Friday, 25 September 2015

अमेरिका कभी भी किसी का दोस्त नही हो सकता ! --- अफ़ज़ल ख़ान

( नरेन्द्र मोदी के अमरीका दौरे पर एक विचारनीय लेख )

जैसा कहा जाता है कि पुलिस की न दोस्ती अच्छी और न ही दुश्मनी अच्छी। ये बात आज के विश्व की पुलिस (अमेरिका) पर भी लागू होती है। अमेरिका ने समय पर कभी भी अपने दोस्त मुल्कों का साथ नही दिया है, बल्कि वक़्त पर धोखा ही दिया है। ये मैं नही अमेरिका का इतिहास बताता है।
आइये हम आप को अमेरिका का इतिहास बताते है कि अपना मतलब निकालने के बाद कभी भी वक़्त पर साथ नही दिया है। ईरान का बादशाह रज़ा शाह पहेलवी अमेरिका का सब से वफादार दोस्त था। यूरोप का मीडिया उसे अमेरिकन गवर्नर कहता था। उसने अमेरिका के कहने पर ईरान में पर्दे पर पाबंदी लगा दी थी। अगर कोई महिला परदे मे निकलती थी तो पुलिस बुर्का फाड़ देती थी। शाह ईरान ने लड़कियों के स्कूलों मे स्कर्ट को यूनिफॉर्म बना दिया था। शराब, नाच खुले आम होने लगा था। ईरान पूरे विश्व मे अकेला मुल्क था जहा स्कूलों मे भी शराब की दुकानें थी। उसके बाद जब ईरान मे इंकलाब आया और शाह ईरान मुल्क से भागा और अमेरिका से मदद मांगी तो अमेरिका ने आंखे फेर ली और अमेरिका मे घुसाने से भी मना कर दिया। अमेरिका ने उस के अकाउंट भी सीज़ कर दिए, इस तरह 2 साल तक इधर-उधर भागा फिरता रहा और मिस्र में मारा गया।
अनास-तसिसु निकरागुआ (NICARAGUA) मे AMERICAN एजेंट था, अमेरिका ने उसे डॉलर और हथियार दे कर कम्यूनिज़्म के खिलाफ खड़ा किया और अमेरिका के युद्ध को अपना युद्ध समझ कर लड़ता रहा, मगर जब उस को वहा से भागना पड़ा तो अमेरिका ने उसे पहचानने से इंकार कर दिया और उसके अमेरिका आने पर भी प्रतिबंध लगा दिया। इस तरह जंगलो और पहाड़ों मे छुप-छुप कर 1980 में जंगल मे उस की मौत हो गयी।
चिली ( CHILLI) के फ़ौजी चीफ जनरल अगुस्तो पनुशे ने 1973 अमेरिका की मदद से अपनी चुनी हुई हुकूमत को हटा कर गद्दी पर क़ब्ज़ा कर लिया। पानुषे ने अमेरिका के कहने पर हज़ारों नागरिकों की हत्या कराई। अमेरिका के कहने पर कई संगठनो पर पाबंदियां लगा दी और जनता पर बहुत जुल्म किया, मगर जब हुकूमत बदली और पानुषे वहां से भागा तो अमेरिका ने उस की कोई मदद नही की, आखिर मे जब वो इंग्लैंड पहुंचा तो वहां की पुलिस ने उसे पकड़ कर चिली हुकूमत को सौंप दिया, जहां 2006 मे उस की मौत हो गयी।
अंगोला ( ANGOLA) का विद्रोही सरदार जूनास सुमोनी भी अमेरिका के सहारे ही हुकूमत संभाला और अपने मुल्क मे अमेरिका के हित के लिये काम करता रहा, लेकिन 1992 मे अमेरिका ने उसे कम्यूनिस्ट के साथ समझौता करने के लिये कहा जिस के कारण उसे मुल्क छोड़ना पड़ा और छुप-छुप कर अपनी जिंदगी बचता रहा मगर अमेरिका ने पहचानने से इंकार कर दिया।
पनामा (PANAMA) का जेनरल नुरीगा भी अमेरिका के लिये काम करता रहा और अमेरिका ने उसे कम्यूनिस्टों के खिलाफ इस्तमाल किया, मगर हुकूमत बदली और उसे जेल मे डाल दिया उस ने अपने बचाव के लिये अमेरिका से गुहार लगाई मगर अमेरिका ने मदद से इंकार कर दिया।
फिलिपीन्स का राष्ट्रपति मार्कोस 22 साल तक अमेरिका के हित मे अपने मुल्क में अमेरिका के लिये काम करता रहा। उस ने अमेरिका के इशारे पर ही अपने मुल्क मे कम्यूनिस्टों को चुन-चुन कर खत्म कर दिया, लेकिन 1986 मे अमेरिका ने ही उस की हुकूमत खतम करा दी, जिस के बाद मार्कोस ने अपनी पूरी ज़िंदगी एक छोटे मकान मे गुजार दी, मगर अमेरिक ने उसे पूछा तक नही।
सद्दाम हुसैन की कहानी तो पूरा दुनिया जानती है, अमेरिका के कहने पर ईरान पर हमला किया और 8 वर्ष तक जंग लड़ा जिस मे 10 लाख से अधिक लोग मारे गये। 1990 तक अमेरिका दोस्त रहा, मगर अमेरिका ने तेल की लालच मे इराक पर हमला कर दिया और फिर पूरी दुनिया ने देखा कि अमेरिका के इशारे पर 2006 मे उसे फांसी दे दी गयी। अमेरिका ने ओसामा बिन लादेन की मदद से अल-कायदा को बनाया और रूस के खिलाफ उस का इस्तेमाल किया, जब रूस बर्बाद हो गया और अल-कायदा से कोई मतलब नही रहा तो अये आतंकी संगठन घोषित कर दिया, जिस के फलस्वरूप अल-कायदा ने किस तरह अमेरिका से बदला लिया पूरी दुनिया ने देखा।
अमेरिका के henry kisenger ने एक बार कहा था कि "अगर आप अमेरिका के दुश्मन है तो आप के बचने के मौके हैं लेकिन बदकिस्मती से आप उस के दोस्त बन गये तो कोई भी आप को अमेरिका से नही बच सकता।"
हमे शह ईरान से सद्दाम हूसेन तक का अंजाम देखना होगा कि अमेरिका अपने दोस्तों को किस तरह धोखा देता है।
इसलिये हमारे सरकार को चाहिये कि हम अमेरिका से अधिक रूस को दोस्त बनाये रखे और चीन से भी अपनी दोस्ती बनाने की कोशिश करें क्योंकि अगला सुपर पावर चीन को ही बनना है। हमे इतिहास से सबक लेना चाहिये और अमेरिका से दूरी बनाने में ही लाभ है।

( मोहम्मद अफजल खान facebook पर संजीदा लेखन करते हैं और उनकी टिप्पणियाँ बेहद तार्किक होती हैं )

Wednesday, 2 September 2015

गुंडागर्दी को देशभक्ति मत कहिए… – रवीश कुमार

आज सुबह व्हॉट्सऐप, मैसेंजर और ट्विटर पर कुछ लोगों ने एक प्लेट भेजा, जिस पर मेरा भी नाम लिखा है। मेरे अलावा कई और लोगों के नाम लिखे हैं। इस संदर्भ में लिखा गया है कि हम लोग उन लोगों में शामिल हैं, जिन्होंने याकूब मेमन की फांसी की माफी के लिए राष्ट्रपति को लिखा है। अव्वल तो मैंने ऐसी कोई चिट्ठी नहीं लिखी है और लिखी भी होती तो मैं नहीं मानता, यह कोई देशद्रोह है। मगर वे लोग कौन हैं, जो किसी के बारे में देशद्रोही होने की अफवाह फैला देते हैं। ऐसा करते हुए वे कौन सी अदालत, कानून और देश का सम्मान कर रहे होते हैं। क्या अफवाह फैलाना भी देशभक्ति है।
किसी को इन देशभक्तों का भी पता लगाना चाहिए। ये देश के लिए कौन-सा काम करते हैं। इनका नागरिक आचरण क्या है। आम तौर पर ये लोग किसी पार्टी के भ्रष्टाचारों पर पर्दा डालते रहते हैं। ऑनलाइन दुनिया में एक दल के लिए लड़ते रहते हैं। कई दलों के पास अब ऐसी ऑनलाइन सेना हो गई है। इनकी प्रोफाइल दल विशेष की पहचान चिह्नों से सजी होती हैं। किसी में नारे होते हैं तो किसी में नेता तो किसी में धार्मिक प्रतीक। क्या हमारे लोकतंत्र ने इन्हें ठेका दे रखा है कि वे देशद्रोहियों की पहचान करें, उनकी टाइमलाइन पर हमला कर आतंकित करने का प्रयास करें।
सार्वजनिक जीवन में तरह-तरह के सवाल करने से हमारी नागरिकता निखरती है। क्यों ज़रूरी हो कि सारे एक ही तरह से सोचें। क्या कोई अलग सोच रखे तो उसके खिलाफ अफवाह फैलाई जाए और आक्रामक लफ़्ज़ों का इस्तेमाल हो। अब आप पाठकों को इसके खिलाफ बोलना चाहिए। अगर आपको यह सामान्य लगता है तो समस्या आपके साथ भी है और इसके शिकार आप भी होंगे। एक दिन आपके खिलाफ भी व्हॉट्सऐप पर संदेश घूमेगा और ज़हर फैलेगा, क्योंकि इस खेल के नियम वही तय करते हैं, जो किसी दल के समर्थक होते हैं, जिनके पास संसाधन और कुतर्क होते हैं। पत्रकार निखिल वाघले ने ट्वीट भी किया है, “अब इस देश में कोई बात कहनी हो तो लोगों की भीड़ के साथ ही कहनी पड़ेगी, वर्ना दूसरी भीड़ कुचल देगी…” आप सामान्य पाठकों को सोचना चाहिए। आप जब भी कहेंगे, अकेले ही होंगे।
पूरी दुनिया में ऑनलाइन गुंडागर्दी एक खतरनाक प्रवृत्ति के रूप में उभर रही है। ये वे लोग हैं, जो स्कूलों में ‘बुली’बनकर आपके मासूम बच्चों को जीवन भर के लिए आतंकित कर देते हैं, मोहल्ले के चौक पर खड़े होकर किसी लड़की के बाहर निकलने की तमाम संभावनाओं को खत्म करते रहते हैं और सामाजिक प्रतिष्ठा को ध्वस्त करने का भय दिखाकर ब्लैकमेल करते हैं। आपने ‘मसान’ फिल्म में देखा ही होगा कि कैसे वह क्रूर थानेदार फोन से रिकॉर्ड कर देवी और उसके बाप की ज़िन्दगी को खत्म कर देता है। उससे पहले देवी के प्रेमी दोस्त को मौके पर ही मार देता है। यह प्रवृत्ति हत्यारों की है, इसलिए सतर्क रहिए।
बेशक आप किसी भी पार्टी को पसंद करते हों, लेकिन उसके भीतर भी तो सही-गलत को लेकर बहस होती है। चार नेताओं की अलग-अलग लाइनें होती हैं, इसलिए आपको इस प्रवृत्ति का विरोध करना चाहिए। याद रखिएगा, इनका गैंग बढ़ेगा तो एक दिन आप भी फंसेंगे। इसलिए अगर आपकी टाइमलाइन पर आपका कोई भी दोस्त ऐसा कर रहा हो तो उसे चेता दीजिए। उससे नाता तोड़ लीजिए। अपनी पार्टी के नेता को लिखिए कि यह समर्थक रहेगा तो हम आपके समर्थक नहीं रह पाएंगे। क्या आप वैसी पार्टी का समर्थन करना चाहेंगे, जहां इस तरह के ऑनलाइन गुंडे हों। सवाल करना मुखालफत नहीं है। हर दल में ऐसे गुंडे भर गए हैं। इसके कारण ऑनलाइन की दुनिया अब नागरिकों की दुनिया रह ही नहीं जाएगी।
ऑनलाइन गुंडागर्दी सिर्फ फांसी, धर्म या किसी नेता के प्रति भक्ति के संदर्भ में नहीं होती है। फिल्म कलाकार अनुष्का शर्मा ने ट्वीट किया है कि वह ग़ैर-ज़िम्मेदार बातें करने वाले या किसी की प्रतिष्ठा को नुकसान करने वालों को ब्लॉक कर देंगी। मोनिका लेविंस्की का टेड पर दिया गया भाषण भी एक बार उठाकर पढ़ लीजिए। मोनिका लेविंस्की ऑनलाइन गुंडागर्दी के खिलाफ काम कर ही लंदन की एक संस्था से जुड़ गई हैं। उनका प्रण है कि अब वह किसी और को इस गुंडागर्दी का शिकार नहीं होने देंगी। फेसबुक पर पूर्व संपादक शंभुनाथ शुक्ल के पेज पर जाकर देखिए। आए दिन वह ऐसी प्रवृत्ति से परेशान होते हैं और इनसे लड़ने की प्रतिज्ञा करते रहते हैं। कुछ भी खुलकर लिखना मुश्किल हो गया है। अब आपको समझ आ ही गया होगा कि संतुलन और ‘is equal to’ कुछ और नहीं, बल्कि चुप कराने की तरकीब है। आप बोलेंगे तो हम भी आपके बारे में बोलेंगे। क्या किसी भी नागरिक समाज को यह मंज़ूर होना चाहिए।
इन तत्वों को नज़रअंदाज़ करने की सलाह बिल्कुल ऐसी है कि आप इन गुंडों को स्वीकार कर लीजिए। ध्यान मत दीजिए। सवाल है कि ध्यान क्यों न दें। प्रधानमंत्री के नाम पर भक्ति करने वालों का उत्पात कई लोगों ने झेला है। प्रधानमंत्री को लेकर जब यह सब शुरू हुआ तो वह इस ख़तरे को समझ गए। बाकायदा सार्वजनिक चेतावनी दी, लेकिन बाद में यह भी खुलासा हुआ कि जिन लोगों को बुलाकर यह चेतावनी दी, उनमें से कई लोग खुद ऐसा काम करते हैं। इसीलिए मैंने कहा कि अपने आसपास के ऐसे मित्रों या अनुचरों पर निगाह रखिए, जो ऑनलाइन गुंडागर्दी करता है। ये लोग सार्वजनिक जीवन के शिष्टाचार को तोड़ रहे हैं।
मौजूदा संदर्भ याकूब मेमन की फांसी की सज़ा के विरोध का है। जब तक सज़ा के खिलाफ तमाम कानूनी विकल्प हैं, उनका इस्तेमाल देशद्रोह कैसे हो गया। सवाल उठाने और समीक्षा की मांग करने वाले में तो हिन्दू, मुस्लिम, सिख और ईसाई भी हैं। अदालत ने तो नहीं कहा कि कोई ऐसा कर देशद्रोह का काम कर रहे हैं। अगर इस मामले में अदालत का फैसला ही सर्वोच्च होता तो फिर राज्यपाल और राष्ट्रपति के पास पुनर्विचार के प्रावधान क्यों होते। क्या ये लोग संविधान निर्माताओं को भी देशद्रोही घोषित कर देंगे।
याकूब मेमन का मामला आते ही वे लोग, जो व्यापमं से लेकर तमाम तरह के भ्रष्टाचार के आरोपों के कारण ऑनलाइन दुनिया से भागे हुए थे, लौट आए हैं। खुद धर्म की आड़ लेते हैं और दूसरे को धर्म के नाम पर डराते हैं, क्योंकि अंतिम नैतिक बल इन्हें धर्म से ही मिलता है। वे उस सामूहिकता का नाजायज़ लाभ उठाते हैं, जो धर्म के नाम पर अपने आप बन जाती है या जिसके बन जाने का मिथक होता है। फिल्मों में आपने दादा टाइप के कई किरदार देखें होंगे, जो सौ नाजायज़ काम करेगा, लेकिन भक्ति भी करेगा। इससे वह समाज में मान्यता हासिल करने का कमज़ोर प्रयास करता है। अगर ऑनलाइन गुंडागर्दी करने वालों की चली तो पूरा देश देशद्रोही हो जाएगा।
यह भी सही है कि कुछ लोगों ने याकूब मेमन के मामले को धार्मिकता से जोड़कर काफी नुकसान किया है, गलत काम किया है। फांसी के आंकड़े भी इसकी पुष्टि करते हैं कि फैसले का संबंध धर्म से नहीं है। लेकिन क्या इस बात का वे लोग खुराक की तरह इस्तेमाल नहीं कर रहे हैं, जो हमेशा इसी फिराक में रहते हैं कि कोई चारा मिले नहीं कि उसकी चर्चा शहर भर में फैला दो। क्या आपने इन्हें यह कहते सुना कि वे धर्म से जोड़ने का विरोध तो करते हैं, मगर फांसी की सज़ा का भी विरोध करते हैं। याकूब का मामला मुसलमान होने का मामला ही नहीं हैं। पुनर्विचार एक संवैधानिक अधिकार है। नए तथ्य आते हैं तो उसे नए सिरे से देखने का विवेक और अधिकार अदालत के पास है।
90 देशों में फांसी की सज़ा का प्रावधान नहीं हैं। क्या वहां यह तय करते हुए आतंकवाद और जघन्य अपराधों का मामला नहीं आया होगा। बर्बरता के आधार पर फांसी की सज़ा का करोड़ों लोग विरोध करते हैं। आतंकवाद एक बड़ी चुनौती है। हमने कई आतंकवादियों को फांसी पर लटकाया है, पर क्या उससे आतंकवाद ख़त्म हो गया। सज़ा का कौन-सा मकसद पूरा हुआ। क्या इंसाफ का यही अंतिम मकसद है, जिसे लेकर राष्ट्रभक्ति उमड़ आती है। इनके हमलों से जो परिवार बर्बाद हुए, उनके लिए ये ऑनलाइन देशभक्त क्या करते हैं। कोई पार्टी वाला जाता है उनका हाल पूछने।
फांसी से आतंकवाद खत्म होता तो आज दुनिया से आतंकवाद मिट गया होता। आतंकवाद क्यों और कैसे पनपता है, उसे लेकर भोले मत बनिए। उन क्रूर राजनीतिक सच्चाइयों का सामना कीजिए। अगर इसका कारण धर्म होता और फांसी से हल हो जाता तो गुरुदासपुर आतंकी हमला ही न होता। उनके हमले से धार्मिक मकसद नहीं, राजनीतिक मकसद ही पूरा होता होगा। धर्म तो खुराक है, ताकि एक खास किस्म की झूठी सामूहिक चेतना भड़काई जा सके। जो लोग इस बहस में कूदे हैं, उनकी सोच और समझ धार्मिक पहचान से आगे नहीं जाती है। वे कब पाकिस्तान को आतंकी बता देते हैं और कब उससे हाथ मिलाकर कूटनीतिक इतिहास रच देते हैं, ऐसा लगता है कि सब कुछ टू-इन-वन रेडियो जैसा है। मन किया तो कैसेट बजाया, मन किया तो रेडियो। मन किया तो हम देशभक्त, मन किया तो आप देशद्रोही।

( यह लेख http://khabar.ndtv.com/news/blogs/ravish-kumar-writes-about-online-goons-and-the-patriotism-1200971 से लिया गया है। )

रवीश कुमार वरिष्ठ हिंदी पत्रकार हैं, एनडीटीवी इंडिया में प्राइम टाइम के एंकर के रूप में देश भर में लोकप्रिय हैं। सोशल मीडिया पर सक्रिय हैं और अपनी बात को अपनी तरह से कहने में संकोच न करने के लिए पसंद किए जाते हैं।

Sunday, 23 August 2015

कटप्पा ने बाहुबली को क्यों मारा ?????

देश की सबसे बड़ी समस्या ( कटप्पा ने बाहुबली को क्यों मारा ??? ) को लेकर एक गहन वार्तालाप मोदी और बाहुबली के बीच ; जो हम आपको डिटेल में बता रहे हैं :
बाहुबली : नमस्कार सर,  कैसे हो ?
मोदी      : बस अच्छा हूँ, तुम्हारा ही इंतजार कर रहा था ।
B : सॉरी सर । थोडा लेट हो गया
M : अरे कोई नहीं, चलो आओ पहले फोटो खिंचवा लेते हैं

( फोटो के बाद सब जर्नलिस्ट्स बाहर चले जाते हैं )
M : अब एक सेल्फ़ी हो जाये
B : क्यों सर ? मीडिया ने ले तो ली फोटो
M : अरे तुम भोले हो, तभी तो बीच लड़ाई में लोगों को बचाने लग गये थे और वो तुम्हारा भाई आगे निकल गया था तुमसे । अब समझे कि नहीं ?
B : सर उसका सेल्फ़ी से क्या लेना देना ?
M : अरे भाई, मुझे भी तो ट्वीट करना है ना
B : ओह्ह्ह्ह, अब समझा । हाँ सर क्यों नहीं । सर एक तो आप जहाँ भी जाते हैं, सेल्फिआ जाते हैं
M : अरे तू नहीं समझेगा, युवाओं के देश में युवा बनके रहना पड़ता है
B : हाँ वो तो है सर
M : चल अब मुद्दे की बात पे आते हैं ? चल भाई, अब तू ही बता दे कि कटप्पा ने तुझे क्यों मारा ?
B : बता दूँगा पर ...
M : पर क्या बाहुबली ?
B :5 शर्त है सर
M : 5 शर्तें ??? 

B : हाँ सर 5
M : मंजूर हैं बोलो ?
B : पहली कि फ़िल्म रिलीज़ से पहले किसी को बताओगे नहीं
M : नहीं बताऊँगा
B : दूसरी ये कि आप मेरी फ़िल्म की तारीफ करोगे
M : ठीक है पर बाहर जाके मेरी भी तारीफ करनी होगी
B : ठीक है सर, और तीसरी शर्त ये कि वो 15 लाख कब दोगे ? ये बताओ
M : मैंने बोला न तू बहुत भोला है, दिल्ली चुनावों में अमित शाह ने बताया तो था कि ये चुनावी जुमला था । नहीं आएंगे, भूल जा और अगली शर्त बता
B : चौथी ये है कि आप मुझे 10 kg दाल दिलवा दीजिये कहीं से
M : तू भी न कैसी - कैसी शर्तें रखता है, चल दिया पर 10 से ज्यादा नहीं । इतना भी अडाणी से कह के एडजस्ट करवा रहा हूँ
B : धन्यवाद सर
M : हाँ ठीक है, ठीक है । अंतिम शर्त है बताओ जल्दी ?
B : सर आप तो PM हैं, आपके पास क्या नहीं है, आप जिसको चाहो अमीर बना सकते हो, चाहो तो किसी की भी जिंदगी बदल सकते हो, आप तो भाग्य विधाता हो । आप कितने दयावान हो इसका पता तो इससे चलता है कि जब आपकी गाड़ी के नीचे कुत्ता भी आ जाये तो आप 2 दिन तक सो नहीं पाते हैं । आप महान हो ।

M : बेटा ऐसा है, भाषणबाजी में तुम मेरे सामने कहीं नहीं टिकोगे, चाहे तेरी फ़िल्म 1000 करोड़ ही क्यों न कमाले । एक्टिंग में भी तेरे से 2 कदम आगे ही हूँ । पहेलियाँ मत बुझाओ, और अब शर्त क्या है, वो बोलो ?

B : 10 kg प्याज घर पहुँचा दो
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M : चल निकल यहाँ से, बड़ा आया बताने वाला । ( सिक्यूरिटी ... सिक्यूरिटी ... ) ये अंदर कैसे आया ।बाहर निकालो इसको । और हाँ, आइंदा शक्ल दिखा दी बोलने लायक नहीं छोड़ूँगा तुझे .... 10 kg प्याज दे दो । बाप का माल समझा है क्या ? सुतिया कहीं का


( और इस तरह देश की सबसे बड़ी समस्याओं में से एक समस्या का जायका प्याज ने बिगाड़ दिया । और समस्या का हल मिलते मिलते रह गया )

Wednesday, 19 August 2015

लोकतंत्र की बोली

पिछले 2 दिन की खबरें पढ़के बड़ा अजीब लग रहा है, जैसे हम लोकतंत्र में नहीं बल्कि तानाशाही में जी रहे हैं । जैसे पहली खबर है बिहार को चुनावों से पहले मिले पैकेज की
मेरे पापा जब मैं पढ़ने के लिये अपनी जयपुर में कोचिंग आता हूँ तब मेरे खर्चे के लिये अपनी मेहनत से कमाये पैसे मुझे देते हैं तो पूछते हैं कि कितने दूँ ?
मै बोलता हूँ 7 बहुत है,
पापा बोलते हैं वो कपड़े लेने थे न ?
8 दे दो, इसमें चल जायेगा
9 दे दूँ, फिर मत बोलना कि कम पड़ गये । चाहे तो हजार और ले ले और शर्म आ रही है तो बाद में बोल देना अकाउंट में डलवा दूँगा ।
( ये तो हुई एक नॉर्मल बातचीत जो एक स्टूडेंट बेटे और उसके पिता के बीच का वार्तालाप है )
और यही तरीका मोदी का था बिहार वालों के सामने ... 60 दूँ, 70 दूँ, 90 दूँ । बोलो कितना दूँ ? ऐसे लग रहा था कि कोई लोकतन्त्र की बोली लगा रहा हो और हमारी भोली-भाली जनता ऐसे खुश हो रही जैसे वो अपनी जेब से दे रहा हो । बेवकूफों, ये हमारे टैक्स के पैसे से हमको भिखारी साबित करने पे तुला है । अरे PM है तो देश का काम सम्भालने के लिये है, हमें भिखारी बनाने के लिए नहीं है । वो हमारा पैसा था, जो हम पर ही खर्च होना है, तो इसमें इतने अहसान वाले तरीके से क्यों पूछ रहा है वो ।
एक बात और कहना चाहूँगा कि ये पैकेज अभी 
मिल जाये तब तो ठीक है फिर तो तभी मिलेगा जब बीजेपी जीतेगी वरना हार गए तो अमित शाह जी बोलेंगे कि " कालाधन की तरह ये भी एक चुनावी जुमला मात्र था ।"


दूसरी खबर भी इन्हीं महोदय से जुड़ी है, जो है विदेशों में जाकर ये बोलना कि पिछली सरकारों ने हमारे लिये विरासत में खड्डे छोड़े हैं जो मैं भर रहा हूँ ।
जब पिछली सरकारों ने गड्ढे ही छोड़े थे तो ये देश विश्व की टॉप 10 अर्थव्यवस्था वाले देशों में कैसे शुमार हो गया ? चाँद पर जाने वाले चन्द देशों में कैसे आया ? 1971 में परमाणु शक्ति सम्पन्न देशों में कैसे शामिल हुआ ? विश्व की बड़ी GDP वाले देशों में कैसे शामिल हुआ ?
प्रिय मोदीजी, ये सब आपके दिए लच्छेदार भाषणों से हासिल नहीं हुआ है । ये विदेशों में जाकर अपने देश की बेइज्जती करना बन्द करो । घर का मामला घर में सुलझाना ही उसके मालिक का फर्ज होता है जिसमें आप बुरी तरह से नाकाम तो रहे ही हो, उल्टा इसका प्रचार प्रसार भी कर रहे हो ।
तीसरी खबर थी जंतर मंतर पर 60 दिन से शांतिपूर्ण  प्रदर्शन कर रहे पूर्व सैनिकों पर लाठीचार्ज की, बजाय समस्या को हल करने के उल्टा बढ़ा रहे है । पिछली यूपीए सरकार ने वन रैंक, वन पेंशन के लिये 1000 करोड़ रूपये आवंटित कर दिये थे तो अब इसे लागू करने के लिये इतनी आना कानी क्यों ? और लाठीचार्ज क्यों ? वो भी उन लोगों पर जिसने आपके लिये अपनी सारी जवानी सीमा पर निकाल दी । दिल्ली में एक पूर्व सैनिक ने आपके बारे में जो कहा, वो लिख रहा हूँ " जब विपक्ष में थे तब बोलते थे कि PM करना नहीं चाहता, कमजोर है । मैं बनते ही लागू करूँगा । भाई .... ऐसा है तो ज्ञान मत दो, फेंको मत । बोलो कि नहीं सम्भल रहा, और वक़्त लगेगा "
चौथी खबर है इलाहबाद हाइकोर्ट का वो फैसला, जिसमें कहा गया है कि नेता, नोकरशाह और न्यायधीश अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों में पढ़ायें ।
सम्मानित न्यायालय का देर से सही पर ऐतिहासिक फैसला, जो तत्काल प्रभाव से पुरे देश में समान रूप से लागु हो । सरकारी स्कूलों की व्यवस्था सँभालने वाले नेता और नोकरशाहों के बेटे जब यहाँ पढ़ेंगे तो वे अपने आप इस व्यवस्था को बदलेंगे । और न बदलें तो इसको आगे भोगेंगे । मैं शुरू से लेकर 12वीं तक ( 3 साल छोड़कर, पास कोई स्कूल न होने से ) सरकारी स्कूल में पढ़ा हूँ और मेरी छोटी बहन 9वीं में है और आजतक सरकारी में ही पढ़ रही है । क्यों ? क्योंकि मेरे पापा खुद शिक्षा विभाग में अफसर थे तो वो हमेशा ही यही कहते थे कि प्राइवेट स्कूलों में शिक्षक वो बनते हैं जो सरकारी नोकरी के लायक नहीं होते । जो एक सच्चाई भी है ।
पहली 3 झलकियाँ तो हुई आत्ममुग्धता और तानाशाही पूर्ण रवैये की, अब चौथी थी एक नई शुरुआत की और अंतिम खबर है दिल्ली में बिजली कम्पनियों द्वारा किये जा रहे ₹8000 करोड़ के घोटाले की, जिनके मालिक हैं अम्बानी और टाटा जैसे घराने ।
कुछ साल पहले एक आदमी ने इस घोटाले के खिलाफ आवाज उठाई थी और बोला था ये घोटाला पकड़ में जाये तो बिजली के बिल आधे हो सकते हैं । शीला दिक्सित और ये कंपनियां मिलकर दिल्ली वालों को लूट रही हैं । पर तब हर किसी ने उसको बेवकूफ कहा था क्योंकि हमारी बेवकूफ जनता को एक आम आदमी से ज्यादा अम्बानी, टाटा की झूठी बैलेंस शीट पर ज्यादा भरोसा था ।
ये बंदा आज दिल्ली का CM है, जिसने इस देश की राजनीति को कई मायनों में बदला है । आप उनसे कई मुद्दों पर असहमत हो सकते हो पर उन्होंने जनता को नेताओं से सवाल करना सिखाया है । उनके किये वादे याद करवाना सिखाया है । जी हाँ, मैं बात कर रहा हूँ अरविन्द केजरीवाल की । जो बात करता है नेताओं के हाथ में पॉवर के विकेंद्रीकरण की, जनता के राज यानि स्वराज की ।
मैं यहाँ किसी पार्टी की तरफदारी नहीं करने के लिये नहीं लिख रहा हूँ, अब बात मुद्दों की हो, जनता को अधिकार मिले, जनता को भिखारी न समझें, जनता की समस्या पर बोलने वालों को चुनों । आपकी पार्टी जनता के मुद्दों पर नहीं बोलती तो उसे बोलना सिखाओ ,,, पर देश की राजनीति के तौर तरीके बदलो ।

Wednesday, 12 August 2015

मैं नास्तिक क्यों ?

( मेरे बहुत से मित्र पूछते हैं कि भाई तू नास्तिक क्यों है ? फिर अभी कुछ दिन पहले वृन्दावन में बालेन्दु स्वामी जी द्वारा आयोजित देहदान के एक कार्यक्रम में गया था, वहाँ सभी लोग नास्तिक ही आये थे, तो सबका सबसे एक ही सवाल था " सर, आप नास्तिक कैसे बने ? " और वहाँ एक दिन पहले " मैं नास्तिक क्यों ? " विषय पर चर्चा थी, तब मैं वहाँ झिझक और शर्मीले स्वभाव की वजह से बोल नहीं पाया था, तो सोचा सबके जवाब आज यहाँ लिख दूँ )

मैं नास्तिक क्यों ? इससे पहले एक सवाल और है जो मैं करना चाहूँगा खुद से और आप लोगों से, " मैं/हम  आस्तिक क्यों ? " शायद इसका जवाब सभी के पास है, वो है क्योंकि हम उस धर्म को मानने वाले माता-पिता या पालनहार की सन्तान हैं । पर क्या आप माँ के पेट से ईश्वर, अल्लाह या जीसस के मंत्र जपते हुये पैदा हुये थे ? या pk की भाषा में कोई धार्मिक ठप्पा लेके पैदा हुये थे ? आपने पहली बार मन्दिर, मस्जिद, गुरूद्वारे या गिरजाघर को देखते ही वहाँ उस धर्म की प्रार्थना शुरू कर दी थी ?
यदि आपके सभी जवाब "नहीं" में है तो फिर आप आस्तिक कैसे हुये ? आप तो जन्मजात नास्तिक हुये । पहले तो हमें ये सोच बदलनी होगी कि हम जन्मजात आस्तिक होते हैं क्योंकि इंसान पैदा ही  नास्तिक होता है फिर उसे आस्तिक बनाया जाता है ।

ये बात तो हुई किसी के अज्ञानतावश धर्म धारण करने की; जिसमें इंसानी बच्चे की समझ इतनी विकसित नहीं हो पाती कि वो इसपर कुछ सवाल कर सके । इसलिये वो अपने चारों तरफ के वातावरण को देखके यही सीखता है कि धर्म तो होना ही चाहिए, जहाँ उनके बनाये कुछ भगवान हों, जिनकी प्रार्थना करके उनको खुश करना पड़ता है ।

इस दूनिया में 2 तरह के लोग होते हैं, पहले जो  नास्तिक से आस्तिक बन जाते और अपने धर्म के प्रति निष्ठा रखते हैं, हर बुरी बात का हर हालत में समर्थन करते हैं और ये मानते हैं कि एक शक्ति है, जो ये सृष्टी चला रही है और हम सब उसके बनाये मोहरे हैं । और उसको न मानने वाले उस धर्म के दुश्मन हैं । और दूसरे होते हैं वो जो नास्तिक से आस्तिक बन तो जाते हैं पर अपनी सभी इन्द्रियों को खुली रखते हैं, वो धर्म से सवाल करते है, तर्क करते है, व्यावहारिकता की कसौटी पर जाँचते हैं, यथार्थवादी होते हैं । इसलिये ये जल्द ही उस धर्म के दुश्मन घोषित कर दिये जाते हैं । और इस तरह वो फिर से अपने मूल यानि कि नास्तिकता की और अग्रसर होते हैं ।

यहाँ नास्तिकता का मतलब उस ईश्वरीय शक्ति का विरोध करना ही नहीं है, नास्तिकता का मतलब है सदैव खोज में रहना, निरन्तर चिंतन और नये विचार । जबसे आपने खोज, चिंतन और विचार करना छोड़ दिया तबसे आप पूर्ण रूप से नास्तिक भी नहीं रहे ।

मैं नास्तिक क्यों बना इसके पीछे मेरे जीवन में घटी कुछ घटनाओं का भी हाथ रहा है, जो मैं आगे विस्तार से लिखूँगा पर मेरी कुछ शर्तें थी अपनी जिंदगी जीनें की, जिनमें धर्म किसी भी साँचे में फिट नहीं बैठा । मैं  कर्म और समय को सत्य मानता हूँ ।  तर्क में विश्वास  करता हूँ पर धर्म तो तर्क के शुरू होते ही खत्म हो जाता है ।   मैं चाहता हूँ कि पंक्ति के अंतिम बन्दे को उसके अधिकार मिले जो धर्म नहीं दिला सकता है । साथ ही  लालच और डर नहीं है तो आस्तिक होने का सवाल ही नहीं होता । लेकिन नास्तिक का मतलब ये भी नही कि आप धर्म को नकार के अपना एक अलग धर्म बना लो, मेरे हिसाब से नास्तिकता का मतलब है निरन्तर चिंतन, नये विचार और जीव मात्र की बिना लालच के सेवा । इसलिये नास्तिक बोल सकते हैं आप मुझे

डॉ कलाम को श्रद्धांजलि

डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम (Avul Pakir Jainulabdeen Abdul Kalam ) का जन्म 15 October 1931 को तमिलनाडु के Rameswaram में हुआ । इन्होंने 1960 ...