Wednesday, 8 June 2016

भगवान और मन्नतों का खेल - Hari Garhwal

ये भगवान आखिर किधर है भाई
और ये मन्नत मांगना और पूरी करने वाला क्या लफड़ा है जी
मेरे हिसाब से तो कुछ नहीं
ये सब ढपोल बनाने के तरीके हैं
कोई दम नहीं है इन मन्नतों में
मन्नत पूरी करने वाला न कोई भगवान है न कोई खुदा
सब तुक्के के खेल हैं
तुक्का लगा तो मन्नत पूरी हुई समझ लो
तुक्का नहीं लगा तो बुराई का भांडा आपके माथे फूटना है कि सच्चे मन से मन्नत नहीं मांगी थी
एक बानगी
जब हमारी झमकुड़ी प्रेग्नेंट थी तो सब घरकों की दिली इच्छा थी बेटी होये
इसलिए सभी ने बेटी के लिए अपने अपने स्तर पर भगवान से मन्नत मांगी
किसी ने बालाजी से
किसी ने माताजी से
किसी ने भैरुजी से
किसी ने पितर जी से
कोई ब्रत कर रहा था
कोई प्रसाद बोल रहा था
कोई सवामणी बोल रहा था
कोई दुआ मांग रहा था
लेकिन हुआ क्या ??
आपको पता ही है
अपने # Vishu
अब गौर करने वाली बात ये है कि एक आधा भगवान तो फ़ैल हो जाए चूक हो जाए
लेकिन सभी कैसे चूक गए सभी कैसे फ़ैल हो गए
रही बात सच्चे मन से मन्नत मांगने नहीं मांगने की
तो एक आध मेरे जैसे की तो मान लें कि ये एकदम झूठा है लेकिन सभी तो झूठे नहीं हो सकते
फिर गड़बड़ी आखिर हुई तो कहाँ हुई ?
अजी गड़बड़ी कुछ नहीं हुई
बस तुक्का नहीं लगा
तुक्का किसका ?
जब निषेचन की प्रक्रिया सम्पन्न होने को थी उस वक्त X गुणसूत्र वाले शुक्राणु का अंडाणु के साथ निषेचन का तुक्का नहीं लगा
तुक्का ऐसा लगा कि X और Y गुणसूत्र ऊँचके दौड़ रहे शुक्राणुओं में से Y वाला तेज निकला या तुक्का लगा, जो भी हुआ Y वाला जीत गया था
वहीं भगवान जी भी फ़ैल हो गए थे
अब दुआओं में और मन्नतों में और सवामणी प्रसादों वाली घूस में क्या रखा था
जिसको जीतना था वो तो जीत चुका था अब इसको न कोई भगवान न कोई खुदा बदल सकता था
अब सवाल ये है कि फिर ये भगवान जी नाम की दुकानदारी आखिर चल कैसे रही है ?
चल ऐसे रही है कि हम पीढ़ी दर पीढ़ी मानसिक तौर पर गुलामी सहते आये हैं भगवान नाम की दूकान लगाये व्यापरियों की, जो हमें इस गुलामी में आस्था, धर्म, शांति आदि शब्दों के मायाजाल में फंसा कर बैठे हैं और मजे से अपना जीवन व्यतीत कर रहे हैं और दान चढ़ावे के नाम पर लोग जेब कटाये जा रहे हैं।
अगर उस दिन X वाले का तुक्का लग जाता तो हम सब पक्के वाले भगत होके कहते फिरते देखो जी फलाणे मिन्दर वाले भगवान ने हमारी मिन्नत पूरी कर दी
और दो च्यार को और उधर जोड़ देते फोगट में भचीड़ खाने को
मैं तो तब भी कहता था जो होना है वो फाइनल हो चुका
लेकिन घरके थोड़े मान जाएँ
वो तुक्के के चक्कर में अटके रहे पूरे नौ महीने
आखिर तुक्का नहीं लगा तो सब आराम से अपने अपने काम लग गए
इसलिए
कुछ नहीं रखा इसमें भैया
इस मायाजाल से जितना जल्दी होये निकलने में फायदा है
नहीं तो बने रहो गुलाम उन व्यापारियों के और ठगाते लुटवाते रहो खुद को।
आपको भगवान को खोजना है पूजना है
भगवान कहीं और नहीं अपने भीतर है उसको खोजिए उसको पहचानिये उसको पूजिए। अपने भीतर के भगवान को जगाइए और इंसानियत की मानवता की बेहतरी का काम कीजिये वरना जिन भगवानों के पीछे हम दौड़ रहे हैं वो न कभी मिलने वाले हैं न किसी का भला करने वाले हैं दौड़ाते रहेंगे भगाते रहेंगे और हमें लुटाते रहेंगे।
नोट - आप मुझे नास्तिक भी समझें तो मुझे कोई दिक्कत नहीं है
और हाँ किसी की भावनाओं को ठेस पहुंची हो तो कृपया शालीनता और सभ्यता से बता दें ताकि पता लगे कि कितनों को चिरमिराट हुआ है क्योंकि सही बात कहकर चिरमिराट लगाना ही हमारा उद्देश्य है ।

( लेखक पेशे से शिक्षक हैं और खरी-खरी कहने के जाने जाते हैं )

Wednesday, 18 May 2016

Aap Youth Wing, Rajasthan Manifesto ( Prepared by Jitendra Puniya )

1. रोजगार - 

" बेरोजगारी सिर्फ कुछ घरों या युवाओं को ही बर्बाद नहीं करती वरन् ये पुरे देश को बर्बाद करती है "

* बेरोजगारी रोकने हेतु स्वरोजगार को बढ़ावा 
* स्वरोजगार हेतु सरकार सामाजिक और आर्थिक सहयोग देगी ।
* बेरोजगार युवाओं में Skill Development ( कौशल वृद्धि ) हेतु विभिन्न कार्यक्रम चलाकर रोजगार हेतु सक्षम बनाया जाये ।
* युवाओं को रोजगार हेतु सस्ता ऋण और सस्ती जमीन RICCO क्षेत्र में सिंगल विंडो पर उपलब्ध करवाई जाये ।
* रोजगार हेतु सरकार द्वारा आयोजित किसी भी भर्ती हेतु शुल्क नहीं लिया जायेगा ।
* भर्ती बोर्डों का पुनर्गठन कर उनको इस लायक बनाये कि भर्ती 6 महीने में पूर्ण हो जाये और ऑनलाइन परीक्षा करवाकर धाँधली और रिश्वतखोरी बंद की जाये जिससे भर्ती में 100% पारदर्शिता लायी जा सके ।
* भर्ती गृहजिले में ही करवाई जाये जिससे प्रार्थियों को कम से कम यात्रा खर्चा वहन करना पड़े । 
* रोजगार उपलब्ध करवाने हेतु हर 3 माह में जिला मुख्यालय पर रोजगार मेले का आयोजन किया जाये ।


2 . बेहतर भविष्य चयन 

"बेहतर भविष्य के निर्माण में विषय चयन नींव का काम करती है "

* 10वीं तथा 12वीं के बाद आगे की पढ़ाई और कॅरियर चयन हेतु स्पेशल प्रोग्राम बनाये जायें ।
* बेहतर कॅरियर के प्रति अनिश्चितता खत्म करने हेतु और आगे की पढ़ाई में सही विषय चुनाव की सलाह हेतु हर ग्राम पंचायत पर गाइडेंस और नॉलेज सेंटर की स्थापना की जाये ।

3. बेहतर शिक्षा

"वर्तमान शिक्षा सिर्फ साक्षर बनाने में सहायक है, शिक्षित बनाने में नहीं, अतः इसे बदला जाये "


* हर तहसील मुख्यालय पर कम से कम एक महाविद्यालय की स्थापना की जाये जिसमें ज्यादा से ज्यादा रोजगारपरक डिग्री/डिप्लोमा कोर्स संचालित किये जाए ।
* सभी विश्वविद्यालयों में रोजगार परक विषयों को बढ़ाया जाये ।
* नई उच्च शिक्षा निति हेतु एक स्वतंत्र आयोग बनाया जाये जो वर्तमान शिक्षा के ढाँचे में आमूलचुल परिवर्तन कर इसे अधिक तार्किक और रोजगारपरक बनाने हेतु अपनी रिपोर्ट दे, जिसे अगले सत्र से लागु किया जाये ।

4. हॉस्टल

" छात्रों को शैक्षिक माहौल, सस्ता रहना और पोषक भोजन एक जगह उपलब्ध करवाने के लिये हॉस्टल सबसे उपयुक्त जगह है "

* प्रत्येक कॉलेज अपने हॉस्टल रखे जिनका वाजिब खर्चा छात्र दे सकें ।
* हॉस्टल में खाना बनाने, साफ-सफाई और अन्य व्यवस्थाओं हेतु 7 छात्रों की रेगुलेटरी/मॉनिटरिंग कमिटी बने ।
* बाहर रहकर कोचिंग करने वाले छात्रों हेतु अलग से किराया निति बनाई जाये, जिससे मकान मालिकों के आर्थिक शोषण से बचा जा सके ।

5. फ्री शिक्षा - सबको शिक्षा

" शिक्षित और स्वस्थ युवा देश की धरोहर है "

* स्कूल से लेकर विश्वविद्यालय तक सबको फ्री शिक्षा दी जाये । इस बीच किसी भी प्रकार का शुल्क न लिया जाये ।
* बजट का 10वां हिस्सा शिक्षा, खेलकूद और युवा कल्याण पर खर्च हो ।
* 25 वर्ष की आयु तक सभी को फ्री मेडिकल फैसिलिटी दी जाये । कोई भी युवा किसी भी तरह से बोझ न बने ।
* 18 वर्ष से कम के बच्चे जो भीख माँगते हैं, मजदूरी करते हैं, होटल - दुकानों पर काम करते हैं उनके लिये अलग से शिक्षा और समग्र विकास के लिये हर जिला मुख्यालय पर सहशैक्षिक हॉस्टल खोले जाये ।

6. सबको शिक्षा 

" अनपढ़ युवा सरकार की नाकामी का सबूत है "

* नये कौशल विकास ( स्किल डेवलपमेंट यूनिवर्सिटी ) विश्वविद्यालय खोलें जाये 
* पंचायत समिति स्तर पर नई कॉलेज खोली जाये
* रिक्त पड़े शिक्षकों / व्याख्याताओं के पद भरे जाये 
* स्कूलों में निःशुल्क कंप्यूटर शिक्षा दी जाये 

7. खेल

" खेल युवाओं को प्रतिस्पर्धी बनाता है "

* नई खेल निति बने ।
* हर संभाग मुख्यालय पर SAI सेंटर खुले ।
* राज्य स्तर पर चयनित युवाओं को छात्रवृति सहित ट्रेनिंग दी जाये ।
* प्रत्येक पंचायत समिति स्तर पर स्टेडियम खोले जाये जिनमें हर खेल की सुविधा हो, इसके निर्माण वास्ते सरकार 2 करोड़ का बजट दे ।
* स्कूल और कॉलेज में अलग से स्पोर्ट्स बजट हो ।
* सभी स्कूल में शारीरिक शिक्षकों के पद भरे जाये ।
* किसी युवा का अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर चयन होने पर उसका * सारा खर्चा सरकार वहन करे ।
* ग्राम स्तर पर खेल मैदान की उपलब्धता हो ।


8. नशाबंदी 

" नशा, युवाओं का नाश करता है "

* शराबबंदी की जाये ।
* नशे के कारोबार में लिप्त लोगों पर कठोर करवाई हो 



9. युवा निति 


*नई युवा निति बनाई जाये ।

Thursday, 5 May 2016

मैं और कम्युनिज्म

आज महान दार्शनिक कार्ल मार्क्स का जन्मदिन है ( फोटो में उनकी लंदन के हाइड पार्क में स्थित कब्र । इस पर ऊपर ये शब्द लिखे हैं – दुनिया के मज़दूरों एक हो ! और नीचे लिखे हैं मार्क्स के प्रिय शब्द – दार्शनिकों ने दुनिया की तरह-तरह से व्याख्या की है, पर असली सवाल तो उसे बदलने का है! )

इस बहाने लगे हाथ अपनी भी बात कर लेते हैं । अपने साथ भी इनका थोडा कनेक्शन है तो उस पर भी बात कर लेते हैं । लोग बोलते हैं कि रहन-सहन, बात-विचार से तुम भी कॉमरेड हो । पर कम्युनिस्ट बोलते हैं तुम अवसरवादी हो या तुम पक्के कॉमरेड नहीं हो या लचीले या समझौतावादी कम्युनिस्ट हो । हो सकता है मैं उतना खाँटी कम्युनिस्ट नहीं हूँ जितने कि आप हैं । और न मैं खुद को कम्युनिस्ट कहता हूँ, मैं खुद को मानवतावादी कहलाना ज्यादा पसन्द करता हूँ बजाय कम्युनिस्ट के । अभी कुछ दिन पहले कन्हैया का न्यूज़ लॉण्ड्री को दिया इंटरव्यू देख रहा था, उसमें उसने 1 बात कही थी कि #Communism_is_highest_form_of_Humanism इस हिसाब से कोई मुझे कॉमरेड बोलता है तो ठीक है बाकि मुझे थोड़ा अजीब लगता है ।
मैं तो एक बात पूछता हूँ आप कम्युनिस्टों से कि क्या कम्युनिस्ट होना मानवतावादी होने से भी बड़ा है ?
जैसे कि कम्युनिस्ट सोच के 3 केंद्रीय बिंदु हैं

1. बाजार पर पूँजीपतियों का नियंत्रण हटाकर सरकारी नियंत्रण, मतलब बाजार का सरकारी मशीनरी द्वारा कंट्रोल
2. कोई काम करे या न करे पर सबको समान संसाधन वितरण यानि कि एक मनुष्य को एक इकाई मानना, ऊँच-नीच रहित समाज
3. सर्वहारा वर्ग ( मजदूरों ) का बुर्जुआ ( कम या ज्यादा अमीरों ) वर्ग पर तानाशाही आदि आदि ।

हाँ ठीक है, सहमत हूँ आपके पहले 2 बिंदुओं से कि पूँजीवाद / बाज़ारवाद ग़रीबो का हक़ मारता है । अमीर लोग गरीबों के हिस्से के संसाधन का बेतरतीब तरीके से उपभोग करते हैं । सहमत हूँ आपकी दोनों बातों से पर मेरा आपसे विरोध तीसरी बात को लेकर है जिसमें आप तानाशाही की बात करते हो । कम्युनिस्टों की सोच है कि ऐसे समाज का निर्माण सिर्फ हिंसा से होते हुये तानाशाही से ही लाया जा सकता है ।
तो क्या आपको तानाशाही में कहीं से भी मानवता की किरण नजर आती है कॉमरेड ? आती है तो मुझे बतायें कि कैसे ? और कहाँ आई ?
कॉमरेड भगत सिंह ने कहा था कि " हिंसा आखिरी रास्ता होना चाहिये, न कि पहला ।"

खाँटी कम्युनिस्ट क्या होते हैं ? और कैसे होते हैं ? मुझे नहीं पता । मैंने तो जिन कम्युनिस्टों को पढ़ा है पर उनमें कुछ खास नजर नहीं आया सिर्फ Ideological बातों के और आस पास जो देखें हैं उनके बारे में तो कुछ न कहूँ तो अच्छा है क्योंकि वो तो मुझ जैसे समझौतावादी से भी गये गुजरे हैं ।
एक बात पर और विरोध है आपसे कि आप धर्मों को इन सब में रोड़ा मानते हो । मैं भी मानता हूँ कि धर्म, मानव समाज को बाँटने और उनके मूल अधिकारों से वंचित रखने का ब्राह्मणवादी ताक़तों का एक तरीका है ।
आप उन धार्मिक आसमानी किताबों का भी विरोध करते हो पर आप ये खुद पर लागु क्यों नहीं करते ।
जैसा कि मार्क्स के विचारों ( #Communist_Manifesto ) को मानने वाले मार्क्सवादी कहलाये, और आज से 200 साल पहले लिखी उनकी किताब की बातों का आप रट्टा लगाये घूमते हो और बाकियों को आप जहर बताते हो । आप भी सोचिये कि 200 साल पहले की परिस्थितियों में लिखा गया दर्शन आज के समय में कितना असरकारक है ? क्या उसमें समय के साथ बदलाव की जरूरत नहीं है ? है तो आप कितने बदले ? और कितना बदलने को तैयार हो ? आपकी ये दलील कि लेनिन, स्टालिन, माओ आदि कम्युनिज्म के निखरे हुये रूप हैं, मैं नहीं मानता । ये सब अपने समय-काल, परिस्थिति आदि के हिसाब से बने बिगड़े हैं । इसलिये इनको कम्युनिज्म में बदलाव की बयार में शामिल करने जैसा कुतर्क न दें ।
हाँ, अंत में एक बात और कॉमरेड, आप बोलते हैं कि फलां विचार बुरा है और वो आपको बुरा बताते हैं । आप विरोधी विचारों को खत्म करने की वकालत करते हैं पर आप ये कैसे भूल जाते हो कि ये आपको जड़ता की तरफ ले जा रहा है और आप हैं कि ख़ुशी - ख़ुशी इसकी गिरफ्त में आये जा रहे है और इसपर गर्व भी करते हैं । कॉमरेड भगतसिंह ने कहा था " पुरानी धारणाओं को तोड़ दीजिये ।"
सवाल है कि आपने कितनी तोड़ी ?

नोट : यहाँ मैं ये नहीं कहता कि मैं ही सर्वज्ञाता हूँ या मेरी सोच ही सबसे सही है या मेरा रास्ता सबसे सटीक है । यदि मैं भी यही मानने लगा तो निश्चित ही मैं भी जड़ हूँ । मेरा यही मानना है कि व्यक्ति को जड़ न होकर प्रगतिशील होना चाहिये, सर्वश्रेष्ठ का भाव नहीं आना चाहिये और समय के साथ जरूरत के अनुसार विचारों में बदलाव आते रहने चाहिये जिससे कहीं भी जड़ता न आये । 

Sunday, 1 May 2016

ग़र वक़्त मिले तो

पहले पहल,
जब मैं देखता मजदूर को
सोचता,
क्यों करते हैं काम ?
वो भी करें आराम
हमारी तरह, आपकी तरह
फिर एक दिन ये बात समझ आई
कि
कैसे चलेगा काम
हमारा, आपका
जब बैठ जायेंगे ये हाथ
ये हैं तो हम हैं,
ये हैं तो खाना है, रहना है, सब आराम के सुख साधन हैं,
ग़र यही न होंगे
तो कैसी होगी ये दुनिया
आप भी सोचना कभी
ग़र वक्त मिले तो

फोटो सौजन्य : दैनिक जागरण


Wednesday, 13 April 2016

जलियाँवाला बाग के बलिदान की कीमत समझो

बैसाखी पर्व की सभी को हार्दिक शुभकामनायें । आपका आने वाला साल खुशियों भरा हो ।
आज से 97 साल पहले बैसाखी के दिन 13 अप्रैल 1919 को अमृतसर के जलियांवाला बाग में आज़ादी के दीवानों ने एक सभा रखी थी । सभा का उद्देश्य भारत प्रतिरक्षा कानून ( रॉलट एक्ट ) का विरोध कर इस काले कानून को हटाने का था । यह कानून आजादी के लिए चल रहे आंदोलन पर रोक लगाने के लिए लाया गया था, जिसके अंतर्गत ब्रिटिश सरकार को और अधिक अधिकार दिए गए थे जिससे वह प्रेस पर सेंसरशिप लगा सकती थी, नेताओं को बिना मुकदमें के जेल में रख सकती थी, लोगों को बिना वॉरण्ट के गिरफ़्तार कर सकती थी, उन पर विशेष ट्रिब्यूनलों और बंद कमरों में बिना जवाबदेही दिए हुए मुकदमा चला सकती थी, आदि । इसके विरोध में पूरा भारत उठ खड़ा हुआ और देश भर में लोग गिरफ्तारियां दे रहे थे।
 चूँकि इन प्रदर्शनों की वजह से पुरे शहर में कर्फ्यू लगा हुआ था पर 13 अप्रैल को बैसाखी का त्यौहार था इसलिये जलियाँवाला बाग के पास ही मेला लगा था । मेला देखने और शहर घूमने आए लोग भी  सभा की खबर सुन कर जलियाँवाला बाग में पहुंचने लगे । इस दौरान सभा में उम्मीद से बहुत ज्यादा लोग आ गये थे । सभा शुरू हुई और नेता बाग में पड़ी रोड़ियों के ढेर पर खड़े हो कर भाषण दे रहे थे, तभी ब्रिगेडियर जनरल ( रेजीनॉल्ड ) डायर 90 ब्रिटिश सैनिकों को लेकर वहां पहुँच गया। उन सब के हाथों में भरी हुई राइफलें थीं। नेताओं ने सैनिकों को देखा, तो उन्होंने वहां मौजूद लोगों से शांत बैठे रहने के लिए कहा । पर जनरल
डायर के आदेश पर सैनिकों ने बाग को घेर कर बिना कोई चेतावनी दिए निहत्थे लोगों पर गोलियाँ चलानी शुरु कर दीं। 10 मिनट में कुल 1650 राउंड गोलियां चलाई गईं । जलियांवाला बाग तक जाने या बाहर निकलने के लिए केवल एक संकरा रास्ता था और चारों ओर मकान थे। निकलने का कोई और रास्ता नहीं था। कुछ लोग जान बचाने के लिए मैदान में मौजूद एकमात्र कुएं में कूद गए, पर देखते ही देखते वह कुआं भी लाशों से पट गया । और बाकि लोग गोलियों से भून दिए गए । जलियांवाला बाग लाशों से भर गया । समय पर चिकित्सा सेवा नहीं मिलने से घायलों की भी जान नहीं बचाई जा सकी । लोगों ने तड़प-तड़प कर वहीं दम तोड़ दिया।
अकेले कुए से 120 शव निकाले गये । अमृतसर के डिप्टी कमिश्नर कार्यालय में 484 शहीदों की सूची है, जबकि जलियांवाला बाग में कुल 388 शहीदों की सूची है। ब्रिटिश राज के अभिलेख इस घटना में 200 लोगों के घायल होने और 379 लोगों के शहीद होने की बात स्वीकार करते है जिनमें से 337 पुरुष, 41 नाबालिग लड़के और एक 6-सप्ताह का बच्चा था । जबकि अमृतसर के तत्कालीन सिविल सर्जन डॉक्टर स्मिथ के अनुसार मरने वालों की संख्या 1800 से अधिक थी ।
ये भारतीय आज़ादी आंदोलन का वो ऐतिहासिक दिन था जिसके बाद भारतियों में आज़ादी की भावना आकार लेने लगी । इसी हत्याकांड से भगतसिंह, उधमसिंह जैसे वीरों के दिल में अंग्रेजी सत्ता के विरोध में ज्वाला भड़क उठी ।
जलियाँवाला बाग तो एक छोटा सा पड़ाव था आज़ादी प्राप्ति के दौरान, ऐसे और भी कई संघर्षो से हमें आज़ादी मिली । हमारे पुर्वजों ने अपनी जान देकर आज़ादी ली थी इसलिये इसे सहेजें, इस आज़ादी का मूल्य समझो । यूँ ही चंद धर्म, क्षेत्र, जाति और भाषा के ठेकेदारों के कहने से बंटो मत, एक हो जाओ । एकता में ही शक्ति है । उन छद्म लोगों से बचो जो "मुँह में विश्वगुरु भारत और बगल में साम्प्रदायिकता का छुरा" लिये घूमते हैं । ये लोग सत्ता के मोह में भारत का विरोध करने वालों के साथ मिलकर कश्मीर में सरक़ार बना लेते हैं पर बाकि भारत में जनता को उनके मुख्य मुद्दों जैसे गरीबी, पीने का पानी, भुखमरी, रहने, रोजगार, चिकित्सा, बिजली, प्राथमिक सुविधाएँ आदि से ध्यान भटकाने के लिये छद्म राष्ट्रवाद का सहारा लेते हैं क्योंकि उनको डर है कि कहीं कोई उनसे वो सवाल न पुछ ले जिनके नाम पर गला फाड़-फाड़ कर वोट माँगे थे । वो डरते हैं 15 लाख के वादे के सवाल से, 1 बदले 10 सिर लाने से, मामूली कुछ हजार के ऋण से आत्महत्या करने वाले किसान की विधवा के सवालों से, भ्रष्टाचार के सवाल से ।आज फिर केंद्र की सरक़ार रोलट एक्ट का प्रयोग कर रही है, असहनशीलता, असंवेदनशीलता, धार्मिक उन्माद की वजह से आपातकाल जैसे हालात हो गए हैं । इसलिये ऐसे ढोंगियों से बचो और अपने पुरखों के बलिदान को याद रखते हुये मजबूत देश और जागरूक नागरिक समाज के निर्माण में सहयोग दें ।
जय हिन्द ।

Monday, 11 April 2016

लातूर का फ़ितूर

लातूर ( महारष्ट्र ) में पानी के स्रोतो पर धारा 144 लगी है, 8 - 10 किसान रोजाना आत्महत्या कर लेते हैं, पूरा विदर्भ आपातकाल में जी रहा है, पीने को पानी महीने में एक बार मिल रहा है । उत्तर भारतियों की तरह बाथ टब में नहाने, कार वाश या लोन में पानी छिड़काने वाली हालत अब विदर्भ की नही रही । साफ साफ शब्दों में कहूँ तो महाराष्ट्र में अब जीने का अधिकार भी छीन सा गया है । हर तरफ लोग परेशान हैं पर आईपीएल को पानी मिल रहा है क्योंकि उनको खेलने का अधिकार है पर आपको जीने का नहीं ।
एक बड़े से राष्ट्र के अंदर एक छोटा सा महाराष्ट्र है और उसमें भी 10 - 15 छोटे मोटे लातूर - फतुर टाइप के जिले । तो अब ये असंवेदनशील भीड़ आपके इन छोटे मोटे पचड़ों में पड़े या आईपीएल, भारत माता जैसे बड़े और महत्वपूर्ण मुद्दों पर बहस करे जिसमें आम लोगों के हक़ आसानी से मारे जा सके ।

सवाल है मानव कल्याण का, जो अब उठता या हम उठाते नहीं दिख रहे ? तो क्या हम सब मर / सो गए हैं जो कुछ नहीं कर पा रहे ? नहीं हम जिंदा है और जागे हुये भी पर हम कहीं ओर उलझे हुये हैं । मानव कल्याण अब हमारा मुद्दा नहीं रहा । अब हमें किसी के जीने या मरने पर बात करने का वक्त नही रहा । एक दिन ये हमारे साथ भी होगा पर तब बाकि लोगों के पास भी ऐसे बेकार के मुद्दों के लिये वक्त नहीं रहेगा । तब हम उस भीड़ को कोसेंगे जो आज हमने तैयार की है, एक असंवेदनशील भीड़, लेकिन कोई फायदा नहीं होगा । हम अपने चारों तरफ नरमुंडों का ऐसा हुजूम इकट्ठा किये जा रहे हैं जिनमें इंसानी लक्षण न के बराबर हैं । जानवरों की तरह व्यवहार करने वाला इंसानी हुजूम, जिनमें समझ नाम की चीज बिल्कुल नहीं है ।

तो आप सोचिये जिंदा है कि परलोक गमन कर गये

Wednesday, 23 March 2016

" क्रांति की तलवार विचारों की सान पर तेज होती है " - भगत सिंह

भगतसिंह, सुखदेव और राजगुरु - ये 3 वो नाम हैं जिन्होंने भारतीयों को स्वतंत्रता के मायने समझाये । एक नये विचार ( शोषण का जिंदगी के अंतिम पल तक विरोध ) को जन्म देने वाले ये लोग अंग्रेजो को भारत से खदेड़ने वाले अग्रणी क्रांतिकारियों में शुमार किये जाते हैं । 
तर्क़ और विचार भगतसिंह की दो सबसे बड़ी खूबियाँ थी जो उन्हें बाकि के क्रांतिकारियों से अलग करती थी ।
भगतसिंह और उनके साथियों ने न सिर्फ अंग्रेजों का विरोध किया था साथ ही उन भारतीयों का भी, जिन्होंने भारतीयों का शोषण किया जैसे राजा, सामंत, अंग्रेजों के ऐशो - आराम पर पलने वाले भारतीय आदि, खुलकर विरोध किया । जब भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन को एक तार्किक और इंक़लाबी व्यक्तित्व की जरूरत थी तब भगतसिंह युवाओं के नायक बनकर उभरे । भगतसिंह ने ने कहा था कि " क्रांति की तलवार विचारों की सान पर तेज होती है " अर्थात् क्रांति तब तक व्यर्थ है जब तक कि उसमें विचार न हो । बिना विचार की क्रांति असंतुष्ट लोगों के शासन में आने सिवाय कुछ नहीं है ।
भगतसिंह एक एक ऐसा क्रांतिकारी था जो अपनी बातों को तर्क़ के साथ रखता था । और जब वो भारतीयों तक अपनी आवाज पहुँचाने में असमर्थ थे और भारतीयों के बीच में स्वतंत्रता के प्रति जागरूकता नहीं थी तब भारतीयों तक बात पहुँचाने के लिये भगतसिंह और उनके साथियों ने लाहोर के कोर्ट में बम फेंका और अपनी गिरफ्तारी देकर अंग्रेजी राजसत्ता के अख़बारों के जरिये तर्क़ से गुलाम भारतीयों के मन में क्रांति की ज्वाला भड़काते थे ।
साथ ही भगतसिंह का ये भी मानना था कि सत्ता परिवर्तन हमारा पहला उद्देश्य नहीं होना चाहिये । हमारा पहला उद्देश्य लोगों में जागरूकता फैलाना होना चाहिये क्योंकि जागरूक लोगों को ये समझ अच्छे से होती है कि कौन उनका हक़ मार रहा है और कौन उनको हक़ दे रहा है । एक जागरूक शिक्षित नागरिक, हजारों बुजदिलों साक्षरों से ज्यादा बेहतर है ।  अकेले साक्षर बनने से हालात नहीं बदलने वाले, शिक्षित बनो । हम भारतीयों को साक्षर ( Literate ) और शिक्षित ( Educated ) का फ़र्क़ समझना होगा ।  राजसत्ता चाहती है कि एक पढ़ा लिखा अर्थात् साक्षर नागरिक तैयार हो जो उसके सभी काम कर दे पर कोई सवाल न करें, मुखर न हो जबकि शिक्षा उसमें समझ और तर्क़ पैदा करती है, जिससे वो अपनी सरकार से सवाल करता है, अधिकार माँगता है, सरकारों को निरंकुश बनने से रोकता है ।
आज भगतसिंह जैसे क्रांतिकारियों की सबसे ज्यादा जरूरत है, जब देश फिर से उसी दौर से गुजर रहा है, जब सरकार और उसके कारिंदे संगठन आपको बोलने, खाने, पीने, रहने और कपड़े पहनने पर अंकुश लगाने की कोशिश कर रहें है तब हमें भागतसिंह याद आते हैं । भागतसिंह ने हमेशा " शोषण की खिलाफत " पर जोर दिया था । आज से 85 साल पहले भगतसिंह ने आज के समय के बारे में आगाह कर दिया था, बकौल " भारत से गोरे अंग्रेज चले जायेंगे तो काले अंग्रेजों ( भारतीय शोषक वर्ग ) का शासन आ जायेगा, पर हमें एक ऐसे भारत का निर्माण करना है जहाँ सभी सभी को उनके मूल अधिकार मिलें, सभी को समान अवसर मिले, सभी को अभिव्यक्ति, खाने, पीने, पहनने और बेबाकी से अपने विचार रखने की #आज़ादी हो ।" भगतसिंह का आज़ादी से आशय एक ऐसे समाज के निर्माण से था जहाँ गरीबी, भुखमरी, अंधविश्वास, शोषण, बेतरतीब पूँजीवाद की कोई जगह नहीं हो ।
शहीद दिवस पर भगतसिंह, सुखदेव और राजगुरु को सच्ची श्रद्धांजली यही होगी कि उनके सपनों का भारत बनाने का संकल्प लें और उनका सपना साकार करें ।
इंक़लाब जिंदाबाद ।

डॉ कलाम को श्रद्धांजलि

डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम (Avul Pakir Jainulabdeen Abdul Kalam ) का जन्म 15 October 1931 को तमिलनाडु के Rameswaram में हुआ । इन्होंने 1960 ...