Sunday, 23 August 2015

कटप्पा ने बाहुबली को क्यों मारा ?????

देश की सबसे बड़ी समस्या ( कटप्पा ने बाहुबली को क्यों मारा ??? ) को लेकर एक गहन वार्तालाप मोदी और बाहुबली के बीच ; जो हम आपको डिटेल में बता रहे हैं :
बाहुबली : नमस्कार सर,  कैसे हो ?
मोदी      : बस अच्छा हूँ, तुम्हारा ही इंतजार कर रहा था ।
B : सॉरी सर । थोडा लेट हो गया
M : अरे कोई नहीं, चलो आओ पहले फोटो खिंचवा लेते हैं

( फोटो के बाद सब जर्नलिस्ट्स बाहर चले जाते हैं )
M : अब एक सेल्फ़ी हो जाये
B : क्यों सर ? मीडिया ने ले तो ली फोटो
M : अरे तुम भोले हो, तभी तो बीच लड़ाई में लोगों को बचाने लग गये थे और वो तुम्हारा भाई आगे निकल गया था तुमसे । अब समझे कि नहीं ?
B : सर उसका सेल्फ़ी से क्या लेना देना ?
M : अरे भाई, मुझे भी तो ट्वीट करना है ना
B : ओह्ह्ह्ह, अब समझा । हाँ सर क्यों नहीं । सर एक तो आप जहाँ भी जाते हैं, सेल्फिआ जाते हैं
M : अरे तू नहीं समझेगा, युवाओं के देश में युवा बनके रहना पड़ता है
B : हाँ वो तो है सर
M : चल अब मुद्दे की बात पे आते हैं ? चल भाई, अब तू ही बता दे कि कटप्पा ने तुझे क्यों मारा ?
B : बता दूँगा पर ...
M : पर क्या बाहुबली ?
B :5 शर्त है सर
M : 5 शर्तें ??? 

B : हाँ सर 5
M : मंजूर हैं बोलो ?
B : पहली कि फ़िल्म रिलीज़ से पहले किसी को बताओगे नहीं
M : नहीं बताऊँगा
B : दूसरी ये कि आप मेरी फ़िल्म की तारीफ करोगे
M : ठीक है पर बाहर जाके मेरी भी तारीफ करनी होगी
B : ठीक है सर, और तीसरी शर्त ये कि वो 15 लाख कब दोगे ? ये बताओ
M : मैंने बोला न तू बहुत भोला है, दिल्ली चुनावों में अमित शाह ने बताया तो था कि ये चुनावी जुमला था । नहीं आएंगे, भूल जा और अगली शर्त बता
B : चौथी ये है कि आप मुझे 10 kg दाल दिलवा दीजिये कहीं से
M : तू भी न कैसी - कैसी शर्तें रखता है, चल दिया पर 10 से ज्यादा नहीं । इतना भी अडाणी से कह के एडजस्ट करवा रहा हूँ
B : धन्यवाद सर
M : हाँ ठीक है, ठीक है । अंतिम शर्त है बताओ जल्दी ?
B : सर आप तो PM हैं, आपके पास क्या नहीं है, आप जिसको चाहो अमीर बना सकते हो, चाहो तो किसी की भी जिंदगी बदल सकते हो, आप तो भाग्य विधाता हो । आप कितने दयावान हो इसका पता तो इससे चलता है कि जब आपकी गाड़ी के नीचे कुत्ता भी आ जाये तो आप 2 दिन तक सो नहीं पाते हैं । आप महान हो ।

M : बेटा ऐसा है, भाषणबाजी में तुम मेरे सामने कहीं नहीं टिकोगे, चाहे तेरी फ़िल्म 1000 करोड़ ही क्यों न कमाले । एक्टिंग में भी तेरे से 2 कदम आगे ही हूँ । पहेलियाँ मत बुझाओ, और अब शर्त क्या है, वो बोलो ?

B : 10 kg प्याज घर पहुँचा दो
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M : चल निकल यहाँ से, बड़ा आया बताने वाला । ( सिक्यूरिटी ... सिक्यूरिटी ... ) ये अंदर कैसे आया ।बाहर निकालो इसको । और हाँ, आइंदा शक्ल दिखा दी बोलने लायक नहीं छोड़ूँगा तुझे .... 10 kg प्याज दे दो । बाप का माल समझा है क्या ? सुतिया कहीं का


( और इस तरह देश की सबसे बड़ी समस्याओं में से एक समस्या का जायका प्याज ने बिगाड़ दिया । और समस्या का हल मिलते मिलते रह गया )

Wednesday, 19 August 2015

लोकतंत्र की बोली

पिछले 2 दिन की खबरें पढ़के बड़ा अजीब लग रहा है, जैसे हम लोकतंत्र में नहीं बल्कि तानाशाही में जी रहे हैं । जैसे पहली खबर है बिहार को चुनावों से पहले मिले पैकेज की
मेरे पापा जब मैं पढ़ने के लिये अपनी जयपुर में कोचिंग आता हूँ तब मेरे खर्चे के लिये अपनी मेहनत से कमाये पैसे मुझे देते हैं तो पूछते हैं कि कितने दूँ ?
मै बोलता हूँ 7 बहुत है,
पापा बोलते हैं वो कपड़े लेने थे न ?
8 दे दो, इसमें चल जायेगा
9 दे दूँ, फिर मत बोलना कि कम पड़ गये । चाहे तो हजार और ले ले और शर्म आ रही है तो बाद में बोल देना अकाउंट में डलवा दूँगा ।
( ये तो हुई एक नॉर्मल बातचीत जो एक स्टूडेंट बेटे और उसके पिता के बीच का वार्तालाप है )
और यही तरीका मोदी का था बिहार वालों के सामने ... 60 दूँ, 70 दूँ, 90 दूँ । बोलो कितना दूँ ? ऐसे लग रहा था कि कोई लोकतन्त्र की बोली लगा रहा हो और हमारी भोली-भाली जनता ऐसे खुश हो रही जैसे वो अपनी जेब से दे रहा हो । बेवकूफों, ये हमारे टैक्स के पैसे से हमको भिखारी साबित करने पे तुला है । अरे PM है तो देश का काम सम्भालने के लिये है, हमें भिखारी बनाने के लिए नहीं है । वो हमारा पैसा था, जो हम पर ही खर्च होना है, तो इसमें इतने अहसान वाले तरीके से क्यों पूछ रहा है वो ।
एक बात और कहना चाहूँगा कि ये पैकेज अभी 
मिल जाये तब तो ठीक है फिर तो तभी मिलेगा जब बीजेपी जीतेगी वरना हार गए तो अमित शाह जी बोलेंगे कि " कालाधन की तरह ये भी एक चुनावी जुमला मात्र था ।"


दूसरी खबर भी इन्हीं महोदय से जुड़ी है, जो है विदेशों में जाकर ये बोलना कि पिछली सरकारों ने हमारे लिये विरासत में खड्डे छोड़े हैं जो मैं भर रहा हूँ ।
जब पिछली सरकारों ने गड्ढे ही छोड़े थे तो ये देश विश्व की टॉप 10 अर्थव्यवस्था वाले देशों में कैसे शुमार हो गया ? चाँद पर जाने वाले चन्द देशों में कैसे आया ? 1971 में परमाणु शक्ति सम्पन्न देशों में कैसे शामिल हुआ ? विश्व की बड़ी GDP वाले देशों में कैसे शामिल हुआ ?
प्रिय मोदीजी, ये सब आपके दिए लच्छेदार भाषणों से हासिल नहीं हुआ है । ये विदेशों में जाकर अपने देश की बेइज्जती करना बन्द करो । घर का मामला घर में सुलझाना ही उसके मालिक का फर्ज होता है जिसमें आप बुरी तरह से नाकाम तो रहे ही हो, उल्टा इसका प्रचार प्रसार भी कर रहे हो ।
तीसरी खबर थी जंतर मंतर पर 60 दिन से शांतिपूर्ण  प्रदर्शन कर रहे पूर्व सैनिकों पर लाठीचार्ज की, बजाय समस्या को हल करने के उल्टा बढ़ा रहे है । पिछली यूपीए सरकार ने वन रैंक, वन पेंशन के लिये 1000 करोड़ रूपये आवंटित कर दिये थे तो अब इसे लागू करने के लिये इतनी आना कानी क्यों ? और लाठीचार्ज क्यों ? वो भी उन लोगों पर जिसने आपके लिये अपनी सारी जवानी सीमा पर निकाल दी । दिल्ली में एक पूर्व सैनिक ने आपके बारे में जो कहा, वो लिख रहा हूँ " जब विपक्ष में थे तब बोलते थे कि PM करना नहीं चाहता, कमजोर है । मैं बनते ही लागू करूँगा । भाई .... ऐसा है तो ज्ञान मत दो, फेंको मत । बोलो कि नहीं सम्भल रहा, और वक़्त लगेगा "
चौथी खबर है इलाहबाद हाइकोर्ट का वो फैसला, जिसमें कहा गया है कि नेता, नोकरशाह और न्यायधीश अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों में पढ़ायें ।
सम्मानित न्यायालय का देर से सही पर ऐतिहासिक फैसला, जो तत्काल प्रभाव से पुरे देश में समान रूप से लागु हो । सरकारी स्कूलों की व्यवस्था सँभालने वाले नेता और नोकरशाहों के बेटे जब यहाँ पढ़ेंगे तो वे अपने आप इस व्यवस्था को बदलेंगे । और न बदलें तो इसको आगे भोगेंगे । मैं शुरू से लेकर 12वीं तक ( 3 साल छोड़कर, पास कोई स्कूल न होने से ) सरकारी स्कूल में पढ़ा हूँ और मेरी छोटी बहन 9वीं में है और आजतक सरकारी में ही पढ़ रही है । क्यों ? क्योंकि मेरे पापा खुद शिक्षा विभाग में अफसर थे तो वो हमेशा ही यही कहते थे कि प्राइवेट स्कूलों में शिक्षक वो बनते हैं जो सरकारी नोकरी के लायक नहीं होते । जो एक सच्चाई भी है ।
पहली 3 झलकियाँ तो हुई आत्ममुग्धता और तानाशाही पूर्ण रवैये की, अब चौथी थी एक नई शुरुआत की और अंतिम खबर है दिल्ली में बिजली कम्पनियों द्वारा किये जा रहे ₹8000 करोड़ के घोटाले की, जिनके मालिक हैं अम्बानी और टाटा जैसे घराने ।
कुछ साल पहले एक आदमी ने इस घोटाले के खिलाफ आवाज उठाई थी और बोला था ये घोटाला पकड़ में जाये तो बिजली के बिल आधे हो सकते हैं । शीला दिक्सित और ये कंपनियां मिलकर दिल्ली वालों को लूट रही हैं । पर तब हर किसी ने उसको बेवकूफ कहा था क्योंकि हमारी बेवकूफ जनता को एक आम आदमी से ज्यादा अम्बानी, टाटा की झूठी बैलेंस शीट पर ज्यादा भरोसा था ।
ये बंदा आज दिल्ली का CM है, जिसने इस देश की राजनीति को कई मायनों में बदला है । आप उनसे कई मुद्दों पर असहमत हो सकते हो पर उन्होंने जनता को नेताओं से सवाल करना सिखाया है । उनके किये वादे याद करवाना सिखाया है । जी हाँ, मैं बात कर रहा हूँ अरविन्द केजरीवाल की । जो बात करता है नेताओं के हाथ में पॉवर के विकेंद्रीकरण की, जनता के राज यानि स्वराज की ।
मैं यहाँ किसी पार्टी की तरफदारी नहीं करने के लिये नहीं लिख रहा हूँ, अब बात मुद्दों की हो, जनता को अधिकार मिले, जनता को भिखारी न समझें, जनता की समस्या पर बोलने वालों को चुनों । आपकी पार्टी जनता के मुद्दों पर नहीं बोलती तो उसे बोलना सिखाओ ,,, पर देश की राजनीति के तौर तरीके बदलो ।

Wednesday, 12 August 2015

मैं नास्तिक क्यों ?

( मेरे बहुत से मित्र पूछते हैं कि भाई तू नास्तिक क्यों है ? फिर अभी कुछ दिन पहले वृन्दावन में बालेन्दु स्वामी जी द्वारा आयोजित देहदान के एक कार्यक्रम में गया था, वहाँ सभी लोग नास्तिक ही आये थे, तो सबका सबसे एक ही सवाल था " सर, आप नास्तिक कैसे बने ? " और वहाँ एक दिन पहले " मैं नास्तिक क्यों ? " विषय पर चर्चा थी, तब मैं वहाँ झिझक और शर्मीले स्वभाव की वजह से बोल नहीं पाया था, तो सोचा सबके जवाब आज यहाँ लिख दूँ )

मैं नास्तिक क्यों ? इससे पहले एक सवाल और है जो मैं करना चाहूँगा खुद से और आप लोगों से, " मैं/हम  आस्तिक क्यों ? " शायद इसका जवाब सभी के पास है, वो है क्योंकि हम उस धर्म को मानने वाले माता-पिता या पालनहार की सन्तान हैं । पर क्या आप माँ के पेट से ईश्वर, अल्लाह या जीसस के मंत्र जपते हुये पैदा हुये थे ? या pk की भाषा में कोई धार्मिक ठप्पा लेके पैदा हुये थे ? आपने पहली बार मन्दिर, मस्जिद, गुरूद्वारे या गिरजाघर को देखते ही वहाँ उस धर्म की प्रार्थना शुरू कर दी थी ?
यदि आपके सभी जवाब "नहीं" में है तो फिर आप आस्तिक कैसे हुये ? आप तो जन्मजात नास्तिक हुये । पहले तो हमें ये सोच बदलनी होगी कि हम जन्मजात आस्तिक होते हैं क्योंकि इंसान पैदा ही  नास्तिक होता है फिर उसे आस्तिक बनाया जाता है ।

ये बात तो हुई किसी के अज्ञानतावश धर्म धारण करने की; जिसमें इंसानी बच्चे की समझ इतनी विकसित नहीं हो पाती कि वो इसपर कुछ सवाल कर सके । इसलिये वो अपने चारों तरफ के वातावरण को देखके यही सीखता है कि धर्म तो होना ही चाहिए, जहाँ उनके बनाये कुछ भगवान हों, जिनकी प्रार्थना करके उनको खुश करना पड़ता है ।

इस दूनिया में 2 तरह के लोग होते हैं, पहले जो  नास्तिक से आस्तिक बन जाते और अपने धर्म के प्रति निष्ठा रखते हैं, हर बुरी बात का हर हालत में समर्थन करते हैं और ये मानते हैं कि एक शक्ति है, जो ये सृष्टी चला रही है और हम सब उसके बनाये मोहरे हैं । और उसको न मानने वाले उस धर्म के दुश्मन हैं । और दूसरे होते हैं वो जो नास्तिक से आस्तिक बन तो जाते हैं पर अपनी सभी इन्द्रियों को खुली रखते हैं, वो धर्म से सवाल करते है, तर्क करते है, व्यावहारिकता की कसौटी पर जाँचते हैं, यथार्थवादी होते हैं । इसलिये ये जल्द ही उस धर्म के दुश्मन घोषित कर दिये जाते हैं । और इस तरह वो फिर से अपने मूल यानि कि नास्तिकता की और अग्रसर होते हैं ।

यहाँ नास्तिकता का मतलब उस ईश्वरीय शक्ति का विरोध करना ही नहीं है, नास्तिकता का मतलब है सदैव खोज में रहना, निरन्तर चिंतन और नये विचार । जबसे आपने खोज, चिंतन और विचार करना छोड़ दिया तबसे आप पूर्ण रूप से नास्तिक भी नहीं रहे ।

मैं नास्तिक क्यों बना इसके पीछे मेरे जीवन में घटी कुछ घटनाओं का भी हाथ रहा है, जो मैं आगे विस्तार से लिखूँगा पर मेरी कुछ शर्तें थी अपनी जिंदगी जीनें की, जिनमें धर्म किसी भी साँचे में फिट नहीं बैठा । मैं  कर्म और समय को सत्य मानता हूँ ।  तर्क में विश्वास  करता हूँ पर धर्म तो तर्क के शुरू होते ही खत्म हो जाता है ।   मैं चाहता हूँ कि पंक्ति के अंतिम बन्दे को उसके अधिकार मिले जो धर्म नहीं दिला सकता है । साथ ही  लालच और डर नहीं है तो आस्तिक होने का सवाल ही नहीं होता । लेकिन नास्तिक का मतलब ये भी नही कि आप धर्म को नकार के अपना एक अलग धर्म बना लो, मेरे हिसाब से नास्तिकता का मतलब है निरन्तर चिंतन, नये विचार और जीव मात्र की बिना लालच के सेवा । इसलिये नास्तिक बोल सकते हैं आप मुझे

Friday, 17 July 2015

स्कूल चलें हम

" स्कूल चलें हम " सर्व शिक्षा अभियान की ये टैग लाइन देखी तो मुझे अपने स्कूल दिनों की याद आ गयी, जब मैंने पहली बार अपने फुँफेरे भाई गणेश के साथ स्कूल में पहली कक्षा में पैर धरा, नाम लिखवाया गया, और वही दिन हमारा जन्मदिन बन गया, क्योंकि मास्टर जन्मदिन पूछते तो गाँववाले बोल देते लिख दो आप अपने हिसाब से और इस तरह मास्टर जी तय करते कि हम इस दुनिया में कब आये, कभी 2 साल बाद और कभी पहले की उम्र लिखी जाती पर जन्मदिन देखके आज भी पता चल जाता है है कि हमने एडमिशन किस तारीख को लिया था ।
शुरू में तो बड़ा शौक था स्कूल जाने का, पर बाद में दिनों दिन घटता गया और महीने भर बाद तो स्कूल जेल जैसी लगनी लग गयी । फिर तो घरवाले छोड़के आते लेकिन हम आधी छुट्टी में कंटीली बाड़ कुदके निकल लेते गाँव के मैदान पर क्रिकेट खेलने को, वहाँ हमें बैटिंग और बॉलिंग तो कोई करने नहीं देता था, बस फील्डिंग करते थे । बड़ी उम्र के लड़के हमें सिर्फ इधर से उधर दौड़ाते थे और हम उसमें भी खुश होते । जब पैसों का मैच होता था तो हमें खाने को चॉकलेट मिल जाया करती थी । फिर जब ये शिकायत घर पहुँची कि हम भाग जाते हैं तो चाची ने बहुत मारा तो हमने भी स्कूल जाने से मना कर दिया । लेकिन घरवाले मारपीट के निकाल देते तो हम गाँव से बाहर चले जाते थे पर स्कूल नहीं । एक दिन वहाँ दादाजी ने देख लिया । फिर तो पिटाई का  क्या कहना ? अगले दिन घरवाले साथ गये पर बीच में ही भाग गए तो हाथ पैर पकड़के घसीटते हुये कुछ इस तरह से ले गए कि जैसे कसाई बकरे को ले जाता है ।
( नीचे दी गयी फोटो की तरह )



हमारी गाँव की सरकारी स्कूल, जो तब तक 5 वीं क्लास तक ही थी, में 2 मास्टर थे, एक हमारे गाँव के ही, रिश्ते में दादाजी, और दूसरे पास के गाँव थेथलिया के थे पूरण जी, बाय कास्ट मेघवाल थे फिर भी अन्य गाँवों के उलट गाँव वालों की श्रद्धा हमारे दादाजी के बजाय उनमें ज्यादा थी । हम उन्हें गुरजी कह के बुलाते थे । जब उनको गाँव वालों ने शिकायत की कि बच्चे चाय पीते हैं, बुरी आदत है, छुड़ाइये । तो अगले दिन सुबह प्राथना में गुरजी ने 2 दिन की मोहलत दी चाय छोड़ने की फिर पिटाई की धमकी के साथ डेडलाइन स्टार्ट । 2 दिन बाद फिर प्रार्थना में मिले तो कहा कि कल से जो भी उन्हें किसी के चाय पीने की सुचना देगा, उसे एक चॉकलेट मिलेगी । अब सब लालच में एक दूसरे की शिकायत करते, और कइयों के तो घरवाले ही गुरजी को बोल देते फिर जिनकी शिकायत मिलती उनको अलग छाँट के एक लड़के को वहाँ लगे नीम पर चढ़ाते और हरी लकड़ी से सबको प्रसाद मिलता और इस तरह एक हफ्ते में पुरे गाँव के बच्चों ने चाय छोड़ दी । इसके बाद हर लड़के को महीने में एक दिन गुरजी के लिये चाय बनाने को दूध लाने का फरमान सुनाया गया, और साथ ही एक बार काकड़ी और तरबूज भी लायेगा ।
ये तो हुई हमारे उद्धम की बातें पर उस टाइम सबसे अच्छी बात ये थी कि आज की तरह बड़ा स्कूल बैग नहीं ले जाना पड़ता था, सिर्फ एक पट्टी ले जाते और लिखने को चुने की चौक, जो हम रोजाना खा जाते थे । स्वाद ही इतना अच्छा लगता था कि कई बार तो दूसरों तक की खा जाते थे । हाँ, घर पर इस बाबत रोजाना पिटाई होती पर वो एक नशे की तरह था, जिसके सामने पिटाई कुछ नहीं थी । इसके अलावा पेन्सिल, रबर, स्याही वाला पेन, कॉपी - किताब के दर्शन तो 3rd क्लास में हुये जो आजकल LKG - UKG में ही बच्चों को मिल जाते हैं । कॉपी - किताब मिले बैग की जरूरत पड़ी जो घरवाले खुद घर पे ही कपड़े का बना देते थे, और कपड़ा होता था पापा, चाचा या दादा की पुरानी फ़टी हुई पैंट का । जिसको हम बड़े चाव से ले के जाते थे ।
इसके अलावा हमारे समय दूसरी अच्छी बात ये थी कि जब बच्चा ढंग से बोलने और समझने लग जाता तब घरवाले स्कूल भेजते थे मतलब जब हम अपना बचपन मजे से जी लेते थे यानि कि 6 से 8 साल के बीच की उम्र । मैं 6 साल साल की उम्र में स्कूल गया था तो लोगों ने कहा था कि अभी इतनी भी जल्दी क्या है ? साल भर और खेलने दो, फिर बाकि जिंदगी स्कूल, कॉलेज, घर - परिवार में ही तो बितनी है ।
लेकिन आज तो बच्चा ढंग से बोलना और चलना ही प्ले स्कूल में सीखता है । और फिर उस बेजान की पीठ पर  5 - 7 किलो वजन लाद के आर्मी के जवान की तरह टाई - बेल्ट और जूतों से लैस करके जिंदगी की लड़ाई जीतने को भेज दिया जाता है । पैसे और कैरियर के नाम पर बचपन की हत्या कर दी जाती है ।
ड्रेस के नाम पर हमारे पास थी सिर्फ एक नीला शर्ट,  खाकी निकर और चप्पल । शर्ट के तो महीने भर में ही बटन टूट जाते थे और खेलने से निकर का पिछवाङा फट जाता था, जिसमें से अंदर का सबकुछ साफ दिखाई देता था । फिर जब घरवालों को खेत से आराम मिलता तो उसकी सिलाई होती थी, स्कूल के निकर पे जो कारी लगाई जाती वो खाकी रंग की ही लगाई जाती थी वरना बाकि निकरों पर तो रंग - बिरंगी लगती थी, जिससे कई बार तो निकर के असली रंग को बता पाना मुश्किल हो जाता था। और इस काम की भी गाँव की कुछ एक्सपर्ट औरतें थी, जिनकी डिमांड ज्यादा रहती थी वरना घर का जुगाड़ तो था ही ।
2 - 3 जोड़ी चप्पलों की गुम होने के बाद घरवालों ने वो भी छुड़ा दी । 12 बजे, जब छुट्टी के बाद घर जाना होता तो बालू ( रेगिस्तानी इलाके में बालू रेत बहुत गर्म हो जाती है, लगभग 40℃ से 45℃ ) तपने लगती तो स्कूल के बाहर पड़े गोबर में या बाहर लगे हैंडपंप के कीचड़ में पैर भर लेते और फिर लगाते एक साँस दौड़ जो घर जाके ही खत्म होती । इसमें भी एक मोहल्ले वाले लड़कों में कॉम्पिटिशन होता, जिसमें धर्मेन्द्र ज्यादातर जीतता था । चाहे आपको ये अजीब लगे पर इसमें मजा आता था और आजकल की ऑटो पद्धति ( जिसमें बच्चों को ऑटो में ऐसे भरा जाता है जैसे कसाई बकरों को भरते हैं ) से कई गुना बेहतर और अच्छा था ।
बाकि यादें कभी और ....

Tuesday, 7 July 2015

बड्डे बॉय

आज 7 जुलाई है, यानि मेरा जन्मदिन । डूड वाली भाषा में हैप्पी बड्डे पर बिना केक वाला । केक, गुब्बारे, पटाखे, पार्टी, नाच-गाना; इनका तमाशा मुझे कभी भी नहीं सुहाया । शायद मेरे ग्रामीण परिवेश की वजह से क्योंकि वहाँ जन्मदिन याद रखना बड़ी टेढ़ी खीर है । जब मैं 8वीं में था तब बोर्ड के फॉर्म भरने के लिये मैंने दादी से पूछा तो कुछ यूँ बताया था " तू 47 की साल मं आषाढ़ लागत की दशम न जलम्यो हो, धोळी दोपहर मांय " 


दोपहरां ?
हाँ, एकदम धोळी दोपहर न
मन्ने अ थारला षाढ़-सावण समझ कोनी आवे, टेम इयाद ह के ?
बही मायं लिखेड़ो ह, थारलो अंग्रेजी टेम भी लिखेड़ो है
और बही में देखा तब पता चला कि 7 जुलाई 1991 को जन्मे थे, दोपहर 12 बज 5 मिनट पर, रविवार को । मैंने ख़ुशी ख़ुशी में चाचाजी को बताया कि देखो मैं रविवार को जन्मा हूँ ।
तो बोले " यार गलत लिख दिया होगा किसी ने, रविवार को तो कोई जन्मता ही नहीं है "
क्यों ???
" क्योंकि उस दिन तो छुट्टी रहती है " और मैं सच में बेवकूफ बन गया । फिर पापा ने बताया कि वो बेवकूफ बना रहे थे ।
और भी कई यादें हैं पर वो कभी और पर आज की बताता हूँ लगभग 200 फेसबुक मित्रों ने बड्डे विश किया था,  सबको जवाब देना जरूरी था तो शॉर्टकट में " धन्यवाद भाई साहब " को पेस्ट कर दिया जिसमें कई महिला मित्र भी शामिल थी फिर सॉरी लिखना पड़ा सो अलग से

Friday, 3 July 2015

संघीय ( RSS ) व्यवस्था by Manish Dubey

संघीय व्यवस्था में जाना कि हर भगवा पुरुष का पूरा जीवन हीनभावना में गुज़रता है, वो हर पढ़े-लिखे व्यक्ति को वामपंथी कहता है और उसे ऊपर से गाली देता है परंतु भीतर से admire करता है और उनके जैसा बनना चाहता है।
वह अपनी राजनैतिक विवश्ताओं के कारण कुतर्की व्यवहार त्याग नहीं सकता और अपनेआप को विरोधाभास के जंजाल में फंसा पाता है, इन्हीं कारणों से उसका जीवन दूसरों को भी अंधविश्वासी बनाने में लग जाता है क्योंकि अपनेआप को वैचारिक धरातल पर अकेले पाने से उसे ग्लानि होती है, वहीँ अधिक से अधिक लोगों को अपने जैसी अर्धनिन्द्रा की स्थिति में देख उसे कुछ राहत मिलती है।
गंभीर बात यह है कि यही लोग शिक्षण संस्थानों ( शिशु मन्दिर ) में घुस कर अगली पीढ़ी को भी अँधा बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ते, इस प्रकार राष्ट्रविरोधी कार्य करते हुए भी वो स्वयं को राष्ट्रवादी कहलाते हैं।

Tuesday, 23 June 2015

दिवसों की उलझन

अभी दो दिन पहले की बात है मने 21 जून की, साल के सबसे बड़े दिन और #Father'sDay और  #YogaDay की, मैं फेसबुक चला रहा था लोग स्टेटस कम और फोटो ज्यादा लगा रहे थे, कोई खुद को योगी बता रहा था तो कोई खुद को पापा का बेटा पर सबमें एक अजीब सी होड़ थी, आगे निकलने की, खुद को अच्छा साबित करने की, खुद को स्वास्थ्य के प्रति सचेत साबित करने की, खुद के अच्छा बेटा होने की । पर इस सब जो पीछे छूट गया था वो था इंसान और उसकी इंसानियत ।
ये पूरा दिखावा वो लोग ज्यादा करते हैं जिन्होंने कभी ऐसा किया न हो । हर कोई किसी दिन विशेष पर उस तरह का होने का टैग लगाना चाहते हैं वो भी सिर्फ उसी दिन के लिये जबकि उस दिन बाद उस बात से कोई मतलब नहीं । योग दिवस पर सभी योगी बनने पर तुले थे, जैसे आज योग कर लिया तो आने वाली 7 पीढ़ियाँ बिना कुछ किये ही स्वस्थ रहेगी । अपने PM मोदी जी भी इस योग को लेकर ऐसे मैदान में कूदे कि लगा हिंदुस्तान की अवाम पहली बार योग करेगी । पूरी सरकारी मशीनरी और आरएसएस, बीजेपी और इसके सहयोगी सङ्गठनों को लगा दिया इसे सफल बनाने को ।  ₹130 करोड़ रुपये तो इसके प्रचार प्रसार में ही फूँक डाले बाकि उस दिन जहाँ भी योग शिविर लगा वहाँ कम से कम  ₹1000 का खर्चा भी माने तो देश भर में 1 लाख शिविरों का खर्चा  ₹100,000,000 बैठता है और ये और प्रचार का पैसा मिला के भारत सरकार के महिला एवं बाल विकास के विभाग के बजट के बराबर है । अब इसका सारांश तब निकलता जब ये सब आगे भी जारी रहे वरना एकदिवसीय योग से सिवाय प्रचार माध्यमों ( जैसे इलेक्ट्रॉनिक और प्रिंट मीडिया,बैनर और होर्डिंग आदि ) के अलावा किसी को फायदा पहुँचा हो, मुझे तो नहीं लगता ।
इसके बाद बात करते हैं फादर्स डे की, सब लोग आज अपने बाप की तस्वीरें लगा के खुद को सबसे संस्कारी बेटा बतलाने में लगे हैं । सभी आज अपने बाप को भगवान का दर्जा दे रहे हैं जिन्होंने बाप को कभी पानी न पकड़ाया हो, उनकी कोई बात न मानी हो, कभी उनका कहा न किया हो पर क्या करें आज तो फादर्स डे है इसलिये इनका गुणगान तो करना ही पड़ेगा । क्यों भाई, मैं अपने पापा से बहुत प्यार करता हूँ और उनकी इज्जत भी और मुझे आजतक ऐसा नहीं लगा कि आज फादर्स डे है इसलिये मुझे पापा पर ज्यादा प्यार आ रहा है या मदर्स डे है इसलिए माँ पर ज्यादा प्यार आ रहा हो । हाँ इनको याद करने के लिये साल का दिन इनको डोनेट कर दिया पर बाकि के 364 दिनों का क्या ? सच बताऊँ तो आज तक मैं पापा से गले नहीं मिला हूँ, चाहता तो बहुत हूँ पर डर लगता है कि वो क्या कहेंगे ? मन चाहता है कि जितनी देर उनके साथ रहूँ तब तक वो सर पे प्यार भरे हाथ फेरते रहें पर कह नहीं सकता । हाँ मुझे उनको अपना प्यार जताने के लिये कभी जरूरत नहीं पड़ी लेकिन मेरी आदत ही ऐसी है कि मेरा फादर्स डे पुरे साल चलता रहता है और न ही उन्होंने ने ऐसा डे टाइप में प्यार जताया हो पर सर्दियों जब कभी मुझे जुकाम या खाँसी हो जाती है और उनसे फोन पर बात करते हुये ही वो मेरी आवाज से ही पहचान लेते हैं कि मैं बीमार हूँ और वो कहते हैं कल डॉक्टर से दवाई लेके घर आ जाओ, यही उनके प्यार जताने का तरीका है । इसके अलावा पहले जब मैं छोटा था तब पापा शाम को ऑफिस से घर आते थे तो मुझे सर दबाने का बोलते थे लेकिन तब बहुत जोर आता था, गुस्सा आता था पर आज जब मैं और पापा दो अलग शहरों में रहते हैं तब बहुत याद आते हैं वो । मैं जब उनके पास होता हूँ तो जैसे ही वो ड्यूटी से घर आते हैं वो फ्रेश हो के सो जाते हैं और मैं भी उनका थोडा साथ पाने के लिये पास में उनका सर और हाथ पैर दबाने बैठ जाता हूँ, कई कईबार तो 1 से डेढ़ घण्टे तक न मैं हटता हूँ ना ही वो मना करते हैं, शायद वो भी मेरे पास रहना चाहते हैं इस बहाने पर अब कभी उनकी सेवा करने से मुझे थकान नहीं आती और न ही गुस्सा । ये सिर्फ मेरी ही नहीं बहुत से लोगों की कहानी है और ये फादर्स डे वही लोग सबसे ज्यादा मनाते हैं जिनको माँ - बाप बोझ लगते हैं और उन्हें ओल्ड ऐज होम में रखते हैं, पर क्या करें आजकल हम हो ही ऐसे गए हैं कि बजाय अच्छी बातों को जिंदगी में उतारे उनको प्रतीक बना देते हैं और उनको कैलेंडर में बैठा के एक दिवसीय गुणगान करके इतिश्री कर लेते हैं ।
यही हक़ीक़त है इन डे'ज की । एक दिन सोशल साइट्स पर इनको याद करो और बाकि दिन इनको परेशान करो । जैसे 23 मार्च को ही ले लो, भगतसिंह, राजगुरु और सुखदेव का शहीदी दिवस, सब लोग 5 दिन पहले ही अपनी प्रोफाइल पिक में भगतसिंह की फ़ोटो लगा देते हैं पर  पुरे साल बातें करते हैं जाति - धर्म की, गरीबों का हक मार के पैसे कमाने की । इसके अलावा 15 अगस्त / 26 जनवरी को ले लो, खुद का कचरा डस्टबीन में डाला नहीं जाता और बातें तो करते हैं विश्व शक्ति बनने की और तो और पुरे दिन इनसे करप्सन पर भाषण झड़वा लो पर करप्सन को खत्म करने के लिए आपने क्या किया ? ये पूछते ही इनकी जान निकल जाती है, बोलते हैं हम क्यों मिटायें, ये तो सरकार का काम है ।

डे'ज मनाना इसलिये शुरू किया था कि एक दिन ऐसा हो जब आप किसी को याद करें और उनके दिखाये पथ के लिये खुद को समर्पित करें न कि अख़बारों और चैनलों पर अपने फ़ोटो से व्यक्तिगत प्रचार करें या कटआउट से चौराहों का स्वरूप बिगाड़े । बाकि तो आज तक हमसे बड़े ज्ञानी लोगों से न समझे तो हमसे क्या खाक समझोगे ?

डॉ कलाम को श्रद्धांजलि

डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम (Avul Pakir Jainulabdeen Abdul Kalam ) का जन्म 15 October 1931 को तमिलनाडु के Rameswaram में हुआ । इन्होंने 1960 ...