Wednesday, 11 January 2017

फौज सवालों से परे क्यों ?

जो लोग सरकार या आर्मी ऑफिसियल की #जवानों_को_अच्छे_खाने वाली बात पर आँख बंदकर विश्वास कर रहे है वो वही लोग है जिनको घरवाले बोलते थे कि वो जन्मे नहीं है, उनको तो #परी_रानी_माँ_की_गोद में छोड़ के गयी, पर विश्वास कर लेते थे । खैर ये व्यंग्य था पर अगर आपको यकीन न हो तो अपने आस पास कोई जवान छुट्टी पर आ रखा हो उससे पूछ लीजिये । मेरे घर में तो हर तरह के जवान ( आर्मी, bsf, एयरफोर्स, नेवी, itbp आदि ) भरे पड़े है इसलिये ठोक के बोलता हूँ, खाना और सुविधा के नाम पर जवान ठगे जाते है और अफसर मौज उड़ाते है । ऐसा नहीं है कि ये पहली बार हुआ है, इससे पहले भी एक फौजी ने बांग्लादेश बॉर्डर को लेकर जो सच बोला था वो तो बेहद ही चोंकाने वाला था, जिसमें अफसरों पर पैसे लेकर बॉर्डर पार कराने जैसे संगीन आरोप भी लगे थे । शायद तब हमारी देशभक्ति हिलोरे इसलिये न मारी होगी क्योंकि वो सैनिक मुस्लिम था, पर ये तो हिन्दू भी है फिर इसे क्यों गाली दी जा रही है । नीचे हमारी देशक्ति के 2 सबुत भर दे रहा हूँ ....



आप को कुछ आसान से उदाहरण से समझाता हूँ, जैसे पहले पहल
आप कैंटीन का ही ले लो, ज्यादातर सामान अफसर बीवियाँ उठा ले जाती है और बाकि हम लोगों के लिये बचता है । जब पूरा सामान कैंटीन में आता है तो फिर हम जब भी जाते है तब साबुन, सर्फ, शैम्पू, बिस्किट ही क्यों मिलते है, बाकि सामान कहाँ और कौन ले जाता है ।

दूसरी बात आपको बताता हूँ NCC की, मैं 3 साल आर्मी कैडेट रहा हूँ, लास्ट दिन अच्छे खाने के अलावा कभी नहीं मिला, आपको मिला हो तो बताएं । कैंप में आपको कितनी गोली चलाने को मिली ? क्या कैंप पुरे 10 दिन चला भी कि नहीं ? यहाँ भी बजट गायब कर दिया जाता है, जहाँ पब्लिक इन्वॉल्वमेंट ज्यादा रहता है तो सोचिये अंदर क्या खेल चलता होगा ? मेरे एक चाचा के शब्दों में कहूँ तो यूँ कि " हर देश की आर्मी, वहाँ की सबसे बड़ी घोटालेबाज और भ्रष्ट होती है ।"
हम तो ये बात ऐसे भी उठाते रहते है पर तब आपकी देशभक्ति कुलांचे मारती है और बुनियादी सवालों को दबा देती है, पर अब तो शर्म करो, कम से कम अब तो आवाज उठाओ । और सवाल न उठाने की जिस परंपरा को आप फलीभूत करने में लगे है, ये उसी का परिणाम है कि आज वो अपने हक़ की आवाज उठाकर भी कोर्ट मार्शल का सामना करेगा ही । क्यों किसी डिपार्टमेंट को सवालों से दूर रखें ? क्या आपके टैक्स का पैसा वहाँ नहीं लगा है ? लगा होने के बाद भी आप सवाल नहीं उठाते तो समझिये या तो आप ऊँचे दर्जे के बेवकूफ है या फिर आपको इस बात की खबर ही नहीं है कि आप इनकम टैक्स के अलावा भी सैकड़ो तरह के टैक्स देते है । इन दोनों के अलावा एक खास श्रेणी उन भक्तों की भी है जो सवाल उठाने वाले से सवाल करके चुप करवा देते है । ये वो लोग है जो आपको गुलामी के करेले पर भक्ति की चाशनी लगाकर आपको जबरदस्ती निगलाने का काम करते है, इसलिये इनकी संगत से हो सके जितना बचो ।
अंत में तेजबहादुर जी की बहादुरी को सलाम, पता है इनपर अब कारवाई होगी फिर भी इन्होंने हिम्मत की है, उसकी देश की हर आर्मी फैमिली दाद और धन्यवाद देती है ।

नोट : जवानों से थोड़ा घुमा फिराकर पूछना, क्योंकि सारी देशभक्ति इनमें ही भरी होती है, अफसरों में नहीं । इसलिये आपको वहाँ आसानी से जवाब नहीं मिलने वाला, थोड़ा सा इमोशनल करना और सच्चाई बाहर

Sunday, 11 December 2016

Reliance Power की Commercial Operation Date के नाम पर लूट के खिलाफ AIPEF की जीत

कॉर्पोरेट्स कैसे आम आदमी को ठगते है, इसे समझने के लिये, पहले एक कहानी सुनाता हूँ, फिर आगे की बात करेंगे । तो कहानी ये है :-

मैंने मेरे दूध वाले के साथ समझौता किया कि वो मुझे सालभर तक एक निश्चित कीमत पर दूध दे और मैं उसे हर साल 31 मार्च को पूरा पेमेंट कर दूँगा, लेकिन उसने 31 मार्च को दूध दे के बोला साहब !हमारा ये साल पूरा हो गया, कल से नया साल शुरू हो जायेगा, इसलिये इस साल का पेमेंट कर दें, मैंने कहा कि आपने तो सिर्फ एक दिन दूध दिया है, तो पैसे पुरे साल के क्यों ? तो उसने समझौता पत्र दिखाया जिसमें मैंने लिखा था कि मेरे हिसाब करने का साल 31 मार्च तक का है । और जब मैंने उसे पुरे साल के पैसे देने से मना किया तो वो मुझे दूध वालों की कोर्ट ( अपीलीय ट्रिब्यूनल ) ले गया । जहाँ उसके पास अच्छे वकील होने की वजह से मैं हार गया और कोर्ट ने पैसे देने का फरमान सुनाया । मैं कुछ भी सोच नहीं पा रहा था, तभी मेरे कुछ शुभचिंतक इस मामले को बड़ी कोर्ट में ले गये और मुझे इससे राहत दिलवाई ।

ऊपर तो थी एक कहानी, जिसको पढ़कर आपको कुछ बातें समझ आ गयी होगी, जिसमें मैं था जनता, दूधवाला था अंबानी और शुभचिंतक था AIPEF ( रिटायर्ड इंजीनियर की ट्रेड यूनियन ) ।

अब आते है असल मुद्दे पर, रिलायंस पॉवर का सासन ( मध्य प्रदेश ) में पॉवर प्लांट है जिससे मप्र, हरयाणा सहित कई राज्यो को बिजली बेचीं जा रही है । इस प्लांट की अंतिम इकाई के Commercial Operation से एक साल तक सस्ती बिजली (70 पैसे की दर पर)  मिलनी थी। रिलायन्स ने कमर्शियल ऑपरेशन 31 मार्च 2014 को घोषित कर दिया वो भी प्लांट को पूरी क्षमता पर 72 घंटे तक चलाने की महत्वपूर्ण शर्त को पूरा किये बगैर । नतीजा जो सस्ती बिजली एक साल तक देनी थी वह एक दिन में ही पूरी हो गई क्योंकि 31 मार्च से शुरू हो कर वित्तीय वर्ष उसी 31 मार्च को समाप्त हो गया। केंद्रीय विद्युत् नियामक आयोग ने इसे मानने से इंकार कर दिया, रिलायंस ने आयोग के विरुद्ध अपीलेट ट्रिब्यूनल में केस लगाया और अपने बड़े बड़े वकीलों की जिरह से सफल हो गया।
केस जीतने के तुरंत बाद रिलांयस ने राज्यों को 1050 करोड़ का अतिरिक्त बिल थमा दिया । ये आम उपभोक्ताओं से वसूलना था। रिलायंस के रसूख के चलते कोई भी राज्य सरकार सुप्रीम कोर्ट जाने का फैसला नहीं कर प् रही थी ।

ऐसे में आल इण्डिया पॉवर इंजीनियर्स फेडरेशन ( AIPEF ) ने पहल की । पहले पूरे विवरण के साथ पत्र लिखे, प्रेस वार्ताएं कीं, दौरे किए पर फिर भी जब बात नहीं बनी तो स्वयं PIL फाइल की , 16 मई 2016 को ।

http://www.hastakshep.com/english/release/2014/06/04/states-have-suffered-an-energy-loss-due-to-reliance-power-plant#sthash.rixeFI82.dpuf

एक बार केस लग गया तो एक एक कर राज्य सरकारों को भी सामने आना ही पड़ा । रिलायंस ने पी चिदंबरम और कपिल सिब्बल जैसे वरिष्ठ वकीलों की मदद ली पर अंत में जीत सच की हुई ।  8 दिसंबर को सुप्रीम कोर्ट का फैसला आया है। वेब साइट पर उपलब्ध है । उपभोक्ताओं का 1050 करोड़ रिलायंस के खाते में जाने से बच गया ।

महत्वपूर्ण  तथ्य  :-

1.  बहुत लंबे समय बाद एक ट्रेड यूनियन ने विशुद्ध जनहित की लड़ाई लड़ी ।

2.  लड़ने वाले पुरोधा पद्मजीत सिंह, अशोक राव, ए के जैन, शैलेन्द्र दुबे सभी 65 पार रिटायर्ड इंजीनियर्स हैं ।

3 रिलायंस ने इन पर दबाव बनाने के लिए और प्रेस कवरेज रोकने के लिये पद्मजीतसिह और शैलेन्द्र दुबे पर व्यक्तिगत तौर पर और AIPEF पर संस्थागत 100 - 100 करोड़ का मानहानि मुकदमा दायर किया है, पर ये लोग विचलित नहीं हुए ।

4 इतने बड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट ने मात्र पांच माह में फैसला दे दिया। ( राज्य सरकारों को अपील फाइल करने का फैसला करने के लिए इससे ज्यादा समय लग गया था ।)

5 अभी तक कोई मीडिया कवरेज नहीं दिख रहा, जो कि अंबानी के मीडिया हाउसेस के अधिग्रहण की सफलता दर्शाता है । सिर्फ ट्रिब्यून ने एक छोटा सा आर्टिकल लिखा है, जिसका लिंक साझा कर रहा हूँ ।

http://www.tribuneindia.com/mobi/news/chandigarh/courts/sc-rejects-commercial-operation-date-of-reliance-power/334941.html


जनहित में सक्रिय योद्धाओं और माननीय सर्वोच्च न्यायालय का अभिनंदन ।

Note : हिस्सा व्हाट्स एप्प की एक पोस्ट से लिया गया है, जिसके लेखक का पता नहीं है ।

Sunday, 4 December 2016

गर तू खुद को पहचान ले

हे ! जन गण मन,
तू खुद को ना मायूस समझ,
तू खुद को ना लाचार समझ,
तू खुद को शोषितों का ना आचार समझ,
तू खुद को पूंजीपतियों का ना बाजार समझ,

तू उठ,
अज़ान लगा,
तू विरोध कर,
तू सवाल कर,
तू बवाल कर,
तू इंक़लाब कर,
तू बदलाव का यलगार कर,

कर सकता है तू,
गर तू खुद को पहचान ले,
हक की ढाल ले,
पगड़ी को संभाल ले,
सबको साथ ले,
सबको साध ले,
और ये ठान ले,
बदलेगा ये मंजर,
जरूर एक दिन,
गर तू खुद को पहचान ले ।
गर तू खुद को पहचान ले ।।

Saturday, 5 November 2016

बागों में बहार है

देशभर में मचा कोहराम है, क्योंकि बागों में बहार है

जबसे होश संभाला तबसे देखा अत्याचार है, क्योंकि बागों में बहार है

भ्रष्टाचारी अफसर - नेता यार है, क्योंकि बागों में बहार है

औरत और दलितों पर हो रहा अत्याचार है, क्योंकि बागों में बहार है

चौराहों पर यहाँ इज्जत लुटना आम है, क्योंकि बागों में बहार है

सत्ता को गाय, गोबर, मंदिर-मस्जिद से इकरार है, क्योंकि बागों में बहार है

कोर्ट - पुलिस अमीरों की खातिरदार है, क्योंकि बागों में बहार है

नोकरशाही को जनता से ना कोई सरोकार है, क्योंकि बागों में बहार है

मीडिया में चाटुकारों की बयार है, क्योंकि बागों में बहार है

भरी दोपहरी में छाया अंधकार है, क्योंकि बागों में बहार है

माल्या, अम्बानी, अडानी आम आदमी के पैसे लूटकर फरार है, क्योंकि बागों में बहार है

भूख, अत्याचार, बेरोजगारी के नजारे आम है, क्योंकि बागों में बहार है

चारों तरफ इंसानियत, भाईचारा, सद्भाव का संहार है, क्योंकि बागों में बहार है

मजदूर - किसान आत्महत्या करने को लाचार है, क्योंकि बागों में बहार है

खेती बाड़ी बर्बादी को तैयार है, क्योंकि बागों में बहार है

गुंडों की सरकारें झंडाबरदार है, क्योंकि बागों में बहार है

लोकतंत्र का गला घोंटने पर आमदा ये सरकार है, क्योंकि बागों में बहार है

पूंजीपतियों की गिरफ्त में हमारा सरदार है, क्योंकि बागों में बहार है

अथॉरिटी को सवालों से होता बुखार है, क्योंकि बागों में बहार है

सत्ता से सवाल करने का ना अधिकार है, क्योंकि बागों में बहार है

देश चल रहा है जैसे कि निर्मल दरबार है, क्योंकि बागों में बहार है

इस देश को व्यवस्था परिवर्तन की दरकार है, क्योंकि बागों में बहार है

आज किसी और का तो आपका नम्बर अगली बार है, क्योंकि बागों में बहार है

Thursday, 3 November 2016

OROP की हकीकत

एक तरफ दिल्ली पुलिस शहीद के परिवार को पीट रही है, गिरफ्तार कर रही है, डेड बॉडी नहीं दे रही और दूसरी तरफ उनकी आवाज उठाने वालों को केंद्र की बीजेपी शासित सरकार और उसके गुर्गे समूह के लोग और मीडिया मिलकर देशद्रोही घोषित कर रही है, आखिर समझा क्या है इस सिस्टम को, हलवा ?

जिस OROP को लेकर भिवानी के सूबेदार ( रि.) रामकिशन ग्रेवाल ने अपने प्राणों की आहुति दी, वो असल में है क्या ? सैनिकों और सरकारी दावों में विरोधाभासों को लेकर इस वन रैंक - वन पेंशन ( OROP ) की हकीकत -

✍ पहली बात तो सरकार ने वन रैंक - वन पेंशन लागु  ही नहीं की, OROP का सीधे शब्दों मतलब होता है एक रैंक से रिटायर होने वाले सभी सैनिकों को एक समान पेंशन मिलना, जो कि किसी भी सरकार ने नहीं किया, मतलब सफ़ेद झूठ बोल रहे है
✍ जूनियर और सीनियर को समान वेतन मिलना, या किसी भी सीनियर को जूनियर से कम वेतन नहीं मिलना
✍ OROP लागु करने की दलील देने वाली सरकार ने 40% वालंटियर रिटायर लेने वाले सैनिकों  को तो वैसे भी बाहर कर रखा है, फिर इसकी जद में सब कैसे आये ?
✍ जो छोटी रैंक के फौजी है उनको आपने वैसे लटकाया हुआ  है । जो थोड़े बहुत लाभार्थी है वो बड़ी रैंक के अफसर है जो आपका मीडिया में आकर बचाव कर रहे है ।
✍ उनमें से आधे तो वो सटके हुए अफसर है जो बोलते है 10 रूपये दे देते तो इन सैनिकों की जुबान बंद हो जाती ( ibn7 का पर पूर्व आर्मी अफसर और बीजेपी प्रवक्ता हुन साहब की आज शाम 5:30 बजे की बहस को देखें )
✍ एक पुराने जनरल वीके सिंह बोलते है कि सैनिकों को 4 पैसे के लिए ऐसे बेवकूफी भरे कदम नहीं उठाने चाहिए, जबकि वो खुद जन्म की तारीख के लिए सुप्रीम कोर्ट तक चले गए थे ।
✍ OROP की रिव्यु कमिटी को आपने बनाया है उसमें सिर्फ एक आदमी को रखा है, अफसोस कि वो भी सरकारी नुमाइंदा है ।
✍ OROP रिव्यु कमिटी 5 साल में रिव्यु देगी, मतलब 5 सालों में रिटायर होने वाले सैनिकों का वेतन अलग अलग होगा जो हर 5 साल बाद एक समान किया जायेगा, इसे प्रतिवर्ष किया जाये, ये सैनिकों की माँग है
✍ बेस ईयर 2015 किया जाये जबकि सरकार 2013 पर अड़ी है,
✍ एरियर का तत्काल भुगतान किया जाये, जनवरी 2006 से आज तक का
✍ एक सैनिक की विधवा की पेंशन बढ़ाई जाये, अभी बमुश्किल 6500 है, जिसमें घर चलाना मुश्किल है
✍ सरकार जितने पैसे को लेकर फंड न होने का बहाना बना रही है, वो मात्र 200 करोड़ सालाना है जबकि उससे कहीं ज्यादा 250 करोड़ तो पिछले साल गैस सिलिंडर की 100 करोड़ की सब्सिडी छुड़ाने  के लिए advertisements पर खर्च कर दिए थे ।
✍ देश में किसी भी सरकारी कार्मिक के ऑन ड्यूटी दिव्यांग होने पर तनख्वाह का 30% मिलता है जबकि वर्तमान सरकार ने इसे सैनिकों के लिए घटाकर 10% कर दिया है ।
✍ देश में पुलिस में DIG 28 साल की सर्विस में बन जाता है, जबकि आर्मी चीफ बनने को 32 साल लगते है पर दोनों के वेतन में बहुत फर्क है ।
✍

इस बात को मानने में कोई झिझक नहीं है कि वेतन में वृद्धि हुई है पर कितनी ? क्या माँग थी उतनी की ? नहीं न, तो फिर वृद्धि - वृद्धि क्यों चिल्ला रहे हो सरकार ?

कुल मिलाकर OROP को आपने मजाक बना दिया है, मेरे घर में 2 रिटायर्ड फौजी है, 2 आने वाले है, और 3 बंदे 6 साल बाद रिटायर आ जायेंगे, सभी की पेंशन में विसंगतिया भरी पड़ी है, आप जितनी बेबाकी से सर्जिकल स्ट्राइक का क्रेडिट खुद को, आरएसएस को दे रहे थे क्या उतनी ही बेबाकी से OROP को ढंग से लागू न करने क्रेडिट भी देंगे ?  अपना फैलियर मानेंगे ?  कभी नहीं, और उम्मीद भी नहीं है क्योंकि शहीदों के ताबूत खा सकते है उनसे उम्मीद करना बेवकूफी होगी । जब ये करने की हिम्मत नहीं है तो चुप हो जाइये और बैठ जाइये, बंद कीजिये ये दिखावा ।
और बात करते है सैनिक सम्मान की

Thursday, 29 September 2016

पप्पू की चाय

पप्पू, चाय लाना

लीजिये साहब चाय

अरे तुम खुद ! पप्पू कहाँ है आज ?

 वो बीमार हो गया साहब, इसलिए गाँव भेज दिया उसे

क्या बीमारी हुई ?

डॉक्टर बोला कोई बड़ी बीमारी है, क्या तो नाम था उसका ? हाँ, मलेरिया, मलेरिया हो गया उसे

तो तुम यहाँ साफ सफाई क्यों नहीं रखते हो, आज उसे हुआ है कल तुम्हें और क्या पता मुझे भी हो जाये

छुआछुत का बीमारी है क्या साहब ?

नहीं रे बिरजू, ये तो गंदगी से फेलती है

साहब, साफ सफाई का मलेरिया से क्या सम्बन्ध ?

तुम्हें इतना भी नहीं पता कि मलेरिया केसे फेलता है ?

नहीं ।

मलेरिया मच्छरों के काटने से फेलता है, जो गंदगी में रहते है । ये जो तुम्हारें यहाँ पड़ोस में कबाड़ी की दुकान में टायरों में पड़े पानी में ही ये मच्छर अंडे देते है और फैलते है ।

ये मलेरिया होता क्या है ?

मलेरिया के परजीवी का वाहक मादा एनोफ़िलेज़(Anopheles) मच्छर है। इसके काटने पर मलेरिया के परजीवी लाल रक्त कोशिकाओं में प्रवेश कर के बहुत तेजी से बढ़ते हैं जिससे रक्तहीनता (एनीमिया) के लक्षण उभरते हैं (चक्कर आना, साँस फूलना, द्रुतनाड़ी इत्यादि)। इसके अलावा अविशिष्ट लक्षण जैसे कि बुखार, सर्दी, उबकाई और जुखाम जैसी अनुभूति भी देखे जाते हैं। गंभीर मामलों में मरीज मूर्च्छा में जा सकता है और मृत्यु भी हो सकती है।

अच्छा, इतना खतरनाक बीमारी है क्या ?

और नहीं तो क्या ? तुम्हें नहीं पता

नहीं

जब तुम्हें होती तब पता होता, दूसरों के दर्द से पता नहीं चलता

मेरे क्यों ?

क्योंकि वो मच्छर तो वहीं के वहीं है न, उस दुकान में

इससे कोई बचने का उपाय नहीं है क्या ?

वो गंदा ठहरा हुआ पानी फिंकवा दो जो वहाँ भरा पड़ा है

लेकिन उससे तो मेरी बोलचाल बंद है आजकल, हमारी लड़ाई हो गयी थी, पिछले महीने की 214 चाय हुई पर वो 200 ही बता रहा था तो हो गयी लड़ाई, कितनी मेहनत से कमाए जाते है पैसे, ये तो हम जानते है न

ठीक है, ठीक है । तुम्हारे ये किस्से अपने पास रखो । मेरा कोई इंटरेस्ट नहीं है इनमें । और सफाई न करवाओगे तो तुम्हारे ही नुकसान है

केसे

कल को तुम्हें हो गयी तो  ? तुम्हारे ग्राहकों के हो गयी तो तुम्हारी तो दुकान बंद हो जाएगी, अगर ये बीमारी बिगड़ गयी तो आदमी इससे मर भी सकता है ।

सच्ची में ! तब तो कल ही सारे गिले शिकवे दूर करता हूँ । और सफाई का भी बोलता हूँ उसे ।

खुद की जान पर आई तो पता चला न, और ये लड़का कौन है ? नया है क्या ?

नहीं साहब मेरा बेटा है चिंटू

तो इसे यहाँ काम पर  क्यों लगा रखा है, पढाओ इसे । अभी उम्र ही क्या है बेचारे की, खेलने- कूदने और पढने लिखने की उम्र है, पढाओ इसे

साहब पूरा 10 साल का है, अभी से धंधे पर लगेगा तो 2 - 4 साल में काम सीख जायेगा । बाद में खुद की दुकान खोलके घर चलाने में हाथ ही बंटायेगा

जेल में जाने का विचार है क्या ?

क्यों ? वो पप्पू बीमार हो गया इसलिये

नहीं, अपने बेटे से काम करवाने की वजह से

बेटा मेरा, काम मेरा फिर इसमें जेल क्यों ?

क्योंकि बाल मजदूरी अपराध है । अगर बाल मजदूरी कराता हुआ कोई पाया गया तो सीधी जेल होगी, वो भी पुरे 1 साल साथ में 10 हजार का जुर्माना भी। क्या समझे ? और कल से स्कूल भेजो पढने के लिये

ठीक है साहब, इसे पढ़ा तो ले पर आजकल स्क़ूलों की फीस इतनी है कि इसे पढ़ाना हमारे बूते से बाहर है

किसने कहा आपको,  सरकार ने 7 साल पहले एक नियम बनाया था कि 6 से 14 साल तक के सभी बच्चों को फ्री शिक्षा दी जाएगी, ये उनका हक है जो कि संविधान के अनुच्छेद 21A में लिखा है कि ये उनका मौलिक अधिकार है । और यदि कोई प्राइवेट स्कूल वाला फ्री में पढ़ाने से मना करे तो उसकी शिकायत शिक्षा विभाग में दर्ज कराओ । किसी भी प्राइवेट स्कूल की टोटल सीट में से 5% सीट RTE के तहत गरीबों के लिए आरक्षित है । क्या समझे ?

यही कि साहब, पढाई ही सब कुछ है । इसके बिना जीवन दुश्वार है ।

Dedicate to #पढ़ेगा_इंडिया_तभी_तो_बढ़ेगा_इंडिया

डॉ कलाम को श्रद्धांजलि

डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम (Avul Pakir Jainulabdeen Abdul Kalam ) का जन्म 15 October 1931 को तमिलनाडु के Rameswaram में हुआ । इन्होंने 1960 ...