Wednesday, 28 October 2015

Global United Panchayat

GUP यानि कि Global United Panchayat.  GUP ( गप्प ) का एक दूसरा मतलब भी है राजस्थानी में बातें करना अर्थात सभी साथियों से दूनिया को एक गाँव मानते हुये विभिन्न मुद्दों पर चर्चा करना । GUP एक ऐसा ग्रुप है जो सारी दूनिया को एक गाँव मानता है और देशों को वार्ड, मोहल्ला इत्यादि, यह पन्चायत मानव व प्रकृति हितैषी चिन्तन रखते हुए कार्य करेगी । किसी भी काम करने के 2 तरीके होते हैं, पहला Part to Whole और दूसरा Whole to Part. इसमें पहला तरीका कर्म का तो दूसरा चिंतन का है और GUP दोनों को कार्य करेगा । हमारा मानना है कि आज के युग में हम इतने करीब आ चुके हैं कि सेकंडों में पूरी दूनिया के लोगों से सम्पर्क स्थापित कर सकते हैं इसलिये सभी के व्यूज एक साथ एक ही स्थान पर जानने के लिये GUP नामक एक मंच बनाया गया । आज सभी देश एक दूसरे पर निर्भर हैं, कुछ मामलों में ज्यादा तो कुछ में कम पर निर्भर हैं । इसलिये एक देश दूसरे देश से प्रभावित होता है फिर चाहे वो आर्थिक रूप से हो या सामाजिक रूप से या सांस्कृतिक रूप से या किसी और रूप में । इसलिए सभी मुद्दों को सभी से डिस्कस करने का रिटायर्ड इंजीनियर श्री हनुमान राम चौधरी द्वारा एक मंच तैयार किया गया, जिसे उन्होंने ने GUP नाम दिया ।


ग्लोबल युनाईटेड पन्चायत का दिनान्क 13 अक्तूबर 2015 से जोधपुर मे कार्यालय स्थापित किया गया है, जैसा कि आप को पूर्व मे अवगत कराया जा चुका है कि इसका ढान्चा 1000 व्यक्तियो से एक पन्चायत के रूप मे होगा । यह व्यक्ति विश्व भर से कही से ही हो सकते है। उक्त 1000 व्यक्ति एक गान्व घोषित करेगे फिलहाल प्रथम गान्व ग्रास यानि घास नाम से घोषित हो चुका है जिसका रजिस्ट्रेशन ओन लाईन चालू है जिसमे आप 9414346435 पर निम्नाकित सूचना मैसेज कर सकते है *****नाम/एस टी डी कोड/लोकसभा क्षेत्र





Saturday, 24 October 2015

गेलसप्पां री टोळी

एक बार #केसर_ताई का छोरा जिद करण लाग्या कि
मन्ने गलसप्पो आदमी देखणो है, नीं मं रोटी कोनी खाऊँ ।

ताई - तेरे बाप न देखले, बिसुं बड्डो गेलसप्पो कोई कोनी

छोरा - बां न तो रोजीना देखूं, कोई और देखणो है

ताई - तो तेरे राजू काके न देखले

छोरा - आ तो वाही बात हूगी, अ तो छोटा - मोटा हीं, कोई ढंग को देखणो है

ताई - तो राहुल गाँधी न देखले

छोरा - ना, मन्ने घणे सारे बेवकूफ देखणे है

अब ताई सोची इते सारे गधे एकसाथ कहाँ से दिखाऊ छोरे न ?
तो ताई ने दिमाग भिड़ाया अर् बोली " चाल र छोरा, दिखाऊ तन्ने #गेलसप्पां_री_टोळी
" अर् छोरा हो लिया ताई क साथ, एक खुलो मैदान मं लेगी ।

उड़े लोगां न देख अर् छोरा बोल्या - माँ, अ हाथ में लाठी क्यों ले राखी है ? डांगर चराने वाले हैं के ?

ताई - ना बेटा, अ तो खुद डांगर हीं, अ के चरावंगा डंगरां न

छोरा - तो अ स एक ड्रेस मायं कियां ?

ताई - सब एक सा हीं न, आ अण सबकी स्कूल ह

छोरा - पर आ सबकी निकर तो म्हारी स्कूल की तरहां ह पण ऊपर चोळीयो धौळो क्यों ?

ताई - क्योंकि अ बेवकूफ हीं न

( अब तो आप भी समझ गये होंगे कि यहाँ किसकी बात चल रही है, कहने की क्या जरूरत है )

गलसप्पो - बेवकूफ
छोरा - लड़का
कोनी - नहीं
टोळी - समूह ( Group )
डांगर - जानवर
धौळो - सफेद
चोळीयो - शर्ट

Monday, 5 October 2015

तुम बिल्कुल हम जैसे निकले, अब तक कहां छुपे थे भाई ?

पाकिस्तान से फहमीदा रियाज की नज्म,
आज के हिंदुत्व पर :
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तुम बिल्कुल हम जैसे निकले
अब तक कहां छुपे थे भाई ?
वह मूरखता, वह घामड़पन
जिसमें हमने सदी गंवाई
आखिर पहुंची द्वार तुम्हारे
अरे बधाई, बहुत बधाई
भूत धरम का नाच रहा है
कायम हिन्दू राज करोगे ?
सारे उल्टे काज करोगे ?
अपना चमन नाराज करोगे ?
तुम भी बैठे करोगे सोचा,
पूरी है वैसी तैयारी,
कौन है हिन्दू कौन नहीं है
तुम भी करोगे फतवे जारी
वहां भी मुश्किल होगा जीना
दांतो आ जाएगा पसीना
जैसे-तैसे कटा करेगी
वहां भी सबकी सांस घुटेगी
माथे पर सिंदूर की रेखा
कुछ भी नहीं पड़ोस से सीखा !
क्या हमने दुर्दशा बनायी
कुछ भी तुमको नज़र न आयी ?
भाड़ में जाये शिक्षा-विक्षा,
अब जाहिलपन के गुन गाना,
आगे गड्ढा है यह मत देखो
वापस लाओ गया जमाना
हम जिन पर रोया करते थे
तुम ने भी वह बात अब की है
बहुत मलाल है हमको, लेकिन
हा हा हा हा हो हो ही ही
कल दु:ख से सोचा करती थी
सोच के बहुत हँसी आज आयी
तुम बिल्कुल हम जैसे निकले
हम दो कौम नहीं थे भाई
मश्क करो तुम, आ जाएगा
उल्टे पांवों चलते जाना,
दूजा ध्यान न मन में आए
बस पीछे ही नज़र जमाना
एक जाप-सा करते जाओ,
बारम्बार यह ही दोहराओ
कितना वीर महान था भारत !
कैसा आलीशान था भारत !
फिर तुम लोग पहुंच जाओगे
बस परलोक पहुंच जाओगे !
हम तो हैं पहले से वहां पर,
तुम भी समय निकालते रहना,
अब जिस नरक में जाओ, वहां से
चिट्ठी-विट्ठी डालते रहना !

#SaveHumanity

Thursday, 1 October 2015

मज़हब ही सिखाता है आपस में बैर रखना

दिल्ली से लगते दादरी में गाय के नाम फिर एक इंसान की जान चली गयी । ये कोई इस देश में पहली बार नहीं हुआ न ही आखिरी बार । सवाल यहाँ गाय का नहीं है, सवाल यहाँ सूअर का नहीं है, सवाल यहाँ रंजिस का नहीं है, सवाल यहाँ आस्था का भी नहीं है और इंसानियत का हो ही नहीं सकता क्योंकि सवाल यहाँ नफरत का है । जैसा कि मेरे FB मित्र Zaheen Saifi ने सटीक लिखा है

" सवाल गाय में आस्था का होता तो अल कबीर जैसे मीट प्लांट में आग लगाते, सवाल आस्था का होता तो ऋषि कपूर जैसो के घर मे घुसकर तोड़ फोड़ करते, सवाल आस्था का होता तो गौमांस खाने वाला किरण रिजिजू जैसा केन्द्रीय मंत्री तुम्हारी अपनी सरकार मे अब तक ना होता, सवाल आस्था का होता तो एक कथित हिंदूवादी सरकार देश को बीफ एक्सपोर्ट में नम्बर वन ना बनाती, सवाल आस्था का होता तो गाय सड़क पर कूड़ा कचरा खाती ना फिरती। पर यहा सवाल आस्था का नही नफरत का था। एक मुस्लिम से नफरत का ।
‪#‎international_shame "


एक सवाल और था  कि  नफरत किस आधार पर की जाये ? आधार बनाया गया गाय का मांस । क्योंकि मृतक का एक बेटा एयरफोर्स में है, इसलिए देशद्रोह का आरोप तो लगा नहीं सकते थे, जैसा कि आज तक लगाते आये हैं । और देश सेवा का जवाब हम ही क्यों दें, उनसे क्यों नहीं माँगा जाता जो आज तक नफरत ही फैलाते आये हैं और कभी भी अपने पेट के सिवाय मानवता या देश सेवा की तरफ ध्यान नहीं गया । क्यों हमें बेगुनाही उन लोगों के सामने साबित करते हैं ? आखिर क्यों ? और कब तक ?

 एक मन्दिर के लाउडस्पीकर से पण्डे द्वारा बोला जाता है कि " इखलाक खाँ नाम के आदमी ने घर में गाय का मांस छुपाकर रखा है, उसने हमारी पवित्र गाय माता की हत्या की है, उसे इसकी सज़ा सभी हिंदुभाई मिलकर दें " और वो भीड़, जो कई सालों से इसी मौके के ताक़ में थी कि कब दंगा किया जाये और कब हम मुस्लिमों को मारे । और वो मौका पण्डे ( जो खुद एक दंगाई है ) ने आज उन दंगाइयों को दे दिया था । बस फिर क्या था, पूरा झुण्ड का झुण्ड उस बाप बेटे पर टूट पड़े, उस आदमी को सिलाई की मशीन और ईंटों की दे देकर मारा गया, घसीट घसीट कर मारा गया ।

वहाँ किस कदर लोगों के मन में नफरत थी उसका एक नमूना NDTV के पत्रकार रवीश कुमार के उस ब्लॉग में मिलता है, जो उन्होंने वहाँ से लौटकर लिखा था । बकौल रवीश
" मेरे साथ सेल्फी खिंचाने आया प्रशांत जल्दी ही तैश में आ गया। ख़ूबसूरत नौजवान और पेशे से इंजीनियर। प्रशांत ने छूटते ही कहा कि किसी को किसी की भावना से खेलने का हक नहीं है। हमारे सहयोगी रवीश रंजन ने टोकते हुए कहा कि मां बाप से तो लोग ठीक से बात नहीं करते और भावना के सवाल पर किसी को मार देते हैं। अच्छा लड़का लगा प्रशांत पर लगा कि उसे इस मौत पर कोई अफ़सोस नहीं है। उल्टा कहने लगा कि जब बंटवारा हो गया था कि हिन्दू यहां रहेंगे और मुस्लिम पाकिस्तान में तो गांधी और नेहरू ने मुसलमानों को भारत में क्यों रोका। इस बात से मैं सहम गया। ये वो बात है जिससे सांप्रदायिकता की कड़ाही में छौंक पड़ती है।
प्रशांत के साथ खूब गरमा गरम बहस हुई लेकिन मैं हार गया। हम जैसे लोग लगातार हार रहे हैं। प्रशांत को मैं नहीं समझा पाया। यही गुज़ारिश कर लौट आया कि एक बार अपने विचारों पर दोबारा सोचना। थोड़ी और किताबें पढ़ लो लेकिन वो निश्चित सा लगा कि जो जानता है वही सही है। वही अंतिम है। आख़िर प्रशांत को किसने ये सब बातें बताईं होंगी? क्या सोमवार रात की भीड़ से बहुत पहले इन नौजवानों के बीच कोई और आया होगा? इतिहास की आधू अधूरी किताबें और बातें लेकर? वो कौन लोग हैं जो प्रशांत जैसे नौजवानों को ऐसे लोगों के बहकावे में आने के लिए अकेला छोड़ गए? खुद किसी विदेशी विश्वविद्यालय में भारत के इतिहास पर अपनी फटीचर पीएचडी जमा करने और वाहवाही लूटने चले गए ।"


जो लोग इस देश में गायों को लेकर इतना रोना - धोना मचाये हुये हैं क्या उन लोगों ने कभी गाय पाली भी है ? पालते तो पता चलता कि इतनी गायें कूड़ा - करकट क्यों खा रही है । क्यों कट रही है । उनके महिमा मंडन अनुसार गाय, गौमूत्र, गोबर से ही इस देश का भला होता तो मजदूर किसान आत्महत्या नहीं करते दलालों ... डूब मरो ... अगली क्रांति तुम्हारे मंदिर - मस्जिदों के खिलाफ होगी ।

ये लेख गायों को काटने के पक्ष में नहीं लिख रहा हूँ बल्कि इसलिये लिख रहा हूँ क्योंकि ये प्रवृति अब सभी धर्मों में फ़ैल चुकी है,  दक्षिण एशिया ऐसे धार्मिक उन्मादों का अड्डा बना हुआ है । उदाहरण के लिये अफगानिस्तान में कुरान के पन्ने फाड़ने के नाम पर इसी तरह फरखुन्दा को पीट-पीटकर मारने और फिर जीवित जला देने का मामला हो या बांग्लादेश में कई ब्लॉगरों की हत्या का मामला हो या भारत में दाभोलकर, पंसारे, कुलबर्गी की निर्मम हत्या का मामला हो; धर्म ने हमारे साथ ये दिक्कत पैदा कर दी है कि हम जिंदगी जीना भूल गये हैं और बिगाड़ना सीख गये हैं । धर्म इंसानियत का दोस्त कम और दुश्मन ज्यादा बन गया है ।




Tuesday, 29 September 2015

सेक्स : अपराध या जरूरत

एक मित्र का FB पर विचार

" चिपचिपी गर्मी में पूरे परिवार की रोटीयां बनाकर , बरतन धो कर , फिर सबको दूध देकर बच्चों को सोने के लिये कहती और उनके लिये सुबह के स्कूल की तैयारी करती औरत जब बेड पर आकर गिरती है , और तब भी सोने से ज्यादा उसका ध्यान सुबह जल्दी उठकर फिर से उसी बदमजा बोरिंग रूटीन में जाने पर होता है , उसी औरत में से रात को सनीलियोनी तलाश करना अन्याय ही है "

इस कमेंट पर मेरा जवाब इस प्रकार था

" यदि आप प्रैक्टिकली सोचें तो यही हाल पुरुषों का है, जो सुबह निकलता है और शाम अँधेरे ढ़ले घर पहुँचता है, बॉस के ताने और ओवरटाइम काम के बोझ से अधमरा पति घर पहुँच के बच्चों की जिद को कल परसों पर टालता हुआ जब बेड पर गिरता है तो यही सोचता है कि कल बच्चों की जिद कैसे पूरी की जाये या माँ-बाबा को अस्पताल कब दिखाया जाये या बीवी को शॉपिंग कब करवायी जाये या काश ! उन फाइलों (काम) में कुछ कमी हो जाये या बॉस ताने न मारें । पूरा साल निकल जाता है पर वो परिवार के साथ घूमने के लिये एक सप्ताह कभी भी नहीं निकाल पाता है अब वो अपनी बीवी, जिसे हम सुख- दुःख का साथी या अर्धांगिनी या और न जाने क्या क्या कहते हैं, उसमें सनी लियॉन या कुछ और खोजता है तो क्या गलत करता है ? आखिर दैहिक संतुष्टि भी तो पति और पत्नी की एक-दूसरे के प्रति जिम्मेदारी होती है । यदि पति सनी लियॉन ढूंढता है तो पत्नी भी उसमें टॉम क्रूज या कोई और पोर्न स्टार ढूँढती ही है ।"



पर यहाँ मुख्य सवाल था सेक्स को लेकर, इसे लेकर कुछ सवाल हैं । जैसे -
आखिर क्यों हम लोग सेक्स को इतना महत्वपूर्ण मुद्दा बनाये हुये हैं ?
क्यों हम सेक्स को इतना घिनौना मानते हैं ?
क्यों इसे अपनी इज्जत से जोड़े हुये हैं ?
एक ऐसी क्रिया, जिससे एक नई पीढ़ी आकार लेती है, हमारी संख्या बढ़ाती है, को हमने इतना घृणित क्यों  मान लिया है ?
सेक्स, जो एक जरूरत है, उसपर हम इतना बवाल क्यों मचाये हुये हैं ?
जो बवाल मचा रहे हैं वो क्या बिना सेक्स के इस दूनिया में आये हैं ?
नहीं न ।
सब जानते हैं कि जो इस दुनिया में आया है, वो इसी क्रिया के होने से आया है ।

 सेक्स शरीर की जरूरत है, इससे ज्यादा कुछ नहीं । इसके लिये आपको एक साधारण सा उदाहरण देता हूँ -
एक किसान अपने पालतू जानवरों भैंस, गाय, बकरी आदि को खुद भैंसे, बैल, बकरे के पास ले जाता है क्योंकि अगली बार दुहना है तो बच्चे पैदा होना जरूरी है, और बच्चे तभी होंगे जब सेक्स होगा । तो वो किसान अपने जानवरों के सेक्स को तो खुद आगे चलकर पुरे गाँव में प्रमोट करता है, उसका जानवर जब बोलता है ( यानि पाले आना या सेक्स करना चाहता है ) तो वो सबको बताता है लेकिन दूसरा लड़का ( या लड़की ) उसकी लड़की (या लड़का ) के साथ ये काम करले तो मरने / मारने पर उतारू हो जाता है ।

एक बात पूछता हूँ आप लोगों से कि जब आपका शरीर  भूख, मल, मूत्र, पसीना आदि क्रियाएं करता है तो आप निःसंकोच कहीं भी ये सब कर लेते हैं, वो भी बिना किसी झिझक के । तो इसी प्रकार सेक्स भी शरीर की एक जरूरत है ।
जरूरत बता रहा हूँ इसका मतलब ये नहीं हुआ कि आप हद पार कर जाओ और किसी के साथ भी करो । नहीं, नागरिक समाज ने जो नियम निर्धारित कर रखें हैं उस हिसाब से करो जैसे शादी, लिव इन, गर्लफ्रेंड- बॉयफ्रेंड ( शादी को छोड़कर बाकि का भारत में चलन कम है ) । हम लोग तो किसी के फोन पर बात करने, विपरीत सेक्स के साथ चलने, हाथ पकड़ने, गले मिलने तक को स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं तो सेक्स को इतने खुले तौर पर स्वीकार करना तो बड़ी दूर की कोड़ी है इस देश में ।

अभी तो चलो फिर भी कुछ बदलाव हुये हैं वरना पहले पहल तो गाँवों में ( देश की 75 % जनसंख्या ) किसी शादीशुदा जोड़े ने रात को सेक्स किया है, ये मात्र का समाज को पता चल जाने भर से वो अगले दिन किसी से नजरें नहीं मिला पाते थे ।

यौन रोगों के बारे में भ्रांति न फैले, लोग एड्स जैसी गंभीर बीमारी का खुलकर इलाज करवा सके और समाज में हँसी का पात्र न बनें, दुकान में इससे बचाव के लिये बिना घबरायें कंडोम खरीद सके, आने वाली पीढ़ी को इस बारे में पूरा ज्ञान मिले और आपका बच्चा छुप-छुपकर कुछ गलत सिखने के बजाय आसानी से सही ज्ञान ले इसके लिये जरूरी है कि सेक्स को किताबों में लाइए । सेक्स को हौव्वा मत बनाइये, सेक्स को सेक्स ही रहने दें । बदलाव जरूरी हैं, इसलिये बदलाव में भागीदार बनें


Friday, 25 September 2015

अमेरिका कभी भी किसी का दोस्त नही हो सकता ! --- अफ़ज़ल ख़ान

( नरेन्द्र मोदी के अमरीका दौरे पर एक विचारनीय लेख )

जैसा कहा जाता है कि पुलिस की न दोस्ती अच्छी और न ही दुश्मनी अच्छी। ये बात आज के विश्व की पुलिस (अमेरिका) पर भी लागू होती है। अमेरिका ने समय पर कभी भी अपने दोस्त मुल्कों का साथ नही दिया है, बल्कि वक़्त पर धोखा ही दिया है। ये मैं नही अमेरिका का इतिहास बताता है।
आइये हम आप को अमेरिका का इतिहास बताते है कि अपना मतलब निकालने के बाद कभी भी वक़्त पर साथ नही दिया है। ईरान का बादशाह रज़ा शाह पहेलवी अमेरिका का सब से वफादार दोस्त था। यूरोप का मीडिया उसे अमेरिकन गवर्नर कहता था। उसने अमेरिका के कहने पर ईरान में पर्दे पर पाबंदी लगा दी थी। अगर कोई महिला परदे मे निकलती थी तो पुलिस बुर्का फाड़ देती थी। शाह ईरान ने लड़कियों के स्कूलों मे स्कर्ट को यूनिफॉर्म बना दिया था। शराब, नाच खुले आम होने लगा था। ईरान पूरे विश्व मे अकेला मुल्क था जहा स्कूलों मे भी शराब की दुकानें थी। उसके बाद जब ईरान मे इंकलाब आया और शाह ईरान मुल्क से भागा और अमेरिका से मदद मांगी तो अमेरिका ने आंखे फेर ली और अमेरिका मे घुसाने से भी मना कर दिया। अमेरिका ने उस के अकाउंट भी सीज़ कर दिए, इस तरह 2 साल तक इधर-उधर भागा फिरता रहा और मिस्र में मारा गया।
अनास-तसिसु निकरागुआ (NICARAGUA) मे AMERICAN एजेंट था, अमेरिका ने उसे डॉलर और हथियार दे कर कम्यूनिज़्म के खिलाफ खड़ा किया और अमेरिका के युद्ध को अपना युद्ध समझ कर लड़ता रहा, मगर जब उस को वहा से भागना पड़ा तो अमेरिका ने उसे पहचानने से इंकार कर दिया और उसके अमेरिका आने पर भी प्रतिबंध लगा दिया। इस तरह जंगलो और पहाड़ों मे छुप-छुप कर 1980 में जंगल मे उस की मौत हो गयी।
चिली ( CHILLI) के फ़ौजी चीफ जनरल अगुस्तो पनुशे ने 1973 अमेरिका की मदद से अपनी चुनी हुई हुकूमत को हटा कर गद्दी पर क़ब्ज़ा कर लिया। पानुषे ने अमेरिका के कहने पर हज़ारों नागरिकों की हत्या कराई। अमेरिका के कहने पर कई संगठनो पर पाबंदियां लगा दी और जनता पर बहुत जुल्म किया, मगर जब हुकूमत बदली और पानुषे वहां से भागा तो अमेरिका ने उस की कोई मदद नही की, आखिर मे जब वो इंग्लैंड पहुंचा तो वहां की पुलिस ने उसे पकड़ कर चिली हुकूमत को सौंप दिया, जहां 2006 मे उस की मौत हो गयी।
अंगोला ( ANGOLA) का विद्रोही सरदार जूनास सुमोनी भी अमेरिका के सहारे ही हुकूमत संभाला और अपने मुल्क मे अमेरिका के हित के लिये काम करता रहा, लेकिन 1992 मे अमेरिका ने उसे कम्यूनिस्ट के साथ समझौता करने के लिये कहा जिस के कारण उसे मुल्क छोड़ना पड़ा और छुप-छुप कर अपनी जिंदगी बचता रहा मगर अमेरिका ने पहचानने से इंकार कर दिया।
पनामा (PANAMA) का जेनरल नुरीगा भी अमेरिका के लिये काम करता रहा और अमेरिका ने उसे कम्यूनिस्टों के खिलाफ इस्तमाल किया, मगर हुकूमत बदली और उसे जेल मे डाल दिया उस ने अपने बचाव के लिये अमेरिका से गुहार लगाई मगर अमेरिका ने मदद से इंकार कर दिया।
फिलिपीन्स का राष्ट्रपति मार्कोस 22 साल तक अमेरिका के हित मे अपने मुल्क में अमेरिका के लिये काम करता रहा। उस ने अमेरिका के इशारे पर ही अपने मुल्क मे कम्यूनिस्टों को चुन-चुन कर खत्म कर दिया, लेकिन 1986 मे अमेरिका ने ही उस की हुकूमत खतम करा दी, जिस के बाद मार्कोस ने अपनी पूरी ज़िंदगी एक छोटे मकान मे गुजार दी, मगर अमेरिक ने उसे पूछा तक नही।
सद्दाम हुसैन की कहानी तो पूरा दुनिया जानती है, अमेरिका के कहने पर ईरान पर हमला किया और 8 वर्ष तक जंग लड़ा जिस मे 10 लाख से अधिक लोग मारे गये। 1990 तक अमेरिका दोस्त रहा, मगर अमेरिका ने तेल की लालच मे इराक पर हमला कर दिया और फिर पूरी दुनिया ने देखा कि अमेरिका के इशारे पर 2006 मे उसे फांसी दे दी गयी। अमेरिका ने ओसामा बिन लादेन की मदद से अल-कायदा को बनाया और रूस के खिलाफ उस का इस्तेमाल किया, जब रूस बर्बाद हो गया और अल-कायदा से कोई मतलब नही रहा तो अये आतंकी संगठन घोषित कर दिया, जिस के फलस्वरूप अल-कायदा ने किस तरह अमेरिका से बदला लिया पूरी दुनिया ने देखा।
अमेरिका के henry kisenger ने एक बार कहा था कि "अगर आप अमेरिका के दुश्मन है तो आप के बचने के मौके हैं लेकिन बदकिस्मती से आप उस के दोस्त बन गये तो कोई भी आप को अमेरिका से नही बच सकता।"
हमे शह ईरान से सद्दाम हूसेन तक का अंजाम देखना होगा कि अमेरिका अपने दोस्तों को किस तरह धोखा देता है।
इसलिये हमारे सरकार को चाहिये कि हम अमेरिका से अधिक रूस को दोस्त बनाये रखे और चीन से भी अपनी दोस्ती बनाने की कोशिश करें क्योंकि अगला सुपर पावर चीन को ही बनना है। हमे इतिहास से सबक लेना चाहिये और अमेरिका से दूरी बनाने में ही लाभ है।

( मोहम्मद अफजल खान facebook पर संजीदा लेखन करते हैं और उनकी टिप्पणियाँ बेहद तार्किक होती हैं )

Wednesday, 2 September 2015

गुंडागर्दी को देशभक्ति मत कहिए… – रवीश कुमार

आज सुबह व्हॉट्सऐप, मैसेंजर और ट्विटर पर कुछ लोगों ने एक प्लेट भेजा, जिस पर मेरा भी नाम लिखा है। मेरे अलावा कई और लोगों के नाम लिखे हैं। इस संदर्भ में लिखा गया है कि हम लोग उन लोगों में शामिल हैं, जिन्होंने याकूब मेमन की फांसी की माफी के लिए राष्ट्रपति को लिखा है। अव्वल तो मैंने ऐसी कोई चिट्ठी नहीं लिखी है और लिखी भी होती तो मैं नहीं मानता, यह कोई देशद्रोह है। मगर वे लोग कौन हैं, जो किसी के बारे में देशद्रोही होने की अफवाह फैला देते हैं। ऐसा करते हुए वे कौन सी अदालत, कानून और देश का सम्मान कर रहे होते हैं। क्या अफवाह फैलाना भी देशभक्ति है।
किसी को इन देशभक्तों का भी पता लगाना चाहिए। ये देश के लिए कौन-सा काम करते हैं। इनका नागरिक आचरण क्या है। आम तौर पर ये लोग किसी पार्टी के भ्रष्टाचारों पर पर्दा डालते रहते हैं। ऑनलाइन दुनिया में एक दल के लिए लड़ते रहते हैं। कई दलों के पास अब ऐसी ऑनलाइन सेना हो गई है। इनकी प्रोफाइल दल विशेष की पहचान चिह्नों से सजी होती हैं। किसी में नारे होते हैं तो किसी में नेता तो किसी में धार्मिक प्रतीक। क्या हमारे लोकतंत्र ने इन्हें ठेका दे रखा है कि वे देशद्रोहियों की पहचान करें, उनकी टाइमलाइन पर हमला कर आतंकित करने का प्रयास करें।
सार्वजनिक जीवन में तरह-तरह के सवाल करने से हमारी नागरिकता निखरती है। क्यों ज़रूरी हो कि सारे एक ही तरह से सोचें। क्या कोई अलग सोच रखे तो उसके खिलाफ अफवाह फैलाई जाए और आक्रामक लफ़्ज़ों का इस्तेमाल हो। अब आप पाठकों को इसके खिलाफ बोलना चाहिए। अगर आपको यह सामान्य लगता है तो समस्या आपके साथ भी है और इसके शिकार आप भी होंगे। एक दिन आपके खिलाफ भी व्हॉट्सऐप पर संदेश घूमेगा और ज़हर फैलेगा, क्योंकि इस खेल के नियम वही तय करते हैं, जो किसी दल के समर्थक होते हैं, जिनके पास संसाधन और कुतर्क होते हैं। पत्रकार निखिल वाघले ने ट्वीट भी किया है, “अब इस देश में कोई बात कहनी हो तो लोगों की भीड़ के साथ ही कहनी पड़ेगी, वर्ना दूसरी भीड़ कुचल देगी…” आप सामान्य पाठकों को सोचना चाहिए। आप जब भी कहेंगे, अकेले ही होंगे।
पूरी दुनिया में ऑनलाइन गुंडागर्दी एक खतरनाक प्रवृत्ति के रूप में उभर रही है। ये वे लोग हैं, जो स्कूलों में ‘बुली’बनकर आपके मासूम बच्चों को जीवन भर के लिए आतंकित कर देते हैं, मोहल्ले के चौक पर खड़े होकर किसी लड़की के बाहर निकलने की तमाम संभावनाओं को खत्म करते रहते हैं और सामाजिक प्रतिष्ठा को ध्वस्त करने का भय दिखाकर ब्लैकमेल करते हैं। आपने ‘मसान’ फिल्म में देखा ही होगा कि कैसे वह क्रूर थानेदार फोन से रिकॉर्ड कर देवी और उसके बाप की ज़िन्दगी को खत्म कर देता है। उससे पहले देवी के प्रेमी दोस्त को मौके पर ही मार देता है। यह प्रवृत्ति हत्यारों की है, इसलिए सतर्क रहिए।
बेशक आप किसी भी पार्टी को पसंद करते हों, लेकिन उसके भीतर भी तो सही-गलत को लेकर बहस होती है। चार नेताओं की अलग-अलग लाइनें होती हैं, इसलिए आपको इस प्रवृत्ति का विरोध करना चाहिए। याद रखिएगा, इनका गैंग बढ़ेगा तो एक दिन आप भी फंसेंगे। इसलिए अगर आपकी टाइमलाइन पर आपका कोई भी दोस्त ऐसा कर रहा हो तो उसे चेता दीजिए। उससे नाता तोड़ लीजिए। अपनी पार्टी के नेता को लिखिए कि यह समर्थक रहेगा तो हम आपके समर्थक नहीं रह पाएंगे। क्या आप वैसी पार्टी का समर्थन करना चाहेंगे, जहां इस तरह के ऑनलाइन गुंडे हों। सवाल करना मुखालफत नहीं है। हर दल में ऐसे गुंडे भर गए हैं। इसके कारण ऑनलाइन की दुनिया अब नागरिकों की दुनिया रह ही नहीं जाएगी।
ऑनलाइन गुंडागर्दी सिर्फ फांसी, धर्म या किसी नेता के प्रति भक्ति के संदर्भ में नहीं होती है। फिल्म कलाकार अनुष्का शर्मा ने ट्वीट किया है कि वह ग़ैर-ज़िम्मेदार बातें करने वाले या किसी की प्रतिष्ठा को नुकसान करने वालों को ब्लॉक कर देंगी। मोनिका लेविंस्की का टेड पर दिया गया भाषण भी एक बार उठाकर पढ़ लीजिए। मोनिका लेविंस्की ऑनलाइन गुंडागर्दी के खिलाफ काम कर ही लंदन की एक संस्था से जुड़ गई हैं। उनका प्रण है कि अब वह किसी और को इस गुंडागर्दी का शिकार नहीं होने देंगी। फेसबुक पर पूर्व संपादक शंभुनाथ शुक्ल के पेज पर जाकर देखिए। आए दिन वह ऐसी प्रवृत्ति से परेशान होते हैं और इनसे लड़ने की प्रतिज्ञा करते रहते हैं। कुछ भी खुलकर लिखना मुश्किल हो गया है। अब आपको समझ आ ही गया होगा कि संतुलन और ‘is equal to’ कुछ और नहीं, बल्कि चुप कराने की तरकीब है। आप बोलेंगे तो हम भी आपके बारे में बोलेंगे। क्या किसी भी नागरिक समाज को यह मंज़ूर होना चाहिए।
इन तत्वों को नज़रअंदाज़ करने की सलाह बिल्कुल ऐसी है कि आप इन गुंडों को स्वीकार कर लीजिए। ध्यान मत दीजिए। सवाल है कि ध्यान क्यों न दें। प्रधानमंत्री के नाम पर भक्ति करने वालों का उत्पात कई लोगों ने झेला है। प्रधानमंत्री को लेकर जब यह सब शुरू हुआ तो वह इस ख़तरे को समझ गए। बाकायदा सार्वजनिक चेतावनी दी, लेकिन बाद में यह भी खुलासा हुआ कि जिन लोगों को बुलाकर यह चेतावनी दी, उनमें से कई लोग खुद ऐसा काम करते हैं। इसीलिए मैंने कहा कि अपने आसपास के ऐसे मित्रों या अनुचरों पर निगाह रखिए, जो ऑनलाइन गुंडागर्दी करता है। ये लोग सार्वजनिक जीवन के शिष्टाचार को तोड़ रहे हैं।
मौजूदा संदर्भ याकूब मेमन की फांसी की सज़ा के विरोध का है। जब तक सज़ा के खिलाफ तमाम कानूनी विकल्प हैं, उनका इस्तेमाल देशद्रोह कैसे हो गया। सवाल उठाने और समीक्षा की मांग करने वाले में तो हिन्दू, मुस्लिम, सिख और ईसाई भी हैं। अदालत ने तो नहीं कहा कि कोई ऐसा कर देशद्रोह का काम कर रहे हैं। अगर इस मामले में अदालत का फैसला ही सर्वोच्च होता तो फिर राज्यपाल और राष्ट्रपति के पास पुनर्विचार के प्रावधान क्यों होते। क्या ये लोग संविधान निर्माताओं को भी देशद्रोही घोषित कर देंगे।
याकूब मेमन का मामला आते ही वे लोग, जो व्यापमं से लेकर तमाम तरह के भ्रष्टाचार के आरोपों के कारण ऑनलाइन दुनिया से भागे हुए थे, लौट आए हैं। खुद धर्म की आड़ लेते हैं और दूसरे को धर्म के नाम पर डराते हैं, क्योंकि अंतिम नैतिक बल इन्हें धर्म से ही मिलता है। वे उस सामूहिकता का नाजायज़ लाभ उठाते हैं, जो धर्म के नाम पर अपने आप बन जाती है या जिसके बन जाने का मिथक होता है। फिल्मों में आपने दादा टाइप के कई किरदार देखें होंगे, जो सौ नाजायज़ काम करेगा, लेकिन भक्ति भी करेगा। इससे वह समाज में मान्यता हासिल करने का कमज़ोर प्रयास करता है। अगर ऑनलाइन गुंडागर्दी करने वालों की चली तो पूरा देश देशद्रोही हो जाएगा।
यह भी सही है कि कुछ लोगों ने याकूब मेमन के मामले को धार्मिकता से जोड़कर काफी नुकसान किया है, गलत काम किया है। फांसी के आंकड़े भी इसकी पुष्टि करते हैं कि फैसले का संबंध धर्म से नहीं है। लेकिन क्या इस बात का वे लोग खुराक की तरह इस्तेमाल नहीं कर रहे हैं, जो हमेशा इसी फिराक में रहते हैं कि कोई चारा मिले नहीं कि उसकी चर्चा शहर भर में फैला दो। क्या आपने इन्हें यह कहते सुना कि वे धर्म से जोड़ने का विरोध तो करते हैं, मगर फांसी की सज़ा का भी विरोध करते हैं। याकूब का मामला मुसलमान होने का मामला ही नहीं हैं। पुनर्विचार एक संवैधानिक अधिकार है। नए तथ्य आते हैं तो उसे नए सिरे से देखने का विवेक और अधिकार अदालत के पास है।
90 देशों में फांसी की सज़ा का प्रावधान नहीं हैं। क्या वहां यह तय करते हुए आतंकवाद और जघन्य अपराधों का मामला नहीं आया होगा। बर्बरता के आधार पर फांसी की सज़ा का करोड़ों लोग विरोध करते हैं। आतंकवाद एक बड़ी चुनौती है। हमने कई आतंकवादियों को फांसी पर लटकाया है, पर क्या उससे आतंकवाद ख़त्म हो गया। सज़ा का कौन-सा मकसद पूरा हुआ। क्या इंसाफ का यही अंतिम मकसद है, जिसे लेकर राष्ट्रभक्ति उमड़ आती है। इनके हमलों से जो परिवार बर्बाद हुए, उनके लिए ये ऑनलाइन देशभक्त क्या करते हैं। कोई पार्टी वाला जाता है उनका हाल पूछने।
फांसी से आतंकवाद खत्म होता तो आज दुनिया से आतंकवाद मिट गया होता। आतंकवाद क्यों और कैसे पनपता है, उसे लेकर भोले मत बनिए। उन क्रूर राजनीतिक सच्चाइयों का सामना कीजिए। अगर इसका कारण धर्म होता और फांसी से हल हो जाता तो गुरुदासपुर आतंकी हमला ही न होता। उनके हमले से धार्मिक मकसद नहीं, राजनीतिक मकसद ही पूरा होता होगा। धर्म तो खुराक है, ताकि एक खास किस्म की झूठी सामूहिक चेतना भड़काई जा सके। जो लोग इस बहस में कूदे हैं, उनकी सोच और समझ धार्मिक पहचान से आगे नहीं जाती है। वे कब पाकिस्तान को आतंकी बता देते हैं और कब उससे हाथ मिलाकर कूटनीतिक इतिहास रच देते हैं, ऐसा लगता है कि सब कुछ टू-इन-वन रेडियो जैसा है। मन किया तो कैसेट बजाया, मन किया तो रेडियो। मन किया तो हम देशभक्त, मन किया तो आप देशद्रोही।

( यह लेख http://khabar.ndtv.com/news/blogs/ravish-kumar-writes-about-online-goons-and-the-patriotism-1200971 से लिया गया है। )

रवीश कुमार वरिष्ठ हिंदी पत्रकार हैं, एनडीटीवी इंडिया में प्राइम टाइम के एंकर के रूप में देश भर में लोकप्रिय हैं। सोशल मीडिया पर सक्रिय हैं और अपनी बात को अपनी तरह से कहने में संकोच न करने के लिए पसंद किए जाते हैं।

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