Wednesday, 13 April 2016

जलियाँवाला बाग के बलिदान की कीमत समझो

बैसाखी पर्व की सभी को हार्दिक शुभकामनायें । आपका आने वाला साल खुशियों भरा हो ।
आज से 97 साल पहले बैसाखी के दिन 13 अप्रैल 1919 को अमृतसर के जलियांवाला बाग में आज़ादी के दीवानों ने एक सभा रखी थी । सभा का उद्देश्य भारत प्रतिरक्षा कानून ( रॉलट एक्ट ) का विरोध कर इस काले कानून को हटाने का था । यह कानून आजादी के लिए चल रहे आंदोलन पर रोक लगाने के लिए लाया गया था, जिसके अंतर्गत ब्रिटिश सरकार को और अधिक अधिकार दिए गए थे जिससे वह प्रेस पर सेंसरशिप लगा सकती थी, नेताओं को बिना मुकदमें के जेल में रख सकती थी, लोगों को बिना वॉरण्ट के गिरफ़्तार कर सकती थी, उन पर विशेष ट्रिब्यूनलों और बंद कमरों में बिना जवाबदेही दिए हुए मुकदमा चला सकती थी, आदि । इसके विरोध में पूरा भारत उठ खड़ा हुआ और देश भर में लोग गिरफ्तारियां दे रहे थे।
 चूँकि इन प्रदर्शनों की वजह से पुरे शहर में कर्फ्यू लगा हुआ था पर 13 अप्रैल को बैसाखी का त्यौहार था इसलिये जलियाँवाला बाग के पास ही मेला लगा था । मेला देखने और शहर घूमने आए लोग भी  सभा की खबर सुन कर जलियाँवाला बाग में पहुंचने लगे । इस दौरान सभा में उम्मीद से बहुत ज्यादा लोग आ गये थे । सभा शुरू हुई और नेता बाग में पड़ी रोड़ियों के ढेर पर खड़े हो कर भाषण दे रहे थे, तभी ब्रिगेडियर जनरल ( रेजीनॉल्ड ) डायर 90 ब्रिटिश सैनिकों को लेकर वहां पहुँच गया। उन सब के हाथों में भरी हुई राइफलें थीं। नेताओं ने सैनिकों को देखा, तो उन्होंने वहां मौजूद लोगों से शांत बैठे रहने के लिए कहा । पर जनरल
डायर के आदेश पर सैनिकों ने बाग को घेर कर बिना कोई चेतावनी दिए निहत्थे लोगों पर गोलियाँ चलानी शुरु कर दीं। 10 मिनट में कुल 1650 राउंड गोलियां चलाई गईं । जलियांवाला बाग तक जाने या बाहर निकलने के लिए केवल एक संकरा रास्ता था और चारों ओर मकान थे। निकलने का कोई और रास्ता नहीं था। कुछ लोग जान बचाने के लिए मैदान में मौजूद एकमात्र कुएं में कूद गए, पर देखते ही देखते वह कुआं भी लाशों से पट गया । और बाकि लोग गोलियों से भून दिए गए । जलियांवाला बाग लाशों से भर गया । समय पर चिकित्सा सेवा नहीं मिलने से घायलों की भी जान नहीं बचाई जा सकी । लोगों ने तड़प-तड़प कर वहीं दम तोड़ दिया।
अकेले कुए से 120 शव निकाले गये । अमृतसर के डिप्टी कमिश्नर कार्यालय में 484 शहीदों की सूची है, जबकि जलियांवाला बाग में कुल 388 शहीदों की सूची है। ब्रिटिश राज के अभिलेख इस घटना में 200 लोगों के घायल होने और 379 लोगों के शहीद होने की बात स्वीकार करते है जिनमें से 337 पुरुष, 41 नाबालिग लड़के और एक 6-सप्ताह का बच्चा था । जबकि अमृतसर के तत्कालीन सिविल सर्जन डॉक्टर स्मिथ के अनुसार मरने वालों की संख्या 1800 से अधिक थी ।
ये भारतीय आज़ादी आंदोलन का वो ऐतिहासिक दिन था जिसके बाद भारतियों में आज़ादी की भावना आकार लेने लगी । इसी हत्याकांड से भगतसिंह, उधमसिंह जैसे वीरों के दिल में अंग्रेजी सत्ता के विरोध में ज्वाला भड़क उठी ।
जलियाँवाला बाग तो एक छोटा सा पड़ाव था आज़ादी प्राप्ति के दौरान, ऐसे और भी कई संघर्षो से हमें आज़ादी मिली । हमारे पुर्वजों ने अपनी जान देकर आज़ादी ली थी इसलिये इसे सहेजें, इस आज़ादी का मूल्य समझो । यूँ ही चंद धर्म, क्षेत्र, जाति और भाषा के ठेकेदारों के कहने से बंटो मत, एक हो जाओ । एकता में ही शक्ति है । उन छद्म लोगों से बचो जो "मुँह में विश्वगुरु भारत और बगल में साम्प्रदायिकता का छुरा" लिये घूमते हैं । ये लोग सत्ता के मोह में भारत का विरोध करने वालों के साथ मिलकर कश्मीर में सरक़ार बना लेते हैं पर बाकि भारत में जनता को उनके मुख्य मुद्दों जैसे गरीबी, पीने का पानी, भुखमरी, रहने, रोजगार, चिकित्सा, बिजली, प्राथमिक सुविधाएँ आदि से ध्यान भटकाने के लिये छद्म राष्ट्रवाद का सहारा लेते हैं क्योंकि उनको डर है कि कहीं कोई उनसे वो सवाल न पुछ ले जिनके नाम पर गला फाड़-फाड़ कर वोट माँगे थे । वो डरते हैं 15 लाख के वादे के सवाल से, 1 बदले 10 सिर लाने से, मामूली कुछ हजार के ऋण से आत्महत्या करने वाले किसान की विधवा के सवालों से, भ्रष्टाचार के सवाल से ।आज फिर केंद्र की सरक़ार रोलट एक्ट का प्रयोग कर रही है, असहनशीलता, असंवेदनशीलता, धार्मिक उन्माद की वजह से आपातकाल जैसे हालात हो गए हैं । इसलिये ऐसे ढोंगियों से बचो और अपने पुरखों के बलिदान को याद रखते हुये मजबूत देश और जागरूक नागरिक समाज के निर्माण में सहयोग दें ।
जय हिन्द ।

Monday, 11 April 2016

लातूर का फ़ितूर

लातूर ( महारष्ट्र ) में पानी के स्रोतो पर धारा 144 लगी है, 8 - 10 किसान रोजाना आत्महत्या कर लेते हैं, पूरा विदर्भ आपातकाल में जी रहा है, पीने को पानी महीने में एक बार मिल रहा है । उत्तर भारतियों की तरह बाथ टब में नहाने, कार वाश या लोन में पानी छिड़काने वाली हालत अब विदर्भ की नही रही । साफ साफ शब्दों में कहूँ तो महाराष्ट्र में अब जीने का अधिकार भी छीन सा गया है । हर तरफ लोग परेशान हैं पर आईपीएल को पानी मिल रहा है क्योंकि उनको खेलने का अधिकार है पर आपको जीने का नहीं ।
एक बड़े से राष्ट्र के अंदर एक छोटा सा महाराष्ट्र है और उसमें भी 10 - 15 छोटे मोटे लातूर - फतुर टाइप के जिले । तो अब ये असंवेदनशील भीड़ आपके इन छोटे मोटे पचड़ों में पड़े या आईपीएल, भारत माता जैसे बड़े और महत्वपूर्ण मुद्दों पर बहस करे जिसमें आम लोगों के हक़ आसानी से मारे जा सके ।

सवाल है मानव कल्याण का, जो अब उठता या हम उठाते नहीं दिख रहे ? तो क्या हम सब मर / सो गए हैं जो कुछ नहीं कर पा रहे ? नहीं हम जिंदा है और जागे हुये भी पर हम कहीं ओर उलझे हुये हैं । मानव कल्याण अब हमारा मुद्दा नहीं रहा । अब हमें किसी के जीने या मरने पर बात करने का वक्त नही रहा । एक दिन ये हमारे साथ भी होगा पर तब बाकि लोगों के पास भी ऐसे बेकार के मुद्दों के लिये वक्त नहीं रहेगा । तब हम उस भीड़ को कोसेंगे जो आज हमने तैयार की है, एक असंवेदनशील भीड़, लेकिन कोई फायदा नहीं होगा । हम अपने चारों तरफ नरमुंडों का ऐसा हुजूम इकट्ठा किये जा रहे हैं जिनमें इंसानी लक्षण न के बराबर हैं । जानवरों की तरह व्यवहार करने वाला इंसानी हुजूम, जिनमें समझ नाम की चीज बिल्कुल नहीं है ।

तो आप सोचिये जिंदा है कि परलोक गमन कर गये

Wednesday, 23 March 2016

" क्रांति की तलवार विचारों की सान पर तेज होती है " - भगत सिंह

भगतसिंह, सुखदेव और राजगुरु - ये 3 वो नाम हैं जिन्होंने भारतीयों को स्वतंत्रता के मायने समझाये । एक नये विचार ( शोषण का जिंदगी के अंतिम पल तक विरोध ) को जन्म देने वाले ये लोग अंग्रेजो को भारत से खदेड़ने वाले अग्रणी क्रांतिकारियों में शुमार किये जाते हैं । 
तर्क़ और विचार भगतसिंह की दो सबसे बड़ी खूबियाँ थी जो उन्हें बाकि के क्रांतिकारियों से अलग करती थी ।
भगतसिंह और उनके साथियों ने न सिर्फ अंग्रेजों का विरोध किया था साथ ही उन भारतीयों का भी, जिन्होंने भारतीयों का शोषण किया जैसे राजा, सामंत, अंग्रेजों के ऐशो - आराम पर पलने वाले भारतीय आदि, खुलकर विरोध किया । जब भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन को एक तार्किक और इंक़लाबी व्यक्तित्व की जरूरत थी तब भगतसिंह युवाओं के नायक बनकर उभरे । भगतसिंह ने ने कहा था कि " क्रांति की तलवार विचारों की सान पर तेज होती है " अर्थात् क्रांति तब तक व्यर्थ है जब तक कि उसमें विचार न हो । बिना विचार की क्रांति असंतुष्ट लोगों के शासन में आने सिवाय कुछ नहीं है ।
भगतसिंह एक एक ऐसा क्रांतिकारी था जो अपनी बातों को तर्क़ के साथ रखता था । और जब वो भारतीयों तक अपनी आवाज पहुँचाने में असमर्थ थे और भारतीयों के बीच में स्वतंत्रता के प्रति जागरूकता नहीं थी तब भारतीयों तक बात पहुँचाने के लिये भगतसिंह और उनके साथियों ने लाहोर के कोर्ट में बम फेंका और अपनी गिरफ्तारी देकर अंग्रेजी राजसत्ता के अख़बारों के जरिये तर्क़ से गुलाम भारतीयों के मन में क्रांति की ज्वाला भड़काते थे ।
साथ ही भगतसिंह का ये भी मानना था कि सत्ता परिवर्तन हमारा पहला उद्देश्य नहीं होना चाहिये । हमारा पहला उद्देश्य लोगों में जागरूकता फैलाना होना चाहिये क्योंकि जागरूक लोगों को ये समझ अच्छे से होती है कि कौन उनका हक़ मार रहा है और कौन उनको हक़ दे रहा है । एक जागरूक शिक्षित नागरिक, हजारों बुजदिलों साक्षरों से ज्यादा बेहतर है ।  अकेले साक्षर बनने से हालात नहीं बदलने वाले, शिक्षित बनो । हम भारतीयों को साक्षर ( Literate ) और शिक्षित ( Educated ) का फ़र्क़ समझना होगा ।  राजसत्ता चाहती है कि एक पढ़ा लिखा अर्थात् साक्षर नागरिक तैयार हो जो उसके सभी काम कर दे पर कोई सवाल न करें, मुखर न हो जबकि शिक्षा उसमें समझ और तर्क़ पैदा करती है, जिससे वो अपनी सरकार से सवाल करता है, अधिकार माँगता है, सरकारों को निरंकुश बनने से रोकता है ।
आज भगतसिंह जैसे क्रांतिकारियों की सबसे ज्यादा जरूरत है, जब देश फिर से उसी दौर से गुजर रहा है, जब सरकार और उसके कारिंदे संगठन आपको बोलने, खाने, पीने, रहने और कपड़े पहनने पर अंकुश लगाने की कोशिश कर रहें है तब हमें भागतसिंह याद आते हैं । भागतसिंह ने हमेशा " शोषण की खिलाफत " पर जोर दिया था । आज से 85 साल पहले भगतसिंह ने आज के समय के बारे में आगाह कर दिया था, बकौल " भारत से गोरे अंग्रेज चले जायेंगे तो काले अंग्रेजों ( भारतीय शोषक वर्ग ) का शासन आ जायेगा, पर हमें एक ऐसे भारत का निर्माण करना है जहाँ सभी सभी को उनके मूल अधिकार मिलें, सभी को समान अवसर मिले, सभी को अभिव्यक्ति, खाने, पीने, पहनने और बेबाकी से अपने विचार रखने की #आज़ादी हो ।" भगतसिंह का आज़ादी से आशय एक ऐसे समाज के निर्माण से था जहाँ गरीबी, भुखमरी, अंधविश्वास, शोषण, बेतरतीब पूँजीवाद की कोई जगह नहीं हो ।
शहीद दिवस पर भगतसिंह, सुखदेव और राजगुरु को सच्ची श्रद्धांजली यही होगी कि उनके सपनों का भारत बनाने का संकल्प लें और उनका सपना साकार करें ।
इंक़लाब जिंदाबाद ।

Thursday, 11 February 2016

देशभक्ति

( मैं आज कई बातें करना चाहूँगा जो अक्सर कर नहीं पाता हूँ । क्योंकि मैं भी खुद को बाकि भीड़ की तरह देशभक्त दिखना चाहता हूँ पर आज मैं पुरे होशो-हवाश में लिखना चाहता हूँ । )

R.I.P. Hanumanthappa sir,
कुछ समय बाद, हर शहीद की तरह आपकी शहादत भी भुला दी जायेगी । आप हमारे रोहित वेमुल्ला हो । क्योंकि रोहित संस्थानिक हत्या का और आप राजनैतिक हत्या का न तो पहला और न ही अंतिम उदाहरण हो लेकिन आपकी वजह से सवाल उठे हैं । इसलिये आप का स्थान थोड़ा अलग है पर हश्र आपकी शहादत का भी वही होना है । 4 दिन की मीडियाबाज़ी और कुछ सरकारी कारिंदो के 2 मिनट बाइट्स, इससे ज्यादा की उम्मीद रखना बेवकूफी होगी ।

पर आपकी शहादत कई सवाल छोड़ गयी है ।
पहला सवाल तो यही है कि आख़िरकार देशभक्ति क्या है ? किसी की मौत पर DP में तिरंगा लगा लेना ? देशभक्ति के 4 मेसेज भेजना ? या फिर कश्मीर को लेकर पाकिस्तान को गाली निकालना । हिन्दुओं में देशभक्ति मुसलमानों को गाली निकालने पर साबित की जाती है और मुस्लिमों में वंदे मातरम् या भारत माता की जय बोलकर देशभक्ति साबित की जाती है । यदि आप में भी इनमें से कोई गुण है तो माफ़ करना मेरी नजर में आप देशभक्त या यूँ कहें कि कथाकथित राष्ट्रवादी नहीं है ।
मेरी नजर में देशभक्ति आम आदमी की मुख्य समस्याओं पर बोलने को लेकर है, अगर आप रोटी, कपड़ा, मकान, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, गरीबी और आतंकवाद को लेकर बात करते हो तो देशभक्त हो वरना मन्दबुद्धि या मनोरोगी से ज्यादा नहीं जिसे बार बार कश्मीर - मुसलमानों के दोरे आते हो । आतंकवाद एक छोटी सी समस्या है जिसको नेताओं और कथित देशभक्तों ( मन्दबुद्धि ) ने सबसे बड़ा मुद्दा बना दिया है । इसकी आड़ लेकर कोई भी बच जाता है ।

अब बात करते हैं आँकड़ो की, जिनसे आपको थोड़ी समझने में आसानी हो जैसे सियाचीन पर सरकार आज तक लगभग 900 जवानों को मरवा चुकी है, वो भी बिना गोली खाये और वो गिनती से बाहर हैं जो वहाँ ड्यूटी के दौरान बीमार हो के बाद में मर गये । कारगिल में हमारे कुछ 550 जवान शहीद हुए थे । इस हिसाब से हम ढेढ़ कारगिल बिना गोली खाये ही लड़ चुके हैं । एक रोटी वहाँ यदि कोई जवान खाता है तो ₹200 रुपये की पड़ती है । रहने के लिये लाखों रुपयों के विशेष सूट दिए जाते हैं । सोने के लिये लाखों का एयरबैग, पानी पीने से पहले एक गोली डालनी पड़ती है पानी में ।

मेरे घर में भी 7 लोग फौज में हैं, जब कहीं भी किसी के मरने की खबर आती है तो अंदर डर सा लगता है । घरवालों का नाम नहीं मिलता तो क्षणिक ख़ुशी होती है, क्षणिक इसलिये क्योंकि मेरे घर का न सही किसी दूसरे का चिराग तो बुझा ही है ।  मन खिन्न हो जाता है, पर क्या करें दोष भी किसको दें ? पाक आर्मी के उन जवानों को; जो हमारे जवानों की भाँति किसी कॉर्पोरेट घराने की सरकार की हठी पर मरते हैं या मारते हैं । नहीं, कभी नहीं । क्योंकि उनके तो हाल हमसे भी फटेहाल हैं । 2 साल पहले ही उनके 129 जवान बर्फ में दबके शहीद हो गये ।

मेरा गुस्सा मेरी सरकार ( चाहे वो मेरे वोट से बनी हो या न बनी हो ) से है । जब मुझे ये पता चला कि पाकिस्तान ने आगे चलकर भारत सरकार को कहा है कि वहाँ से दोनों देशों द्वारा सेना हटा ली जाये । यही नहीं, इस मुद्दे को पाकिस्तान UN तक भी लेकर गया है पर अफ़सोस हमारी सरकार मामले को पेचीदा बनाये रखने पर आमदा है । कल भी पाक के भारत में उच्चायुक्त अब्दुल बासित ने कहा " अब दोनों देशों को बैठकर निर्णय करना चाहिये कि आगे ऐसे कोई और हनुमन्थप्पा शहीद न हो, हम सेना हटाने की अपील करते हैं ।" पर हमारी सरकार की तरफ से इस तरह के किसी भी बयान की आहट अभी तक सुनाई नहीं दी ।

क्या वो इतना भी नहीं कर सकती कि तीनों देश बैठ के आराम से इस मसले को सुलझा ले । कर सकती है पर नहीं करती, क्योंकि उनको पता है, चाहे एक जवान मरे पर पुरे देश में के  सब सवालों को अपनी चिता में कुछ दिनों के लिये तो समेट ही लेगा । इस तरह सरकारों का काम हम आज तक निकालते आये हैं और निकालते रहेंगे । जहाँ हमें सबसे ज्यादा सवाल करने चाहिये वहीं हम सबसे पहले चुप हो जाते हैं । हम जैसे सैनिक परिवारों के लोग सवाल उठाते हैं पर हमें तुरंत  देशद्रोही बोलकर चुप करा दिया जाता है । और ये चुप कराने वाले वे लोग हैं जिनकी 7 पीढ़ियों का भी फौज से कोई वास्ता न पड़ा हो । ये वही लोग हैं जो आपको बात बात पर पाकिस्तान भेजने की बात करते हैं । क्योंकि इनकी देशभक्ति किसी शहीद की चिता से उबाल मारती है ।  क्योंकि इनका सवाल रोटी, कपड़ा और मकान नहीं हैं । इस जमात को जब तक कश्मीर नहीं दिखाया जाता तब तक इनकी देशभक्ति किसी कोने में निर्जीव सी पड़ी होती है पर कश्मीर आते ही इनकी देशभक्ति फड़फड़ाने लगती है । ये ही लोग हल्ला मचाने में सबसे आगे हैं ।

देशभक्ति के नाम पर बनाई जा रही हवा को मैं कुछ उदाहरणों से हवा करना चाहूँगा, जैसे सबसे पहले बाबा ( बनिया ) रामदेव का उदाहरण देता हूँ । जैसे ही हनुमन्थप्पा सर की बॉडी बाहर निकाली और पता चला कि कुछ साँसे बाकि है तो बोले " ये योग का कमाल है, आप भी कीजिये । "
ये रामदेव जैसे उसी बाजार के हिस्सा हैं जो किसी हनुमन्थप्पा के जिंदा बर्फ से निकलने को अपने किसी #उत्पाद का कमाल बताते हैं । पर उनका हक़ जायज है क्योंकि हम लोग ही उनकी बात को और अधिक मजबूती से रखते हैं ।

दूसरा उदाहरण है नेता जी का, जो इस प्रकार है -
कुछ दिन पहले की बात है जब एक फाइटर प्लेन क्रैश में एक पायलट की मौत हो गयी थी तो उस शहीद की बेटी ने गृहमंत्री राजनाथ सिंह जी से पूछा था " जब प्लेन नकारा हैं तो इनको हटाते क्यों नही ? हर बार हम ही क्यों मरते हैं ? हर बार इसका शिकार एक सैनिक ही क्यों होता है ? " गृहमंत्री ने निकलने में भलाई समझी बजाय किसी निर्णय के ।

अंतिम है बेवकूफी में निकली सच्चाई का । कुछ दिन पहले जब झुंझुनू में केंद्रीय मंत्री ने बयान दिया " जहाँ बेरोजगारी होती है वहाँ के लोगों का फौज में रुझान ज्यादा होता है । "
लोगों ने खूब आपतियां की पर मुझे बिल्कुल भी खामी नजर नहीं आई । जिनको नजर आई वो या तो फौजी परिवारों से अंजान हैं या फिर दिखावा कर रहे हैं । सबको पता है फौज में जाने वाले किसान या मजदूर परिवारों से होते हैं, हनुमन्थप्पा का उदाहरण ही ले लो, चौथी बार में जाकर सेना में भर्ती हो पाये थे । 6km दूर स्कूल में पैदल पढ़ने जाते थे । घर की आर्थिक स्थिति कमजोर थी । घरवालों को पता था कि गोली कभी भी सीने से आर पार हो सकती है, फिर भी हँसते हँसते विदा करते थे । क्यों ?  क्योंकि पेट भरना भी जरूरी है । बहकावे की दूनिया से बाहर निकलिये, हकीकत में आइये । मैं खुले तौर पर स्वीकार करता हूँ कि मुझे उस सरकार पर जरा सा भी विस्वास नहीं जो गरीबी, भुखमरी, बेरोजगारी, शिक्षा, स्वास्थ्य, आतंकवाद जैसी मुख्य समस्याओं पर बात नहीं करती है ।  देशभक्ति लोकतंत्र में हक़ मारने का नया हथियार बन गया है । 
अब सवाल करने का समय है, भावनाओं में बहने का नहीं । सरकार के खजाने को देश का भिखारी भी टैक्स से भरता है, सवाल करना हक़ है, तो जमके सवाल कीजिये





Saturday, 6 February 2016

Room Rent Act

मैं कई सालों से अनुभव कर रहा हूँ कि एक #Room_Rent_Act होना चाहिये । जब से घर से बाहर रहने आया हूँ किराये को लेकर परेशान हूँ । शहरों में लोग अब जितना मुँह फाड़ सकते हैं फाड़ते हैं और हमें मजबूरी में भरना भी पड़ता है । क्या करें ? किससे गुहार लगायें क्योंकि हम नहीं तो कोई और देगा पर इनका मुँह भरने वाले तो मिल जायेंगे । देश के किसी भी हिस्से में किसी भी यूनिवर्सिटी में एक मीटिंग करके देखिये, सभी छात्रों की ये अहम समस्या थी, है और जल्द इसपर कुछ न किया गया तो आगे और भी विकराल होगी । पर सरकार या किसी यूनिवर्सिटी के VC को इन सबसे क्या ? क्योंकि इनके बच्चों को तो यहाँ रहने के लिये सरकारी हॉस्टल आसानी से या सेटिंग से मिल जाता है । और स्टूडेंट लीडर्स को इन सबसे क्या मतलब ? उनका तो काम ही बाहर प्रदर्शन और अंदर जी हुजूरी का है ।

मैंने ये बात कई बार उठाई भी पर किसी का कोई समर्थन नहीं मिला पर आज फिर समर्थन की उम्मीद के साथ लिख रहा हूँ -

Room Rent Act -

1. छात्रों और नगर निगम/पालिका/परिषद् के पदाधिकारियों को मिलाकर किराया निर्धारण हेतु एक समिति का गठन किया जाये ।

2. इसमें छात्र और पदाधिकारियों की संख्या 60 : 40 हो

3. एक रेगुलेटरी कमिटी भी हो जो इस तरह की शिकायतों का निस्तारण करे

4. महीना पूरा होने के बाद 5 दिन अगले महीने का किराया चुकाने के लिये दिये जायें । 5 दिन बाद भी किराया नहीं चुकाया जाता है तो मकान मालिक कार्यवाही को लेकर स्वतंत्र है

5. सिक्यूरिटी के लिये अधिकतम सीमा ₹500 से ज्यादा न हो, जो कि रूम खाली करने पर लौटाई जाये

6. पुलिस वैरिफिकेशन का प्रोसेस आसान किया जाये

7. कमरे में सभी सुविधायें दी जाये जैसे सैपरेट लेट-बाथ, किचन ।

8. पर्याप्त पानी दिया जाये वो भी बिना किसी एक्स्ट्रा पेमेंट के

9. बिजली का खर्चा 4 से 6 रुपये प्रति यूनिट तय किया जाये, न कि मनमाफिक 10 से 15 तक ।

संशोधन हेतु आपके सुझाव आमंत्रित हैं

Jitendra Puniya
9667898484

Friday, 5 February 2016

देश की इज्जत

जब देश में गरीबी, बेरोजगारी और असहिष्णुता अपने चरम पर हैं तो कुछ लोगों को ये चिंता सताये जा रही है कि दिल्ली के CM ने फ्रांस के राष्ट्रपति के सम्मान में दिये भोज में सैंडल क्यों पहनी । ये सवाल करने वाले लोग सिर्फ राजनैतिक वजह से कर रहे हैं । क्योंकि इनका राजनैतिक स्वार्थ न होता तो यही सवाल वो अपनी पार्टी के लीडर और रक्षामंत्री मनोहर पर्रिकर से भी करते । मैं तो सार्वजनिक रूप से स्वीकार भी करता हूँ कि देश का सौभाग्य है कि ये जमात अब जन्मी है वरना ये आज़ादी के समय होते तो बोलते गाँधीजी ने देश की नाक कटवा दी, इंग्लैंड के PM से सिर्फ धोती पहन के मिल आये या फिर शास्त्री जी के बारे में बोलते कि रूस में फ़टी हुई धोती को सिलाई करवाके पहनता है, देश की नाक कटवा दी ।
क्या इस जमात से हमें उल्टा सवाल नहीं करना चाहिए कि जिस नरेंद्र मोदी के पास सिर्फ 4700 रुपये हैं वो 10 लाख का सूट कहाँ से लाया ? दिन में 5 परिधान बदलता है तो वो कहाँ से लाता है ? महँगे ब्रांड के गॉगल्स खरीदने के पैसे कहाँ से लाता है क्योंकि उनकी सम्पति उस शोरूम में घुसने का ख्याल तक नहीं आने देती ।

खैर इस बहस को राजनैतिक न बनाते हुए सामाजिकता पर आते हैं । सबसे पहले तो उस इंजीनियर का धन्यवाद जिसने ये पहल की । यदि इसमें उनके राजनैतिक चटकारे को निकाल दें तो ये सच में बहुत अच्छी पहल है । इसे और व्यापक बनाया जाना चाहिये । हमें जितनी सहायता हो सके उतने जूते जरूरतमंद लोगों को पहनाने चाहिए । जिसकी जितनी श्रद्धा हो उतनी सहायता करें । देश की इज्जत इस बात पर निर्भर नहीं करती कि किसी दिल्ली प्रदेश का CM अरविन्द केजरीवाल क्या पहनता है, देश की इज्जत इस बात पर निर्भर करती है कि उस देश के लोग क्या पहनते हैं । तो जनाब ज्यादा न सही देश की इज्जत की सही बोली तो लगाइये ।

कुछ दिन पहले एक खबर देखी थी कि कहीं पर एक लड़की के पास पहनने को जूते नहीं थे फिर भी उसने नंगे पैर दौड़कर गोल्ड मैडल जीता । यहाँ गौर करने वाली बात ये है कि जरूरतमंद को हम कितना दे पाये आज 70 सालों में । सरकारें पूँजीपतियों की होती है आम आदमी की नहीं । और जब सरकारें निकम्मी हो तो अवाम को आगे आना पड़ता है और ये सही समय है जब अवाम को आगे आने की जरूरत है । हमें उस तबके को आगे लाना है जो इस व्यवस्था के अंतिम छोर पर खड़ा है । आज लोग  मर रहे हैं क्योंकि दुनिया का सबसे बडा लोकतंत्र उनको खाने के लिये रोटी, तन ढ़कने के लिये कपड़ा और रहने के लिए मकान नहीं दे पाया है । जब सरकारें एक व्यक्ति की प्राथमिक जरूरतें भी पूरी नहीं कर पाई है तो हमें बुलेट ट्रेन, विकास जैसी बातों को छोड़कर इन चीजों पर ध्यान देने की जरूरत ज्यादा है । सवाल ये नहीं है कि केंद्र में मैंने जिसे वोट दिया उसकी सरकार है कि नहीं । सवाल है क्या सरकार अपने कर्तव्यों को निभा रही है ? क्या उसमें अंतिम छोर पर खड़े व्यक्ति तक पहुँचने की इच्छाशक्ति है ? क्या वो नागरिक अधिकारों का सम्मान करती है ? यदि आपके सभी जवाब 'ना' में है तो अवाम को अब जागने की जरूरत है । लड़ने की जरूरत है । सोचने की जरूरत है कि उसका भला कौन कर सकता है ? जानने की जरूरत है कि उसके अधिकार क्या हैं ?


जागना अब खुद को है, अब कोई गाँधी, सुभाष, भगतसिंह, JP, लोहिया नहीं आने वाले हैं, आपको ही बनना है अपना लीडर, तो उठो, जागो और तब तक मत रुको जब तक कि मंजिल नसीब न हो जाये ।

Saturday, 30 January 2016

जाने किसकी नजर लग गयी है अब ...

"जाने किसकी नजर लग गयी है अब...." ये कविता गाँधी जी और युवा साथी रोहित वेमुल्ला के संघर्ष समर्पित है ....
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सदियों पहले,
मेरे गाँव में फसलें ऊगा करती थी, प्यार, भाईचारे और सद्भाव की,
जाने किसकी नजर लग गयी है अब,
जो उगती हैं फसलें, घृणा, दुश्मनी और तकरार की ।

सदियों पहले,
निराई की थी झूठ और अत्याचार की,
जाने किसकी नजर लग गयी है अब,
जो फिर से उग आई हैं झाड़ियाँ ईर्ष्या और अहंकार की ।

सदियों पहले,
बुवाई की थी मानवता और सदाचार की,
जाने किसकी नजर लग गयी है अब,
जो उग आई है खरपतवार कदाचार की ।

सदियों पहले,
पकने वाली थी फसल मानवता की,
जाने किसकी नजर लग गयी है अब,
जो पड़ा अकाल तो उजड़ गयी खेती सौहार्द की ।

सदियों पहले,
लहलहाती थी फसलें सत्य और अहिंसा की,
जाने किसकी नजर लग गयी है अब,
जो हो गयी है बंजर मिट्टी हिन्दुस्तान की ।



सदियों पहले,
मेरे गाँव में फसलें ऊगा करती थी, प्यार, भाईचारे और सद्भाव की,
जाने किसकी नजर लग गयी है अब,
जो उगती हैं फसलें, घृणा, दुश्मनी और तकरार की ।

डॉ कलाम को श्रद्धांजलि

डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम (Avul Pakir Jainulabdeen Abdul Kalam ) का जन्म 15 October 1931 को तमिलनाडु के Rameswaram में हुआ । इन्होंने 1960 ...