान छुट्टी पर आ रखा हो उससे पूछ लीजिये । मेरे घर में तो हर तरह के जवान ( आर्मी, bsf, एयरफोर्स, नेवी, itbp आदि ) भरे पड़े है इसलिये ठोक के बोलता हूँ, खाना और सुविधा के नाम पर जवान ठगे जाते है और अफसर मौज उड़ाते है । ऐसा नहीं है कि ये पहली बार हुआ है, इससे पहले भी एक फौजी ने बांग्लादेश बॉर्डर को लेकर जो सच बोला था वो तो बेहद ही चोंकाने वाला था, जिसमें अफसरों पर पैसे लेकर बॉर्डर पार कराने जैसे संगीन आरोप भी लगे थे । शायद तब हमारी देशभक्ति हिलोरे इसलिये न मारी होगी क्योंकि वो सैनिक मुस्लिम था, पर ये तो हिन्दू भी है फिर इसे क्यों गाली दी जा रही है । नीचे हमारी देशक्ति के 2 सबुत भर दे रहा हूँ ....



आप को कुछ आसान से उदाहरण से समझाता हूँ, जैसे पहले पहल
आप कैंटीन का ही ले लो, ज्यादातर सामान अफसर बीवियाँ उठा ले जाती है और बाकि हम लोगों के लिये बचता है । जब पूरा सामान कैंटीन में आता है तो फिर हम जब भी जाते है तब साबुन, सर्फ, शैम्पू, बिस्किट ही क्यों मिलते है, बाकि सामान कहाँ और कौन ले जाता है ।

दूसरी बात आपको बताता हूँ NCC की, मैं 3 साल आर्मी कैडेट रहा हूँ, लास्ट दिन अच्छे खाने के अलावा कभी नहीं मिला, आपको मिला हो तो बताएं । कैंप में आपको कितनी गोली चलाने को मिली ? क्या कैंप पुरे 10 दिन चला भी कि नहीं ? यहाँ भी बजट गायब कर दिया जाता है, जहाँ पब्लिक इन्वॉल्वमेंट ज्यादा रहता है तो सोचिये अंदर क्या खेल चलता होगा ? मेरे एक चाचा के शब्दों में कहूँ तो यूँ कि " हर देश की आर्मी, वहाँ की सबसे बड़ी घोटालेबाज और भ्रष्ट होती है ।"
हम तो ये बात ऐसे भी उठाते रहते है पर तब आपकी देशभक्ति कुलांचे मारती है और बुनियादी सवालों को दबा देती है, पर अब तो शर्म करो, कम से कम अब तो आवाज उठाओ । और सवाल न उठाने की जिस परंपरा को आप फलीभूत करने में लगे है, ये उसी का परिणाम है कि आज वो अपने हक़ की आवाज उठाकर भी कोर्ट मार्शल का सामना करेगा ही । क्यों किसी डिपार्टमेंट को सवालों से दूर रखें ? क्या आपके टैक्स का पैसा वहाँ नहीं लगा है ? लगा होने के बाद भी आप सवाल नहीं उठाते तो समझिये या तो आप ऊँचे दर्जे के बेवकूफ है या फिर आपको इस बात की खबर ही नहीं है कि आप इनकम टैक्स के अलावा भी सैकड़ो तरह के टैक्स देते है । इन दोनों के अलावा एक खास श्रेणी उन भक्तों की भी है जो सवाल उठाने वाले से सवाल करके चुप करवा देते है । ये वो लोग है जो आपको गुलामी के करेले पर भक्ति की चाशनी लगाकर आपको जबरदस्ती निगलाने का काम करते है, इसलिये इनकी संगत से हो सके जितना बचो ।
अंत में तेजबहादुर जी की बहादुरी को सलाम, पता है इनपर अब कारवाई होगी फिर भी इन्होंने हिम्मत की है, उसकी देश की हर आर्मी फैमिली दाद और धन्यवाद देती है ।

नोट : जवानों से थोड़ा घुमा फिराकर पूछना, क्योंकि सारी देशभक्ति इनमें ही भरी होती है, अफसरों में नहीं । इसलिये आपको वहाँ आसानी से जवाब नहीं मिलने वाला, थोड़ा सा इमोशनल करना और सच्चाई बाहर

Sunday, 11 December 2016

Reliance Power की Commercial Operation Date के नाम पर लूट के खिलाफ AIPEF की जीत

कॉर्पोरेट्स कैसे आम आदमी को ठगते है, इसे समझने के लिये, पहले एक कहानी सुनाता हूँ, फिर आगे की बात करेंगे । तो कहानी ये है :-

मैंने मेरे दूध वाले के साथ समझौता किया कि वो मुझे सालभर तक एक निश्चित कीमत पर दूध दे और मैं उसे हर साल 31 मार्च को पूरा पेमेंट कर दूँगा, लेकिन उसने 31 मार्च को दूध दे के बोला साहब !हमारा ये साल पूरा हो गया, कल से नया साल शुरू हो जायेगा, इसलिये इस साल का पेमेंट कर दें, मैंने कहा कि आपने तो सिर्फ एक दिन दूध दिया है, तो पैसे पुरे साल के क्यों ? तो उसने समझौता पत्र दिखाया जिसमें मैंने लिखा था कि मेरे हिसाब करने का साल 31 मार्च तक का है । और जब मैंने उसे पुरे साल के पैसे देने से मना किया तो वो मुझे दूध वालों की कोर्ट ( अपीलीय ट्रिब्यूनल ) ले गया । जहाँ उसके पास अच्छे वकील होने की वजह से मैं हार गया और कोर्ट ने पैसे देने का फरमान सुनाया । मैं कुछ भी सोच नहीं पा रहा था, तभी मेरे कुछ शुभचिंतक इस मामले को बड़ी कोर्ट में ले गये और मुझे इससे राहत दिलवाई ।

ऊपर तो थी एक कहानी, जिसको पढ़कर आपको कुछ बातें समझ आ गयी होगी, जिसमें मैं था जनता, दूधवाला था अंबानी और शुभचिंतक था AIPEF ( रिटायर्ड इंजीनियर की ट्रेड यूनियन ) ।

अब आते है असल मुद्दे पर, रिलायंस पॉवर का सासन ( मध्य प्रदेश ) में पॉवर प्लांट है जिससे मप्र, हरयाणा सहित कई राज्यो को बिजली बेचीं जा रही है । इस प्लांट की अंतिम इकाई के Commercial Operation से एक साल तक सस्ती बिजली (70 पैसे की दर पर)  मिलनी थी। रिलायन्स ने कमर्शियल ऑपरेशन 31 मार्च 2014 को घोषित कर दिया वो भी प्लांट को पूरी क्षमता पर 72 घंटे तक चलाने की महत्वपूर्ण शर्त को पूरा किये बगैर । नतीजा जो सस्ती बिजली एक साल तक देनी थी वह एक दिन में ही पूरी हो गई क्योंकि 31 मार्च से शुरू हो कर वित्तीय वर्ष उसी 31 मार्च को समाप्त हो गया। केंद्रीय विद्युत् नियामक आयोग ने इसे मानने से इंकार कर दिया, रिलायंस ने आयोग के विरुद्ध अपीलेट ट्रिब्यूनल में केस लगाया और अपने बड़े बड़े वकीलों की जिरह से सफल हो गया।
केस जीतने के तुरंत बाद रिलांयस ने राज्यों को 1050 करोड़ का अतिरिक्त बिल थमा दिया । ये आम उपभोक्ताओं से वसूलना था। रिलायंस के रसूख के चलते कोई भी राज्य सरकार सुप्रीम कोर्ट जाने का फैसला नहीं कर प् रही थी ।

ऐसे में आल इण्डिया पॉवर इंजीनियर्स फेडरेशन ( AIPEF ) ने पहल की । पहले पूरे विवरण के साथ पत्र लिखे, प्रेस वार्ताएं कीं, दौरे किए पर फिर भी जब बात नहीं बनी तो स्वयं PIL फाइल की , 16 मई 2016 को ।

http://www.hastakshep.com/english/release/2014/06/04/states-have-suffered-an-energy-loss-due-to-reliance-power-plant#sthash.rixeFI82.dpuf

एक बार केस लग गया तो एक एक कर राज्य सरकारों को भी सामने आना ही पड़ा । रिलायंस ने पी चिदंबरम और कपिल सिब्बल जैसे वरिष्ठ वकीलों की मदद ली पर अंत में जीत सच की हुई ।  8 दिसंबर को सुप्रीम कोर्ट का फैसला आया है। वेब साइट पर उपलब्ध है । उपभोक्ताओं का 1050 करोड़ रिलायंस के खाते में जाने से बच गया ।

महत्वपूर्ण  तथ्य  :-

1.  बहुत लंबे समय बाद एक ट्रेड यूनियन ने विशुद्ध जनहित की लड़ाई लड़ी ।

2.  लड़ने वाले पुरोधा पद्मजीत सिंह, अशोक राव, ए के जैन, शैलेन्द्र दुबे सभी 65 पार रिटायर्ड इंजीनियर्स हैं ।

3 रिलायंस ने इन पर दबाव बनाने के लिए और प्रेस कवरेज रोकने के लिये पद्मजीतसिह और शैलेन्द्र दुबे पर व्यक्तिगत तौर पर और AIPEF पर संस्थागत 100 - 100 करोड़ का मानहानि मुकदमा दायर किया है, पर ये लोग विचलित नहीं हुए ।

4 इतने बड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट ने मात्र पांच माह में फैसला दे दिया। ( राज्य सरकारों को अपील फाइल करने का फैसला करने के लिए इससे ज्यादा समय लग गया था ।)

5 अभी तक कोई मीडिया कवरेज नहीं दिख रहा, जो कि अंबानी के मीडिया हाउसेस के अधिग्रहण की सफलता दर्शाता है । सिर्फ ट्रिब्यून ने एक छोटा सा आर्टिकल लिखा है, जिसका लिंक साझा कर रहा हूँ ।

http://www.tribuneindia.com/mobi/news/chandigarh/courts/sc-rejects-commercial-operation-date-of-reliance-power/334941.html


जनहित में सक्रिय योद्धाओं और माननीय सर्वोच्च न्यायालय का अभिनंदन ।

Note : हिस्सा व्हाट्स एप्प की एक पोस्ट से लिया गया है, जिसके लेखक का पता नहीं है ।

Sunday, 4 December 2016

गर तू खुद को पहचान ले

हे ! जन गण मन,
तू खुद को ना मायूस समझ,
तू खुद को ना लाचार समझ,
तू खुद को शोषितों का ना आचार समझ,
तू खुद को पूंजीपतियों का ना बाजार समझ,

तू उठ,
अज़ान लगा,
तू विरोध कर,
तू सवाल कर,
तू बवाल कर,
तू इंक़लाब कर,
तू बदलाव का यलगार कर,

कर सकता है तू,
गर तू खुद को पहचान ले,
हक की ढाल ले,
पगड़ी को संभाल ले,
सबको साथ ले,
सबको साध ले,
और ये ठान ले,
बदलेगा ये मंजर,
जरूर एक दिन,
गर तू खुद को पहचान ले ।
गर तू खुद को पहचान ले ।।

डॉ कलाम को श्रद्धांजलि

डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम (Avul Pakir Jainulabdeen Abdul Kalam ) का जन्म 15 October 1931 को तमिलनाडु के Rameswaram में हुआ । इन्होंने 1960 ...